वेटनरी विभाग के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर.. (शब्द बाण – 158)

वेटनरी विभाग के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर.. (शब्द बाण – 158)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 158
19 अक्टूबर 2026
शैलेंद्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

वेटनरी के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर
दक्षिण बस्तर में वेटनरी विभाग पर जीएडी यानी सामान्य प्रशासन विभाग का फरमान बेअसर होता दिख रहा है। जीएडी ने 3 साल से ज्यादा एक ही टेबल संभालने वाले अफसर – कर्मियों के प्रभार तुरंत बदलने का सर्कुलर कुछ महीने पहले जारी किया था। लेकिन यहां इसके क्रियान्वयन को लेकर ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं पड़ रहा है। बीजापुर जिले में तो विभागीय मंत्री की दखल के बाद ही एक मैदानी कर्मचारी को मूल जगह के लिए रिलीव किया गया, लेकिन दंतेवाड़ा व सुकमा जिले में फिलहाल ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है। कई कर्मचारी एक ही टेबल को संभाले हुए हौले – हौले रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहे हैं। दोनों जिलों में विभाग एक भी पूर्णकालिक उप संचालक की पोस्टिंग नहीं कर सका है। प्रभारियों के भरोसे विभाग चल रहा है।

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पत्रकारों को वीआईपी फीलिंग

पहली बार शक्तिपीठ दंतेश्वरी मंदिर की सुरक्षा इतनी टाइट कर दी गई कि पत्रकारों तक को एस्कॉर्ट्स में 4 जवानों के साथ फोटो – वीडियो के लिए मंदिर तक जाने की व्यवस्था कर दी। वीआईपी टाइप फीलिंग आने से पत्रकार गदगद भी हुए और अघोषित सेंसरशिप से परेशान भी। इसे नापसंद करने वालों में से कुछ ने तो यहां तक कह दिया कि जब नक्सलवाद हावी था, तब भी कभी पत्रकारों को गार्ड की जरूरत नहीं पड़ी, अब कथित नक्सल मुक्ति के दौर में गार्ड देने का क्या औचित्य? वैसे, जिन्हें प्रेस पास जारी किए गए थे, वो अपना पास छिपाने की कोशिश में ज्यादा रहते दिख रहे थे कि कहीं पुलिस पकड़कर गार्ड न दिलवा दे। इस व्यवस्था ने घोर नक्सलवाद के दिनों में कुछ साल पुरानी टैक्टिस की याद दिलवा दी, जब कुछ प्रो एक्टिव लोगों को बिन मांगे ही पुलिस जबरन सुरक्षा दे देती थी, ताकि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। खैर, ये तो रही पत्रकारों की बात, मंदिर के पुजारी और सेवादार भी इस नई व्यवस्था से काफी खफा दिखे। अंततः युवा सहायक पुजारी ने मीडिया में यह सार्वजनिक बयान देकर नई व्यवस्था की किरकिरी करा दी कि मंदिर को छावनी में बदलने से न सिर्फ दर्शनार्थियों और सेवादारों को ही दिक्कत हो रही है, बल्कि दान – दक्षिणा से मंदिर को होने वाली आय में भी गिरावट आई है।
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मुर्गा की आड़ में जुए का दांव

दक्षिण – पश्चिम बस्तर इन दिनों मुर्गा लड़ाई के खुमार में डूबा हुआ है। पारंपरिक मुर्गा लड़ाई की जगह अब प्रोफेशनल्स ने ले ली है। इनमें मुर्गों पर हजारों – लाखों के दांव लग रहे हैं। यहां तक कि कुछ जगहों पर पड़ोसी राज्य आंध्र – तेलंगाना के लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर मुर्गा लड़ाई आयोजित करने की बात सामने आ रही है। सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं के शेयरधारक होने की भी चर्चा है। कुछ दशक पहले अविभाजित एमपी के दौरान सरकार ने सरकारी लाटरी को अनैतिक और घर बर्बाद करने वाला बताकर बंद करवा दिया, लेकिन ग्रामीणों के पारंपरिक मुर्गा लड़ाई में घुस आए बड़े व्यापारिक समूहों की बैक डोर एंट्री पर सरकार की खामोशी तगड़ी सेटिंग की तरफ इशारा कर रही है । परम्परा और व्यवसाय के बीच महीन विभाजक रेखा को अनदेखा किया जा रहा है। विशुद्ध ग्रामीण परम्परा को बाजारवाद के प्रभाव से मुक्त करवाने की तरफ किसी का ध्यान नहीं है।
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क्या है जंगल में मंगल का राज़  ?
सुकमा जिले के चिंता कोंटा जंगल में पुलिस ने 10 वाहनों को लावारिस हालत में पाते हुए जब्त कर लिया है। अब वाहन मालिकों की पतासाजी की जा रही है। इनमें 3 महंगी कारें भी शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि जब्तशुदा सारे वाहनों के रजिस्ट्रेशन नंबर पड़ोसी राज्य तेलंगाना और आंध्र के पाए गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि पड़ोसी राज्य से इतने सारे वाहनों में कौन लोग आकर जंगल में क्या कर रहे थे? और गाड़ी छोड़कर कहां ग़ायब हो गए? दशकों तक नक्सलवाद का दंश झेलने वाले बस्तर में नक्सलवाद की पैठ भी इसी इलाके से शुरू हुई थी। अब जबकि नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा सरकार कर चुकी है, तब इस तरह की संदिग्ध गतिविधियों ने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटी है।
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नाम बदलने का जुनून ?

सरकारें बदलने के साथ योजनाओं और संस्थाओं का नाम बदलना कोई नई बात नहीं है, पर इस बार राज्य में विभिन्न स्थलों, योजनाओं का नाम परिवर्तन करने को लेकर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। रायपुर के तेलीबांधा चौक और जगदलपुर के दण्डामी माडिया चौक का नाम बदलने की कथित कोशिश का बवाल पूरी तरह थमा भी नहीं था कि अब ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार का नाम बदलकर आम दरबार किए जाने के आरोपों से फिर सरकार घिरती हुई नजर आ रही है। रियासतकालीन इस परंपरा के साथ लोगों का भावनात्मक जुड़ाव काफी गहरा है । इस मामले में विपक्ष को हमलावर होने का एक मौका और मिल गया है। पता नहीं ऐसा कौन रणनीतिकार मिल गया है, जो बार – बार सरकार को उड़ता तीर लेने पर मजबूर कर रहा है, जिसे व्यवस्था में सुधार की बजाय नाम बदलने में ज्यादा दिलचस्पी रहती है।

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आईजी साहब की सहृदयता

बस्तर रेंज के आईजी साहब की संवेदनशीलता और सहृदयता की चर्चा डिपार्टमेंट में खूब हो रही है। दरअसल, नवरात्रि पर दंतेवाड़ा में कुछ दिनों तक कैंप किए हुए आईजी साहब मॉर्निंग वॉक पर घूमते फिरते हुए मंदिर परिसर की तरफ पहुंच जाते थे। इसी बीच उन्होंने ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों से चाय – नाश्ता और भोजन मिलने के बारे में पूछा और इस बात पर हैरानी भी जताई कि ड्यूटी पर चाय – नाश्ते तक का इंतजाम नहीं होता। उन्होंने व्यवस्था सुधारने की हिदायत दी। अगले दिन सुबह पहुंचकर फिर पूछ – परख करते दिखे। खैर, व्यवस्था में सुधार हो न हो, पर ड्यूटी में लगे अफसर – कर्मी इस बात पर काफी खुश दिखे कि कई साल बाद कम से कम किसी बड़े अफसर ने उनकी सुध तो ली, वरना अक्सर वीवीआईपी ड्यूटी के नाम पर भूखे – प्यासे रहने के बावजूद स्टेट पुलिस के जवानों को चाय – पानी तक नसीब नहीं होता। जवान झुंझलाते, भुनभुनाते रह जाते हैं , जबकि ऐसी ड्यूटी के दौरान सेंट्रल फोर्स वालों का सिस्टम बेहतर माना जाता है। उनके लिए समय – समय पर चाय – नाश्ता – भोजन सब फील्ड पर पहुंचता रहता है।

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शकुनि मामा के अनुयायी

दीपावली का त्यौहार करीब आते ही शकुनि मामा के अनुयायी सक्रिय होने लगे हैं और जहां तहां चौसर यानि जुए के फड़ सजाने की कोशिश में हैं। एक थाने की पुलिस ने तो छापामार कार्रवाई कर इस सीजन की बोहनी भी कर डाली, ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आए।  त्यौहारी सीजन के अलावा साल भर चौसर के दांव खेलने वाले किसी न किसी तरह अपना रास्ता निकाल ही लेते हैं, पर फंसते वो लोग हैं, जो अपना लक टेस्ट करने की गरज़ से कभी – कभार शकुनि मामा की शरण में जाते हैं।
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चलते – चलते…
छत्तीसगढ़ के विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। कुछ नए मंत्रियों के शामिल होने और नॉन परफार्मर कुछ मंत्रियों की छुट्टी की संभावनाएं जताई जा रही हैं। बस्तर से 2 और मंत्री शामिल होने की अटकलों के बीच दंतेवाड़ा के हिस्से में भी कुछ आने की उम्मीद लोग लगाए बैठे हैं। इसकी वजह भी साफ है कि राज्य गठन के बाद से भाजपा ने एक बार भी इस जिले को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं दिया है। इस बार निगम – मंडलों तक में अध्यक्ष – उपाध्यक्ष जैसा कोई पावरफुल पद नहीं मिला। इस नजरिए से अगले चुनाव को देखते हुए पार्टी जिले को कोई बड़ी सौगात दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

1 thoughts on“वेटनरी विभाग के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर.. (शब्द बाण – 158)“

  1. हर मुद्दे को चुटीले अंदाज मे सरल तरीके से बयान करना कोई आपसे सीखे,, हर खबर पर नजर है आपकी, साधुवाद सर,
    माँ दंतेश्वरी आपकी हर मनोकामना पूर्ण करें, अशेष, शुभकामनायें 🙏🏼🙏🏼🙏🏼💐

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