नक्सली हंडा हथियाने की होड़ …(शब्द बाण -156)

नक्सली हंडा हथियाने की होड़ …(शब्द बाण -156)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 156

4 अक्टूबर 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

हंगामा क्यों है बरपा ?
दक्षिण बस्तर में भाजपा को हवन – पूजन और शांतिपाठ करवाने की ज्यादा जरूरत महसूस हो रही है। पार्टी पर शनि की साढ़े साती और काल सर्पदोष जैसे असर दिख रहे हैं । वजह यह है कि यहां आए दिन कोई न कोई बवाल हो रहे हैं। एक बवाल से पीछा छूटा नहीं कि दूसरा बवाल खड़ा हो जाता है। मामला थाना कचहरी तक पहुंचने के बाद फिर शांति प्रक्रिया शुरू होती है। पदाधिकारियों का नाम जुड़े होने की वजह से पार्टी के हाथ भी कार्रवाई करने से कांपते हैं। वोट बैंक छिनने के डर से पार्टी कोई एक्शन नहीं लेती है, तब तक दूसरा पदाधिकारी नया बखेड़ा खड़ा कर देता है। मामले में विपक्षी दल कूद पड़ते हैं, तो पार्टी और भी रक्षात्मक होकर बचाव करने लगती है, ताकि पार्टी की बदनामी न हो और क्रेडिट विपक्षी दल को न मिल जाए। बात सही भी है, सत्ता का सुख भोगने के उत्साह में अगर कोई थोड़ी बहुत उछल कूद कर भी लेता है, तो इसमें हर्ज क्या है?
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बाढ़ पीड़ितों का रोष
बस्तर में विनाशकारी बाढ़ ने इस बार इंद्रावती नदी किनारे की बसाहटों को तबाह कर दिया। सुकमा जिले में शबरी नदी ने भी रौद्र रूप दिखाया। हालात का जायजा लेने पहुंचे मुख्यमंत्री ने कुछ जगहों का दौरा किया, लेकिन जगदलपुर के डोंगाघाट इलाके में सिर्फ कुछेक प्रभावित मकान देखकर लौटना पीड़ितों को नागवार गुजरा। रोष में लोगों ने काफी शोर मचाया, वे चाहते थे कि सीएम उनके घरों की हालत भी देख लें, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। खैर, मुख्यमंत्री ने पहुंचकर सुध ले ली, यह भी बड़ी बात है। कम से कम बाढ़ प्रभावितों के पुनर्वास, व्यवस्थापन में तेजी तो आएगी, ऐसी उम्मीद तो की जा सकती है। वैसे सत्ताधारी भाजपा के पदाधिकारियों – कार्यकर्ताओं पर नमो संकल्प अभियान के टास्क को लेकर इतना वर्कलोड है कि बेचारे कोविड काल की तरह फील्ड में जाकर पीड़ितों को सहायता पहुंचाने और सेल्फी खिंचवाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। दूसरी तरफ सत्ता से दूर वनवास काट रही कांग्रेस के पास पार्टी का खुद का ऐसा कोई फंड नहीं है, जिससे पीड़ितों की मदद कर सकें।
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बायपास पुल का टेंडर
दंतेवाड़ा में बाढ़ से बह गए चितालंका बायपास पुल का नया निर्माण कार्य एक साल और एक महीना बीतने के बाद भी शुरू नहीं हो सका है। इसकी नींव का पत्थर तक रखा नहीं गया है।
वजह यह है कि टेंडर प्रक्रिया अब तक फाइनल नहीं हुई है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में क्षतिग्रस्त हुए पुल के निर्माण को लेकर यह सुस्ती लोगों को चुभ रही है। फ़ाइलों के सरकने की धीमी रफ्तार की वजह से तकनीकी और प्रशासकीय स्वीकृति के पेंच में पुल महीनों तक अटका रहा, फिर टेंडर स्तर तक आने में ही अगला मानसून भी पहुंच गया। कब टेंडर फाइनल होगा और कब निर्माण शुरू होकर काम पूरा होगा, यह कहना अभी मुश्किल है। कुल मिलाकर इस मामले से सरकार के आपदा प्रबंधन पॉलिसी की पोल खुल गई है।
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आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम

आत्मनिर्भर भारत का मंत्र दंतेवाड़ा जिले में कुछ ज्यादा ही गंभीरता से अपनाया जा रहा है। गीदम और दंतेवाड़ा नगर में लोग अपने घरों के सामने जर्जर सड़क पर सुबह – शाम खुद पानी का छिड़काव करते दिखते हैं, ताकि धूल के उड़ते गुबार से बच सकें। कहीं – कहीं गड्ढों पर खुद गिट्टी और मसाले भी भरते हैं, तो कहीं सड़क किनारे उगी झाड़ियों की सफाई भी करते हैं, ताकि हादसे न हों। इस तरह की ट्रेनिंग अगर समूचे प्रदेश में मिलने लगे तो भारत देश को पूरी तरह आत्म निर्भर बनते देर नहीं लगेगी और मेक इन इंडिया का सपना भी जल्द ही साकार हो उठेगा।
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नक्सली हंडा की लूट

पुराने जमाने में हांडियों में गाड़ कर रखे गये धन को हांडा या हंडा धन कहा जाता था, इस पर आधारित छालीवुड की हास्य मूवी हँडा काफी चर्चित हुई थी। अब बस्तर में नक्सलियों के बड़े पैमाने पर सरेंडर के बाद जमीन में गड़े धन यानि हांडा को लूटने की ललक सब में जाग उठी है।
दरअसल, जिस समय में बेवफा पत्नियां अपने पतिदेव को काट – पीटकर कुख्यात नीले ड्रम में भरने लगी थीं, उस दौर में नक्सली सोने के बिस्कुट और नोटों की गड्डियां इन नीले ड्रमों में भरकर जमीन के भीतर दफनाने में लगे हुए थे। इस बात का खुलासा होने के बाद से हर कोई जंगल जाकर नीला ड्रम खोद लाना चाहता है। अब पुलिस भला इसमें कैसे पीछे रहती। बस्तर जिले के कांकेर में 2 डीएसपी पर ऐसे ही गड़े धन से 20 लाख रुपए पार करने का आरोप लगने से मामला सुर्खियों में है। जुए के फड़ से जब्त होने वाले धन की तरह इस हंडे की राशि का भी कोई हिसाब तो रहता नहीं, सो जो जितना दबा ले, उतना नसीब वाला होगा। वो तो गनीमत रही कि सरेंडर नक्सलियों के बयानों के बाद हांडा का भांडा फूट गया और बड़े अफसरों ने डीएसपी स्तर के अफसरों की करतूत की जांच शुरू कर दी। जांच संभवतः जल्द ही किसी नतीजे पर पहुंचने वाली है।
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ऊंट के मुँह में जीरा
बस्तर में आई विनाशकारी बाढ़ आपदा के बाद शासन ने प्रभावितों को आरबीसी 6 – 4 तहत मुआवजा सहायता राशि देने का ऐलान तो किया है, लेकिन इसमें मिलने वाली राशि दशकों पुराने दर के हिसाब से निर्धारित है, जो वर्तमान महंगाई के हिसाब से ऊंट के मुँह में जीरा समान बताई जा रही है। राशि इतनी कम है कि इतने में ढंग का शौचालय भी न बन पाए। हर साल इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन सरकार इस राशि की दर को रिवाइज करने के मूड में नहीं दिख रही है। फालतू की फ्रीबिज योजनाओं से वोटरों को उपकृत करने की बजाय उसी खर्च से वास्तविक पीड़ितों की मदद की जा सकती है।
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मीटिंग पर मीटिंग

मीटिंग्स की बढ़ती संख्या से अधिकारी – कर्मचारी हलाकान हैं। फील्ड में जाकर टारगेट पूरा करें या बार – बार मीटिंग में जाएं, यह बड़ा धर्म संकट रहता है। दक्षिण बस्तर में कटेकल्याण ब्लॉक के कर्मचारियों पर दोहरी मार पड़ती है। मोखपाल – भूसारास इलाके के मैदानी कर्मचारी इकलौते घुमावदार रास्ते से होकर कभी ब्लॉक मुख्यालय पहुंचते हैं, तो कभी उन्हें जिला मुख्यालय तलब किया जाता है। हाल ही में इसी ब्लॉक के 2 रोजगार सहायक जिला पंचायत की मीटिंग से बाइक पर घर लौटते वक्त सड़क हादसे का शिकार हुए, जिनमें एक की मौत हो गई, दूसरे की टांग टूट गई। पहले भी ऐसे कई मामले आ चुके हैं। अब सवाल यह उठने लगा है कि ऑनलाइन मीटिंग की सुविधा रहने के बावजूद छोटे कर्मचारियों को बार – बार मुख्यालय बुलाकर भौतिक रूप से मीटिंग लेना कितना उचित है? 6 से 8 हजार मानदेय वाले रोजगार सहायकों को मीटिंग में ही पेट्रोल डीजल पर काफी पैसा फूंकना पड़ता है और सड़क हादसों का खतरा अलग। ऐसा ही हाल आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का भी रहता है।
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