बिन पटवारी सब सून… (शब्द बाण – 159)

बिन पटवारी सब सून… (शब्द बाण – 159)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 159
25 अक्टूबर 2026

शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

बस्तर दशहरा और महामहिम का प्रवास
बस्तर दशहरा पर्व इस बार देश की महामहिम राष्ट्रपति के प्रवास की वजह से काफी चर्चित रहा। महामहिम के आने से इस ऐतिहासिक पर्व की पहचान में एक और मील का पत्थर तो जुड़ गया, लेकिन पर्व से जुड़े कई मामलों में प्रशासन और सरकार को आलोचनाओं के कटघरे में खड़ा होना पड़ा। सामाजिक संगठनों के साथ ही विपक्ष के सवालों से जिम्मेदार लोग अनुत्तरित हो गए हैं।
रथ के संचालन में निर्मित हुई असहज स्थिति से लेकर सुरक्षा प्रोटोकॉल के नाम पर आम यातायात बाधित करने से ग्रामीण जनों से सजने वाला यह पर्व कुछ अटपटा हो गया। खैर, मामला देश के राष्ट्रपति प्रवास का होने से राष्ट्र गौरव का बताकर शांत तो किया जा सकता है, लेकिन जन सामान्य की व्यापक सहभागिता वाले ऐसे पर्व में भविष्य में विशिष्ट सुरक्षा प्राप्त हस्तियों के प्रवास पर विचार मंथन की जरूरत पड़ सकती है।
——–
बिन पटवारी सब सून

धान खरीदी शुरू होने के ठीक पहले राजस्व पटवारी हड़ताल पर चले गए हैं, सरकार को फर्क पड़े या ना पड़े, पर इधर फसल पर मानसून का जुआ हावी होने से किसान अलग परेशान हैं । फसल बीमा का पैसा किसे, कैसे और किस फार्मूले से मिलता है, यह उनकी समझ से परे है। फसल आनावरी रिपोर्ट तैयार करना हो या कोई और औपचारिकता, बिन पटवारी सब सून जैसी स्थिति हो जाती है। पटवारी हड़ताल को लेकर सरकार गंभीर नहीं हुई, तो सबसे बड़ा नुकसान किसानों को ही होना तय है। दूसरी तरफ जाति – निवास प्रमाण पत्रों के लिए भी लोग अलग भटक रहे हैं।

——–

ओनली कैश वाला पेट्रोल पंप

देश में कैशलेस ट्रांजेक्शन यानि बिना नगदी भुगतान को बढ़ावा देने के प्रयास में सरकार ने पहले खूब पसीना बहाया, अब जब आम जनता इसकी आदी होने लगी है, तो कैश ट्रांजेक्शन पर मर्चेंट्स शुल्क लगाने की तैयारी को लेकर बहस जारी है। दंतेवाड़ा के कारली स्थित पुलिस कल्याण पेट्रोल पंप में तो अभी से ऑनलाइन / फोन पे भुगतान बंद हो गया है। लोग नगदी नहीं रहने पर बिना पेट्रोल – डीजल डलवाए ही आगे बढऩे को मजबूर हो जाते हैं। यह मामला तो ठीक वैसा ही है, जैसे कंप्यूटर के आई-5, आई -6 के जमाने में भी आउटडेटेड 486 वर्जन कंप्यूटर से काम चलाने की कोशिश करना।

——–
पुलिस स्मृति से मीडिया गायब

नक्सल उन्मूलन के बाद दक्षिण बस्तर में पुलिस और मीडिया के बीच संबंधों में पहले जैसी गर्माहट और तालमेल अब नहीं दिख रही है। हालिया कुछ महत्वपूर्ण आयोजनों से इसकी झलक मिली। अरसे बाद ऐसा हुआ कि पुलिस स्मृति दिवस कार्यक्रम में पहली बार मीडिया को आमंत्रित नहीं किया गया। देश भर में शहीद हुए पुलिस जवानों के त्याग और बलिदान का स्मरण कर इस कार्यक्रम में श्रद्धांजलि दी जाती है। इसके पहले नियमित रूप से मीडिया के लिए कार्ड जारी होते थे। सशस्त्र बल मुख्यालय में होने वाले आयोजन में इस बार मीडिया की गैलरी खाली देखकर जन प्रतिनिधि इस गैलरी की सीटों पर विराजमान हो गए। कुल मिलाकर नक्सलवाद के दौर में अहम भूमिका निभाने वाली मीडिया ही पुलिस स्मृति से विलोपित होती नजर आई।

—————–
फोन से घबरा रहे  वन अफसर
दक्षिण बस्तर में वन विभाग में फिर से फोन फोबिया यानि फोन कॉल्स से घबराने का शगल शुरू हो गया है। कहने को तो विभाग ने पहले से ही सभी अफसरों को पुलिस की तरह सरकारी नंबर जारी किया हुआ है, जो ट्रांसफर होने पर अगले अधिकारी को हैंडओवर कर दिया जाता है। ताकि वन विभाग से जुड़े मामलों पर कॉल करने वालों को आसानी हो। कोविड कॉल के बाद से आम तौर पर सभी अफसर लोगों के कॉल रिसीव करते थे, लेकिन बीते कुछ महीनों से फोन से घबराने वाला फोबिया कोविड के नए वेरियंट की तरह वापस आ गया है। वन अफसरों के नंबर पर कॉल आते ही उसे ऑटोमेटेड मोड में डालकर वाइस बॉक्स में संदेश रिकार्ड करने को कहा जाता है। ऐसे में वन अपराधों की सूचना देना हो, या कोई अन्य जरूरी बात, वन विभाग से लोगों का संपर्क कटता जा रहा है।
——————

बचेली में बुलडोजर पॉलीटिक्स
छत्तीसगढ़ में यूपी वाले बाबा की तरह बुलडोजर कल्चर को भले ही अपनाया नहीं जा सका हो, लेकिन दक्षिण बस्तर की नगर पालिका बचेली में इन दिनों बुलडोजर पॉलिटिक्स को लेकर काफी बवाल मचा हुआ है। पालिका के बुलडोजर से ठेकेदार के अस्थाई ठिकाने को जमींदोज कर दिया गया। लेकिन अतिक्रमण हटाने के नाम पर सिंगल एक्शन पर सवाल उठने लगे हैं। एक धड़ा इसे जायज मानता है, तो दूसरा धड़ा इसे आपसी दुश्मनी का नतीजा बताने में लगा हुआ है। इस बुलडोजर पॉलिटिक्स को लेकर पर्दे के पीछे से जो कहानी निकल कर आ रही है, वह ठेकेदारी से जुड़ी हुई प्रतिद्वंद्विता की ओर ईशारा कर रही है।
———————-

फिर एक तूफान की सुगबुगाहट

मौसम विभाग ने चक्रवाती तूफान से तेज अंधड़ और बारिश की चेतावनी जारी की है, जिससे दक्षिण बस्तर के लोग सहमे हुए हैं। कहते हैं कि दूध का जला हुआ छाछ भी फूंक – फूंक कर पीता है। दरअसल, साल भर पहले दंतेवाड़ा मेें आए विनाशकारी बाढ़ के असर से लोग अभी तक उबरे नहीं है। इस बार मानसून के विदा होने तक लोग अज्ञात भय से आशंकित रहे, लेकिन मानसून शांत और निर्विकार भाव से लौट गया। पिछली बाढ़ मेें प्रभावित हुई कई अधोसंरचनाएं 14 माह बाद भी अपने पुराने स्वरूप की तरफ लौटती नहीं दिख रही हैं। न तो सडक़ों की मरम्मत हो सकी, न टूटे पुल – पुलिए बनाए जा सके। अब मानसून लौटने के बाद चक्रवाती तूफान की चेतावनी ने लोगों की चिंता फिर से बढ़ा दी है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

वेटनरी विभाग के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर.. (शब्द बाण – 158)

वेटनरी विभाग के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर.. (शब्द बाण – 158)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग - 158 19 अक्टूबर 2026 शैलेंद्र ठाकुर । दंतेवाड़ा वेटनरी के आगे जीएडी की बीन भी बेअसर दक्षिण बस्तर...