गुड़ से परहेज..गुलगुलों से नहीं..(शब्द बाण – 142)

गुड़ से परहेज..गुलगुलों से नहीं..(शब्द बाण – 142)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द – बाण ‘ भाग – 142
28 जून 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

मानसून की तरह अटकी ट्रांसफर की फाइल।

अल नीनो के प्रभाव से अटके मानसून की तरह जिला पंचायत सीईओ ट्रांसफर की लिस्ट भी फंस गई है। नतीजा यह हुआ कि बस्तर में पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय से कुछ प्रशासनिक अफसर जिला पंचायतों में जमे हुए हैं और आए दिन जन प्रतिनिधियों के साथ खींचतान मची रहती है। लंबा समय बीतने से अफसर खुद इस पोस्टिंग से उकता गए हैं। आलम यह है कि जिला प्रशासन के इतर अलग ही समानांतर प्रशासन चला रहे अफसरों के खिलाफ मोर्चे भी खुलते जा रहे हैं। बीजापुर व बस्तर जिला पंचायत में तो ऐसी खींचतान सार्वजनिक भी हो चुकी है। जनप्रतिनिधियों को प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी पीड़ा उजागर करने की नौबत आई है। इस टकराव का असर विकास कार्यों पर पड़ने लगा है। फसल की तरह विकास कार्यों का भी सूखा पड़ता दिख रहा है। नक्सलमुक्त घोषित होते जा रहे जिलों में यह स्थिति काफी चिंताजनक है। वहीं, दूसरी तरफ सरकार मंत्री – मंत्री खेलने में व्यस्त है। मजेदार बात यह है कि बस्तर संभाग के एक चर्चित और सबसे धनी जिले में तो सरपंच संघ जिलाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री जनदर्शन में गुहार लगाकर पूछा भी है कि आखिर जिला पंचायत सीईओ का ट्रांसफर कब होगा? जिसे पोर्टल में पेंडिंग मामला बताया गया है।
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आईसीडीएस मिनिस्टर का प्रवास

आईसीडीएस यानी महिला व बाल विकास विभाग की मिनिस्टर इन दिनों बस्तर प्रवास पर हैं। वह भी ऐसे समय में जब दंतेवाड़ा जिले में अफसरों की करतूत की वजह से विभाग घायल होकर भीष्म पितामह की तरह बाणों की शैया पर पड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना के लाखों रुपए की राशि फर्जी हितग्राहियों के खाते में ट्रांसफर का मामला हो, या यौन उत्पीड़न के आरोप में अफसर के निलंबन, पोस्टिंग और फिर ट्रांसफर का मामला, जिले में विभाग की काफी बदनामी हुई है। इन हालातों के बीच विभागीय मंत्री अड़ोस – पड़ोस के जिलों का भ्रमण कर गईं, लेकिन दंतेवाड़ा प्रवास पर नहीं आईं। सुकमा – बीजापुर – नारायणपुर प्रवास के दौरान काफिला जरूर यहां से गुजरा। लेकिन दंतेवाड़ा में कोई निरीक्षण, बैठक, समीक्षा वाला कार्यक्रम नहीं बना।उन्हें मीडिया के चुभते सवालों का सामना करना पड़ सकता था। संभवतः इसीलिए विभागीय रणनीतिकारों ने मंत्री के प्रवास सूची से दंतेवाड़ा को स्किप कर दिया।

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गुड़ से परहेज, गुलगुलों से नहीं
सरकार की नवरत्न कंपनियों में से एक एनएमडीसी इन दिनों सुर्खियों में है। विपक्षी दल कांग्रेस की नेत्री व जिला पंचायत सदस्य तूलिका कर्मा ने टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगाते मोर्चा खोल दिया, तो प्रबंधन को सफाई देना पड़ गया। यह भी कड़वा सच है कि बैलाडीला में दशकों से लौह अयस्क खनन कर रहे इस सार्वजनिक उपक्रम ने ढंग से क्षेत्र का विकास किया होता तो शायद खदानों के आसपास का पूरा इलाका विकसित हो चुका होता, लेकिन स्थिति इसके उलट है। उपक्रम के अफसर यह दावा करते हैं कि वो सीधे विकास कार्य नहीं करते हैं, बल्कि प्रशासन को राशि हैंडओवर कर देते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। कुछ जगह चुनिंदा एनजीओ के माध्यम से खानापूर्ति हो रही है, तो वहीं, परियोजना के नजदीकी ग्राम पंचायतों में खुद एनएमडीसी द्वारा ग्राम पंचायतों की सहमति के बगैर ही ठेकेदारों से सीसी सड़क और अन्य निर्माण कार्य करवाए जा रहे हैं, जिससे ग्राम पंचायतें व सरपंच नाराज चल रहे हैं। कुल मिलाकर ‘गुड़ से परहेज, गुलगुलों से नहीं ‘ वाली स्थिति है।
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फिर निकला संलग्नीकरण का जिन्न
नया शिक्षण सत्र शुरू होते ही संलग्नीकरण का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया है। खानापूर्ति करने के लिए मंत्रालय, संचालनालय से लेकर जॉइंट डायरेक्टर, डीईओ, बीईओ तक चिट्ठी – पत्री चलने लगी है। सबको यह पता है कि अंततः इस कागजी उठापटक के बाद मामला फिर से शांत हो जाना पहले से तय है। निकल आए जिन्न को फिर से बोतल में बंद करने और कार्क वाला ढक्कन लगाने में खर्च जरूर आता है, यही सारी प्रक्रिया का सार तत्व है। प्रशासनिक और लिपिकीय संवर्ग व अधीक्षकों की भर्ती/प्रमोशन के बगैर संलग्नीकरण पूरी तरह खत्म करना नामुमकिन है। इसके बाद भी जड़ को छोड़कर पत्ते सींचने वाली खानापूर्ति होती रहती है।
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सरकारी स्कूल में डोनेशन का रोग !!

निजी स्कूल – कॉलेज में डोनेशन लेने की प्रथा के बारे में अपने सुना ही होगा, लेकिन बस्तर के एक सरकारी स्कूल में एडमिशन के नाम पर पालकों से डोनेशन मांगने का अनोखा मामला सामने आया है। बच्चों को अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाने चाहत लिए पालक जब एडमिशन के लिए पहुंचते हैं, तो उनसे यह कहकर डोनेशन मांगा जाता है कि फंड की कमी है। अतिरिक्त खर्च के लिए डोनेशन देना होगा। नगदी नहीं, तो कम से कम सामग्री से सहयोग करें। पेरेंट्स यह कहकर खुद को समझाने में लगे हैं कि आत्मानंद अंग्रेजी मीडियम वाला कॉन्सेप्ट कांग्रेस की सरकार लेकर आई थी, तो संभवतः फंड का संकट अब स्कूल को झेलना पड़ रहा होगा। इसके पहले रमन सरकार के कॉन्सेप्ट वाले मुख्यमंत्री – डीएवी मॉडल स्कूलों को भी कांग्रेस सरकार में ऐसी ही उपेक्षा झेलकर पाई – पाई को मोहताज होना पड़ा था। श्रृंखला अभिक्रिया की तरह यह सतत प्रक्रिया जारी ही रहने वाली है।।
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धान को लेकर बेफिक्री
सरकार समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी तो करती है, लेकिन उसके उठाव की चिंता नहीं करती है। खरीदी केन्द्रों में पड़े – पड़े धान को कभी चूहे कुतर जाते हैं, तो कभी सूरज दादा के प्रकोप से धान सूखकर कांटा हो जाता है और खरीदी करने वालों को सूखती का नुकसान भरना पड़ता है। इस बार तो हद हो गई है। मुसवा राजा और सूरज दादा के उपभोग के बाद अब जल बरसाने वाले इन्द्रदेव के इंतजार में बस्तर में धान की बोरियां खरीदी केन्द्रों में ही पड़ी हुई हैं। वो तो गनीमत है कि अल नीनो के प्रभाव से मानसून अभी तक अपना रंग नहीं दिखा रहा है। आंकड़े बता रहे हैं कि बस्तर संभाग में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए हजारों टन धान का अब तक उठाव नहीं हो पाया है। दंतेवाड़ा जिला छोड़कर बाकी छह जिलों के उपार्जन केंद्रों में अभी भी 34 हजार मीट्रिक टन धान शेष है। ऐसी ही स्थिति रही तो फिर करोड़ों का धान भीगकर अंकुरित होते देर नहीं लगेगी।
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फ्रॉड को धर दबोचा पुलिस ने

दंतेवाड़ा पुलिस ने एक संविदा कर्मचारी से 65 लाख यानी आधा करोड़ से ज्यादा की साइबर धोखाधड़ी करने के आरोपियों को धर दबोचा है। यह बड़ी कामयाबी है। गनीमत यह रही कि पुलिस ने पूरी ईमानदारी से काम करते हुए आरोपियों की धरपकड़ पर अपना ध्यान धनुर्धर अर्जुन की तरह फोकस किया हुआ था, वरना फरियादी के आय के स्रोत की जांच में उलझना भारी पड़ सकता था कि मनरेगा के संविदा तकनीकी सहायक के पास धोखा खाने के लिए इतनी बड़ी रकम आई कहां से?
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प्रवेशोत्सव किसके लिए?
छत्तीसगढ़ में नए शिक्षण सत्र की शुरुआत में शाला प्रवेशोत्सव मनाने का रिवाज चल पड़ा है। इसमें स्कूल में प्रवेश लेने वाले नव प्रवेशी बच्चों को तिलक लगाकर स्वागत सत्कार किया जाता है। लेकिन इस बार सुकमा में हुए प्रवेशोत्सव को लेकर काफी चर्चा है। जिन नौनिहाल बच्चों का स्वागत हुआ, वो तो फर्श पर टाटपट्टी में बिठाए गए, और अतिथिगण कुर्सी पर विराजमान हुए। अतिथियों को ड्राई फ्रूट, मिठाई खिलाई गई, वहीं जलपान के नाम पर बच्चों को खुले हुए बिस्किट थमाए गए। बच्चे मन मसोसकर रह गए। इसी तरह के प्रवेशोत्सव दूसरी जगहों पर भी आयोजित हो रहे हैं।

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चलते – चलते..
बस्तर में लंबे समय तक पदस्थ रहे आईजी सुंदरराज पी की विदाई हो गई है। बस्तर एसपी रह चुके सुंदरराज की आईजी के तौर पर बस्तर वापसी हुई। नक्सलवाद के खिलाफ प्रभावी काम करने वाले अफसर के तौर पर उन्होंने गहरी छाप छोड़ी। नाम के अनुरूप अपने सुंदर काम से आईपीएस अफसर ने बता दिया कि शालीनता और विनम्रता पूर्वक भी पुलिस की अफसरी की जा सकती है। सशस्त्र नक्सलवाद के खात्मे के संकल्प को अंजाम तक पहुंचाने का पुरस्कार मिला और अब उन्हें एनआईए जैसी राष्ट्रीय एजेंसी में डेपुटेशन पर पदस्थ किया गया है।
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