साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 154
21 सितम्बर 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
फूफाओं से परेशान बीजेपी
सत्ता का सुख भोग रही बीजेपी इन दिनों दूल्हे के फूफा की तरह रूठने वाले कार्यकर्ताओं-नेताओं से परेशान है। एक को मना भी नहीं पाए होते कि दूसरा रूठने लगता है। यह काम मेंढकों को खुले तराजू में रखकर तौलने के प्रयास जैसा ही लगता है।
राज्य के अन्य जिलों की तरह बस्तर संभाग भर में ऐसे हालात हैं। दिक्कत यह है कि अनुशासित और कैडरबेस पार्टी का कार्यकर्ता होने के नाम पर चुप कराया भी नहीं जा पा रहा है, पीड़ा ही कुछ ऐसी है।
राज्य में एक – दो जगह फूफ़ाओं ने तो मंत्रियों तक के खिलाफ बगावत के स्वर भी बुलंद कर दिए थे। ताजा मजेदार मामला दंतेवाड़ा में चल रहे राज्य स्तरीय खेल स्पर्धा में देखा गया, जहां कुछ फूफा मैदान तो मैदान, मंच छोड़कर खिसकते दिखे। कुछ दिन पहले भी डिप्टी सीएम व पीडब्ल्यूडी मंत्री ने कार्यकर्ताओं के साथ तय भोजन न करके कमरे में अपना खाना बुलवा लिया था, जिससे मंत्री की एकांत प्रियता कार्यकर्ताओं को खूब खटकी थी। माननीयों की ऐसी उपेक्षा भी उन्हें फूफा बनने को मजबूर कर रही है। अब देखना यह है कि बीजेपी अगले चुनाव से पहले तक फूफाओं को कैसे साध पाती है।
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महतारी वंदन ने बनाया अमीर !!
अभी सरकार महतारी वंदन योजना के गुण गाते नहीं थक रही है। आए दिन इसी योजना की दर्जनों सक्सेस स्टोरी लिखी और छपवाई जा रही है, जिसमें महिलाओं के आत्मनिर्भर होने के किस्से भरे पड़े हैं। महतारी वंदन का पैसा जमा कर बिजनेस शुरू करने जैसी कहानियां बाँची जा रही है।
इधर महिलाएं परेशान हैं कि क्रीम – पाउडर खरीदने बराबर पैसा मिल रहा है, लेकिन किस्सा बड़े व्यवसाय का गढ़ा जा रहा है। ऊपर से योजना की राशि कभी केवायसी के नाम पर अटक जाती है, तो कभी किसी और वजह से। कुल मिलाकर मामला ठीक वैसा ही है, जैसे पिछली कांग्रेस सरकार ने गोबर बेचकर स्कूटी खरीदने जैसा कारनामा एक हितग्राही से कर दिखाया था। वजह यह थी कि तब अफसरों ने सीएम के गुड बुक में आने गोबर खरीदी के आंकड़े बढ़ा – बढ़ा कर एंट्री करवाए थे, बाद में खरीदी के हिसाब से न तो गोबर मिली, न ही खाद मिला।
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जूतम – पैजार की नौबत
पीएम मोदी के जन्मदिवस पर आशीर्वाद का दीया जलाने की मुहिम इस बार खासी चर्चित रही। मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने की खुशियां मनाने मशगूल बीजेपी और विरोध कर रहे विपक्षी दल कांग्रेस के बीच काफी जुबानी जंग हुई। यहां तक कि दीया और बाती हम के चक्कर में जगदलपुर में भाजपा – कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच मंत्री के सामने ही जूतम – पैजार की नौबत आ गई। कांग्रेस का आरोप था कि दीया – बाती करने के लिए गरीब दुकानदारों का व्यवसाय ठप करवाया गया, तो वहीं दूसरी तरफ भाजपाइयों के अपने तर्क थे। वो कहीं दीप जले, कहीं दिल .. गाना गुनगुनाते सुने गये। खैर, मौके पर मौजूद रहे सुलझे हुए गृह मंत्री व जिला प्रभारी मंत्री ने अफसरों को फटकार लगाते हुए मामला संभाल लिया कि उन्होंने गलत स्थल चयन क्यों किया? खैर, बीजेपी ने जन्मदिन पर दीपोत्सव की जो परम्परा शुरू की है, उसने काफी सुर्खियां बटोरी है। पर एक बड़ा सवाल यह है कि पार्टी के संस्थापक व पितृ तुल्य वाजपेयी जी के जीते जी गांव – गांव में अटल चौक तो बना दिया, लेकिन सरकार में वापसी के बाद भी सुध नहीं ली। न प्रतिमा लगी, न ही कभी रंग – रोगन कराया, अब दीया बाती की नई परम्परा को कैसे जारी रख पाएंगे, यह तो वक्त ही बताएगा।
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पोलावरम को लेकर बेफिक्री
पोलावरम बांध परियोजना में छत्तीसगढ़ के कोंटा समेत 18 गांवों के डुबान में आने को लेकर लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है, लेकिन यहां की सरकारें हमेशा बेफिक्र दिखती रही हैं। परियोजना आंध्र की है, फायदा आंध्र को मिलना है, लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान छत्तीसगढ़ को होना है। सिमटती जा रही दोरला जनजाति को पहले पुलिस – नक्सली संघर्ष ने काफी नुकसान पहुंचाया। हर साल लोग मारे गए या पलायन करते चले गए । अब बची – खुची आबादी आंध्रप्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ने जा रही है। समय रहते उनकी आवाज़ नहीं उठाई गई, तो स्थिति गंभीर होते देर नहीं लगेगी।
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प्राचार्य को गुरु बनने से ऐतराज
शिक्षा मंत्री ने प्राचार्यों को अनिवार्य रूप से 2 पीरियंड पढ़ाने का फरमान जारी कर दिया तो पूरे शिक्षा जगत में हलचल मच गई। शिक्षक ही इस मामले को लेकर दो फाड़ में बंट गए हैं। एक धड़ा इस आदेश के खिलाफ है, उसे फिर से गुरु बनना गवारा नहीं है। प्रशासनिक काम का बोझ ज्यादा है, तो वहीं दूसरा धड़ा मानता है कि प्राचार्य भी मूलतः शिक्षक ही है, तो अपने ही संस्था में बच्चों को पढ़ाने में हर्ज कैसा? और कैसी मानहानि? वैसे दोनों धड़ों के अपने अपने तर्क हैं, लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा विभाग इस नए आदेश को लागू करवा पाएगा या नहीं। विभाग के कर्ता – धर्ता पहले बीआरसी, सीआरसी को भी स्कूलों में 2 पीरियड पढ़ाने का आदेश जारी कर चुके हैं, लेकिन व्यवहार में ऐसा हुआ नहीं। लेकिन अब प्राचार्यों को लेकर ऐसा ही आदेश जारी होने को लेकर लोग शंका जता रहे हैं कि कहीं यह फरमान भी पहले की तरह शिगूफा बनकर न रह जाए।
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राशन का खर्च भी जुगाड़ से !
दक्षिण – पश्चिम बस्तर बस्तर में कुछ अफसरों के नाज़ – नखरे उठाने में मातहत अफसरों, ठेकेदार – सप्लायरों के पसीने छूट जाते हैं, फिर भी साहब की नाराज़गी मोल लेने का रिस्क लेना नहीं चाहते हैं। सबसे ज्यादा समस्या नए नवेले अफसरों से है, कलेक्टरी मिलने से पहले जो अपनी ईमानदारी का ढोल तो पीटना चाहते हैं, लेकिन अपनी खुद की सैलरी से आहरण नहीं करना चाहते।
कुछ साहब तो ऐसे भी हुए जो अपनी सैलरी की चवन्नी भी अपने राशन पर खर्चना नहीं चाहते। एक नंबर का यह पैसा हिसाब शो करने में काम जो आता है। वैसे, यहां से विदा हो चुके एक साहब के बारे में चर्चा है कि सभी जनपद के सीईओ से 50 – 50 हजार रुपए अपने राशन के लिए उगाही किया करते थे। फिलहाल एक जिले के आईएएस सीईओ के नखरों की खूब चर्चा है, जिनके राशन का लाखों रुपया भुगतान पेंडिंग है। ठेकेदार और सप्लायर इसी उम्मीद में नखरे उठा रहे हैं कि उनके काम के भुगतान वाली पेंडिंग पड़ी फाइलों पर दस्तखत होंगे। बस्तर के ज्यादातर जिला पंचायतों में पेंडिंग फाइलों के ढेर लगने की एक वजह यही बताई जा रही है।
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मवेशियों के पीएम में भी रिश्वत !
सुकमा जिले में गाज गिरने से मवेशियों की मौत हो गई, तो मुआवजा मिलने की आस में पीड़ित पशुपालकों ने नियमानुसार मवेशियों का पोस्टमार्टम करवाना चाहा। हद तो तब हो गई जब सरकारी पशु चिकित्सक ने इसके एवज में 6 हजार वसूल लिए। मामला प्रकाश में तब आया, जब समाचार पत्रों में छपा। पता चलने पर विभाग के डिप्टी डायरेक्टर ने संबंधित पशु चिकित्सक को नोटिस जारी किया। वरना ऐसे कई मामले बिना किसी शोर शराबे के चलते रहते हैं। दक्षिण बस्तर में इस तरह के किस्सो की भरमार रहती है, लेकिन शिकायत के अभाव में कोई एक्शन नहीं हो पाता है। वैसे, इस विभाग के बड़े अफसरों पर पशुओं का चारा खाने का आरोप लगते रहे हैं। दंतेवाड़ा में गौशाला की गायों का चारा और कड़कनाथ मुर्गियों का दाना हजम करने को लेकर कुछ साल पहले काफी बवाल मच चुका है।

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