वन विभाग पर ही पेड़ कटाई का आरोप… (शब्द बाण -115)

वन विभाग पर ही पेड़ कटाई का आरोप… (शब्द बाण -115)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग-115

22 दिसंबर 2025

शैलेन्द्र ठाकुर। दंतेवाड़ा

अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी..

दक्षिण बस्तर में पहले नक्सली पुलिस का गला रेता करते थे। हाट-बाजारों में और जहां-तहां मौका मिलते ही पुलिस जवानों व अफसरों पर हमला कर देते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं, अधिकांश छोटे-बड़े कैडर के मारे जाने व थोक भाव में सरेंडर करने से नक्सल संगठन पानी मांग रहा है। वहीं, अब नया बदलाव यह दिखा है कि सिविलियन भी पुलिस की गर्दन काटने में जुट गए हैं। हाल में कलेक्ट्रेट के पास ही दिन दहाड़े पड़ोसी जिले के डीएसपी के गले में चाकू मारने की वारदात हो गई। यह हमला नक्सलियों ने नहीं, बल्कि 2 सिविलियन ने आपसी रंजिश वश किया। इसके पहले पुलिस का गला रेतने का जो एकाधिकार अंदरवाले दादाओं ने कायम किया हुआ था, उसे आम अपराधियों ने भंग कर दिया। यह भी विचित्र संयोग है कि दक्षिण बस्तर में डीएसपी रैंक के अफसरों के साथ पिछले कुछ समय से विवाद लगातार जुड़ रहे हैं। इस नक्सल प्रभावित इलाके में पदस्थ दो डीएसपी के मामले चर्चा के केंद्र में हैं। पहले एक महिला डीएसपी पर लगे आरोपों पर मचा बवाल पूरी तरह शांत हुआ भी नहीं था और नया कांड हो गया। वैसे दोनों ही मामलों की मूल वजह हनीट्रैप या शोषण ही है। लव ट्रायएंगल, धोखा से भरपूर स्क्रिप्ट पर अब आरोपी अफसर कितनी भी सफाई दें, यह भी सच है कि बगैर आग के धुंआ नहीं निकलता। कानून के रक्षक के तौर पर इतने बड़े गरिमामय पद पर रहते हुए सार्वजनिक जीवन में शुचिता रखने की अपेक्षा तो की ही जा सकती है।
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बदलावों के दौर में दंतेवाड़ा

एक विद्वान लेखक का लिखा पाठ दंतेवाड़ा के सन्दर्भ में याद आता है जिसमें कहा गया है कि वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है। यानी वर्तमान से कोई संतुष्ट नहीं रहता। कोई भूतकाल को बेहतर मानता है, तो कोई भविष्य के सपने देखता रहता है।
यही वजह है कि इस छोटे से जिले में कलेक्टर पर कलेक्टर बदले जा रहे हैं। कांग्रेस की भूपेश सरकार के समय से ही ऐसी स्थिति बनी हुई है। जबकि इसके पहले केआर पिसदा व केसी देवसेनापति तो 4 से साढ़े 4 साल की लंबी पारी खेलकर यहां से विदा हुए थे। कुछ अफसर तो तकनीकी दक्षता और असीमित प्रतिभा के बावजूद ज्यादा नहीं चल पाए क्रिकेटर संजय मांजरेकर और विनोद कांबली के जैसे छोटे करियर में सिमटते दिखे। अब भाजपा की दो साल पुरानी सरकार में भी अफसर सत्ता पक्ष को मनसा, वाचा, कर्मणा यानी मन, वचन और कर्म से पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं। पहले तिरंगा फ़िल्म में नाना पाटेकर की मुक्का लात वाली स्टाइल में काम करने वाले अफसर को नेताओं की शिकायत पर बदला गया, फिर इसके बाद अत्यंत मधुर व्यवहार कुशल अफसर की पोस्टिंग हुई, तो उनसे भी लोग आशंकित हुए कि ज्यादा मीठा से कहीं डायबिटीज न हो जाए। भले ही काम हो या न हो, साहब मीठे-मीठे बोल से लोगों का दिल जीत लेते थे। इसीलिए उन्हें भी बदल दिया गया। खैर, जो भी हो, सरकार के महज 2 साल के कार्यकाल में 3 कलेक्टरों का बदला जाना जिले वासियों के लिए शुभ संकेत नहीं है। क्षेत्र को देखने और समझ पाने से पहले अफसर बदल दिए जा रहे हैं।
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धान खरीदी की लिमिट
छत्तीसगढ़ सरकार रिकॉर्ड में भले ही प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदने का दावा कर रही हो, लेकिन व्यवहार में अधिकतम 12 से 15 क्विंटल की लिमिट फिक्स है। प्रशासन ने बीजापुर में 15, दंतेवाड़ा में 12, सुकमा में 13 क्विंटल धान खरीदने की लिमिट फिक्स कर दिया है। कोचियों पर नकेल कसने की आड़ में आम किसानों पर भी ज़्यादती हो रही है। बीजापुर में कांग्रेस और सुकमा में सीपीआई ने इस लिमिट को लेकर विरोध दर्ज कराने की खानापूर्ति कर दी है। दंतेवाड़ा में मरणासन्न हालत में आ चुके विपक्ष के पास फिलहाल ऐसे मामलों के लिए फुर्सत ही नहीं है
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दंतेवाड़ा का सुकमा कनेक्शन
एक वक्त था जब दंतेवाड़ा जिले में पदस्थ अफसरों को नवगठित जिला सुकमा में पोस्टिंग दी जाती थी, ताकि यहां के अनुभवों का लाभ उस जिले को मिल सके। दंतेवाड़ा में जिला पंचायत सीईओ रहे आईएएस द्वय पी दयानंद और नीरज बंसोड़ ने सुकमा कलेक्टर के तौर पर पदस्थ होकर अपने बेहतर काम से इस अवधारणा को सार्थक भी किया। अब बीते कुछ समय से पोस्टिंग का यह प्रवाह उल्टा हो गया है। अब सुकमा से दंतेवाड़ा पोस्टिंग हो रही है। वेटनरी विभाग, फारेस्ट, पीएमजीएसवाय, स्वास्थ्य विभाग में सुकमा से दंतेवाड़ा की ओर पोस्टिंग के अलावा अब तक दो कलेक्टर भी सुकमा से सीधे दंतेवाड़ा शिफ्ट किए जा चुके हैं। ज्यादा फंड वाले बड़े पड़ोसी जिले में पोस्टिंग को प्रमोशन ही माना जाता है। हालांकि पुराने महोदय के विवादास्पद कार्यकाल के अनुभव को देखते हुए लोग शंकित भी हैं। भूपेश सरकार के कार्यकाल में मिले इस दर्द से जिला अब भी कराह रहा है। महोदय की कारगुजारियों से डीएमएफ फंड माइनस में चला गया था, जिसका गड्ढा अब तक नहीं भरा जा सका है। लेकिन अब कुछ अच्छा होगा इस उम्मीद पर लोग नई शुरूआत का इंतजार कर रहे हैं।
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स्वच्छता अभियान की पोल
संपूर्ण स्वच्छता अभियान और अन्य नामों से गाहे-ब-गाहे आम जनता को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने वाले जिला पंचायत के परिसर में दीया तले अंधेरा जैसी स्थिति बनी हुई है। दफ्तर के सार्वजनिक शौचालयों में घुसना तो दूर आस-पास नाक धरना तक मुश्किल रहता है। न तो रनिंग वाटर की उचित व्यवस्था है, न ही साफ-सफाई की। लोग दफ्तर के शौचालय की जगह खुले में शौच करना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसी ही स्थिति संयुक्त कलेक्ट्रेट भवन की भी है। दंतेवाड़ा हो या संभाग मुख्यालय जगदलपुर का जिला कार्यालय, सभी जगह कमोबेश यही स्थिति रहती है। अगर अफसर दफ्तरों के औचक निरीक्षण की परंपरा निभाने के साथ ही पुराने निर्मल ग्राम अभियान की तरह दफ्तर के सार्वजनिक प्रसाधन की तरफ भी झांकना शुरू कर दें, तभी स्थिति सुधरेगी।
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वन विभाग पर ही पेड़ काटने का आरोप
आम तौर पर पेड़ कटाई करने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के मामले में रोकथाम करने के लिए वन विभाग मजबूती के साथ खड़ा हुआ दिखाई पड़ता है, लेकिन इस बार बस्तर के बीजापुर जिले में वन विभाग खुद आरोपों के कटघरे में खड़ा है। कूप कटाई के नाम पर जंगल में अच्छे खासे पेड़ों को काटने को लेकर बवाल मचा हुआ है। विपक्षी दल कांग्रेस को जहां वन विभाग को घेरने का मौका मिल गया है, वहीं दूसरी तरफ विभाग अपनी सफाई देने में जुट गया है कि सिर्फ उम्रदराज पेड़ों को ही काटकर जंगल सुधारा जा रहा है।
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भीमा के गांव की उपेक्षा
दंतेवाड़ा सीट पर जीत का परचम लहराकर पहली बार भाजपा का खाता खोलने वाले दिवंगत पूर्व विधायक भीमा मंडावी के गृह ग्राम गदापाल की उपेक्षा से लोग आहत हैं। दो बार विधायक बन चुके भीमा ने लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रत्याशी का प्रचार करते नक्सलियों के हाथों जान गंवाई, लेकिन भाजपा की सरकार फिर से बनने के बाद भी गदापाल गांव विकास से कोसों दूर है। नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना नियद नेल्ला नार की परछाई तक इस गांव में नहीं पहुंच सकी है। सिर्फ जन्म जयंती व पुण्यतिथि पर गांव जाकर पार्टी के लोग श्रद्धांजलि अर्पित कर आते हैं, जिनकी संख्या भी साल-दर-साल घटती जा रही है।

✍🏻 शैलेन्द्र ठाकुर की कलम से

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