साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द – बाण (भाग 146)
26 जुलाई 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
डीएमएफ जिले में चंदे से सड़क मरम्मत !!
दंतेवाड़ा जिले में एक अजीबो-गरीब वाकया चर्चा का विषय बन गया है। यहां बाढ़ से क्षतिग्रस्त सड़क की मरम्मत के लिए ग्रामीणों को चंदा इकट्ठा करना शुरू करना पड़ा, ताकि सड़क की मरम्मत कर बारिश में चलने लायक बना सकें। सैकड़ों करोड़ के सालाना डीएमएफ फंड के आसामी जिले में यह अजब का विरोधाभास सामने आया है।
दरअसल, बीते साल 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ में दंतेवाड़ा के बालपेट भैरमबंद से खालेपारा बालपेट की पक्की सड़क और पुलिया क्षतिग्रस्त हो गई थी, जिससे महीनों मार्ग बंद रहा। मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना से बनी इस सड़क का निर्माण व संधारण करने वाले पीएमजीएसवाई विभाग ने यहां रिटेनिंग वाल बनाकर मजबूत सड़क बनाने, नया ऊंचा पुल बनाने के सपने तो दिखाए, लेकिन विभाग के अकर्मण्य अफसरों की लापरवाही के चलते साल भर में भी यह काम शुरू नहीं हुआ। अब बरसात में सड़क फिर से दलदल होने लगी तो ग्रामीणों के सब्र का बांध टूट गया और जागरूक ग्रामीणों ने जन सहयोग चंदा से रकम एकत्र कर मुरूम, गिट्टी मंगवाना शुरू कर दिया। मजेदार बात यह है कि हताश युवाओं की इस पहल को सराहने की बजाय सरपंच ने उन्हें नोटिस जारी कर इस कदम को प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की नाक कटवाने वाला करार दिया और तत्काल काम बंद करने की चेतावनी भी दी, लेकिन जेनजी युवा सड़क पर पर मुरूम पाटकर ही माने। कुल मिलाकर इस घटनाक्रम ने शासन के आपदा प्रबंधन और पीएमजीएसवाय की अकर्मण्यता की पोल खोलकर रख दी है। साथ ही डीएमएफ फंड को हाथी का दांत भी साबित कर दिया है, जो सिर्फ दिखाने के काम आता है।
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खेल विभाग पर ग्रहण
दंतेवाड़ा जिले में खेल विभाग पर बुरे ग्रहों का साया पड़ गया लगता है। कभी इसे शनि की साढ़े साती लग जाती है, तो कभी अढ़ैया का असर शुरू हो जाता है, तभी तो बीते दो दशक से ज्यादा समय से इसे एक भी पूर्णकालिक जिला खेल अधिकारी नहीं मिल पाया है। कभी प्रशासनिक अफसरों को इसकी कमान सौंपी जाती है, तो कभी किसी अन्य को यह जिम्मेदारी मिलती है, जिनका खेलों से दूर – दूर तक कोई नाता नहीं होता है। विडंबना यह है कि जो कभी बैडमिंटन का रैकेट तक नहीं पकड़ा हुआ होता है, वो जिला का प्रभारी खेल अधिकारी बन जाता है। ये बात और है कि खेल भौतिक रूप से हों या न हों, लेकिन कई बड़े आयोजनों में करोड़ों का खेला करने का भरपूर मौका इसमें मिल जाता है।
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स्मार्ट मीटर से लग रहा झटका
जब से लोगों के घरों, प्रतिष्ठानों में स्मार्ट मीटर लगा है, बिजली कुछ ज्यादा ही झटके देने लगी है। यह झटका करेंट से नहीं, बल्कि बिजली बिल में अचानक शेयर मार्केट की तरह उछाल की वजह से लग रहा है। बिल कई गुना ज्यादा आने की शिकायतों का अम्बार लग गया है। कोई शिकायत करे तो माननीय लोग पीएम सूर्य घर योजना और सौर ऊर्जा के नाम की माला जपने लगते हैं।
त्रस्त लोग आशंका जता रहे हैं कि महतारी वंदन जैसी फिजूल की लॉलीपॉप योजना का खर्च भी बिजली बिल से वसूला जा रहा है। दशकों से सिंगल बत्ती कनेक्शन के नाम पर धड़ल्ले से हर माह मुफ्त की सैकड़ों यूनिट बिजली जलाने वालों और हुकिंग से बिजली चोरी पर नियंत्रण की कोशिश तो विभाग नहीं करता है, उल्टे इनके खर्च की भरपाई आम उपभोक्ताओं से वसूलता आ रहा है। सिंगल बत्ती कनेक्शन सिर्फ गरीब व जरूरत मंद लोगों तक ही सीमित नहीं रह गया है, आर्थिक रूप से सक्षम हो चुके लोग भी इसका फायदा उठा रहे हैं, जिसकी समीक्षा और पड़ताल की कोशिश दशकों से नहीं हुई।
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जड़ की जगह पत्ते की सिंचाई
शिक्षा विभाग में जड़ की बजाय पत्ते की सिंचाई करने की आदत जाती नहीं दिख रही है। शिक्षकों से अटैचमेंट के जरिए कई प्रकार के प्रशासनिक और दफ्तरी काम – काज दशकों से करवाया जाता रहा। इस बीच इन पदों पर भर्ती या प्रमोशन की कोशिश ही नहीं की गई। अचानक शिक्षा मंत्री ने अटैचमेंट खत्म करने के पारंपरिक जुमले को इस बार कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया। अब शिक्षक मूल स्कूलों को लौटाए जाने लगे हैं, तो दफ्तरी और प्रशासनिक कामकाज की चूलें हिलती दिख रही है। दक्षिण बस्तर में कई जगह बीआरसी दफ्तर सूने हो गए हैं और बीईओ को बीआरसी का अतिरिक्त प्रभार लेना पड़ा है। देर सवेर निश्चित “सेवा शुल्क” के साथ रिनीवल हो जाएगा, इसी उम्मीद के साथ कुछ गुरुजी भारी मन से स्कूलों में लौट चुके हैं।
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अस्पताल के निजीकरण की आशंका
दंतेवाड़ा जिले के स्वास्थ्य कर्मचारियों ने स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की आशंका जताते रैली निकाली और विरोध जताया। कर्मचारियों का विरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब जिले में नया मेडिकल कॉलेज खुलने को है और एनएमसी से इसकी प्रारंभिक औपचारिक मान्यता मिल चुकी है। जिला हॉस्पिटल में इसकी शुरुआत होनी है। इधर, करोड़ों रुपए फूंक कर बनाए गए हमर लैब के संचालन का जिम्मा सरकार प्रायोजित कम्पनी को मिल चुका है। जो स्टाफ से लेकर मशीनें तक अपनी लेकर आ रही है। इसकी वजह से ही हॉस्पिटल के पुराने कर्मचारी अपनी जॉब सिक्योरिटी को लेकर आशंकित हो उठे हैं। विभिन्न योजनाओं, जीवनदीप समिति और डीएमएफ मद से अल्प मानदेय पर वर्षों से काम कर रहे अस्थायी कर्मचारियों को अपने भविष्य की चिंता महंगाई डायन की तरह खाए जा रही है। अब देखना यह है कि सरकार सामाजिक सुरक्षा और जन सरोकार की नीति पर कितना कायम रहती है।
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डेढ़ दशक बाद टूटा ट्रेन का मिथक
करीब डेढ़ दशक बाद यह पहला मौका आया है, जब 28 जुलाई से 5 अगस्त तक यात्री ट्रेनों को बैलाडीला तक जाने से नहीं रोका गया है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा नक्सलवाद से मुक्ति के लिए घोषित 31 मार्च की डेडलाइन समाप्त होने का ही यह असर है। अब ट्रेनें दंतेवाड़ा या जगदलपुर में रोकी नहीं जा रही हैं। इससे बैलाडीला से विशाखापटनम रूट पर सफर करने वाले यात्री काफी खुश हैं। वरना इसके पहले सालाना नक्सली कैलेंडर का पालन नक्सलियों से ज्यादा गंभीरता से रेलवे के अफसर किया करते थे। जून, जुलाई, अगस्त में 28 से 5 तारीख तक आयोजित होने वाले विभिन्न नक्सली सप्ताहों में रेलवे खुद ब खुद यात्री ट्रेन स्थगित कर दिया करता था। यह बात और है कि इसके बदले मालगाड़ियों के फेरे इन दिनों जरूर बढ़ जाते थे। अब नक्सल मुक्ति के ऐलान से पहली बार हालत बदले हैं।
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आपदा में अवसर
साल भर पहले अगस्त महीने में दंतेवाड़ा में आई विनाशकारी बाढ़ ने भले ही कईयों को बेघर बार बना दिया, लेकिन इस मौके को भी कुछ लोगों ने आपदा में अवसर की तरह भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। आपदा प्रबंधन के लिए जो राशि मिली उससे जिस इलाके में जो ज्यादा जरूरी है, उस काम की बजाय दूसरे कार्यों की मंजूरी पीडब्ल्यूडी, पालिका और कुछ अन्य विभागों ने करवा ली है। कई जरूरी सड़कों व पुल-पुलिये की रिपेयर साल भर में भी नहीं हो सकी है। कहीं कहीं बांस – बल्लियां गाड़कर बेरीकेडिंग करने की नौबत आई है। वहीं पीडब्ल्यूडी ने तो क्रिकेटर वैभव सूर्यवंशी की तरह ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की भरपूर कोशिश करते हुए बाढ़ से क्षतिग्रस्त बताकर शहर की ऐसी कॉलोनियों के शासकीय क्वार्टर्स की मरम्मत की भी मंजूरी ले ली है, जिस तरफ बाढ़ का पानी पहुंचा ही नहीं। मजेदार बात यह है कि ये क्वार्टर्स एफ टाइप वाले ज्यादा हैं, जिनका इस्तेमाल अफसरों के आवासीय प्रयोजन में होता है, जबकि बीते कुछ सालों से छोटे कर्मचारियों के लिए बने जी – टाइप, एच – टाइप और आई – टाइप के क्वार्टर्स की मरम्मत के लिए मांग करते कर्मचारी थक चुके हैं। छत को तिरपाल ढांपकर और उधड़ती छतों को जाली से थामकर रह रहे इन कर्मचारियों की भी उम्मीद बाढ़ आपदा की बहती गंगा में हाथ धोने की जागी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आखिर छोटे कर्मचारी जो ठहरे।
इस सिचुएशन पर हिंदी के महान कवि दुष्यंत कुमार की गजल का यह अंश फिट बैठता है –
“न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।”
