साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 145
19 जुलाई 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
कब करोड़ीमल बनेंगी पंचायतें ?
बस्तर रेंज में नक्सलवाद से मुक्ति के लिए छटपटा रही सरकार ने नियद नेल्ला नार यानी आपका बेहतर गांव योजना राज्य सरकार ने लॉन्च की थी, जिसका जोर – शोर से क्रियान्वयन शुरू किया गया। फोर्स के कैंप वाले गांव और उसके 5 किमी के दायरे में आने वाले गांवों तक विकास की गंगा बहाने की तैयारी थी, जिसमें आधार कार्ड, राशन कार्ड, पेयजल, मोबाइल कवरेज से लेकर तमाम सुविधाएं मिलने वाली थी। कुछ गांवों में काम हुआ भी। ताकि विकास कार्यों के जरिए ग्रामीणों का विश्वास जीतकर माओवाद के प्रति मोह भंग करवा सकें। युद्ध स्तर पर सर्वे से आंकड़े जुटाए गए। लेकिन इसी बीच केंद्रीय गृहमंत्री ने सशस्त्र माओवाद के खात्मे की डेडलाइन 31 मार्च 2026 घोषित कर दी और सैकड़ों नक्सलियों के सरेंडर से यह संकल्प पूरा होता दिख भी गया। अब इसके बाद नियद नेल्ला नार योजना वाले गांवों की तरफ अफसर झांक कर भी नहीं देख रहे हैं। गांवों के विकास रथ का पहिया फिर से दलदल में धंसता दिख रहा है। हाल ही में विधानसभा सत्र में बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने नक्सल मुक्त पंचायतों को 1 – 1 करोड़ देने की घोषणा के फॉलोअप के बारे में सवाल पूछकर सरकार को निरुत्तर कर दिया। वास्तव में अगर समूचा बस्तर नक्सल मुक्त हो गया है, तो हरेक पंचायत को करोड़ीमल हो जाना चाहिए।
अभी जो हालात हैं उस पर
स्व दुष्यंत कुमार जी के शब्दों में
“कहां तो तय था चिराग़ , हरेक घर के लिए..।
यहां एक चिराग़ भी मयस्सर नहीं शहर भर के लिए ।। ”
(मयस्सर = उपलब्ध, चिराग़= दीया)
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सड़क पर मछली पकड़ने का इंतजार
दक्षिण बस्तर की व्यवसायिक नगरी गीदम के विभिन्न हिस्सों और दंतेवाड़ा मार्ग में सड़क पर बरसात का पानी भरने की समस्या का निदान अब तक नहीं ढूंढा जा सका है। बीते साल विपक्षी दल के कार्यकर्ताओं ने तो गीदम के मंडी चौक में सड़क पर जाल लगाकर मछलियां पकड़ने के उपक्रम से विरोध प्रदर्शन किया था। इस बार भी विरोध प्रदर्शन की तैयारी तो है, पर मानसून कभी गुगली बॉल फेंक रहा है, तो कभी रिवर्स स्विंग से छका रहा है। वहीं, गीदम की सरकारी दारू दुकान वाली सड़क को लेकर मदिरा प्रेमियों की शिकायत है कि सरकार उनके पैसों से ही चल रही है, लेकिन सड़क ठीक नहीं की जा रही है । इसकी हालत ऐसी है कि गिरते – पड़ते मंजिल तक पहुंचना पड़ता है। ज्यादा ग्राउंड क्लीयरेंस वाली गाड़ी हो तो ठीक, वरना गड्ढों को पार करने के लिए एड़ी – चोटी का जोर लगाने की नौबत आ जाती है। ऐसे ही कारली में पुलिस लाइन और निर्मल निकेतन के सामने तो ऐसी धर्म संकट की स्थिति रहती है कि सड़क पर बने बरसाती तालाब से बचें या महोदय के बनवाए बेतुके स्वागत द्वार से ?
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जब कोतवाल धरे गए कोतवाली में
” सैंया भये कोतवाल, तब डर काहे का, ” कहावत आपने सुनी होगी। लेकिन बस्तर में यह कहावत पलटकर सिर के बल शीर्षासन करता दिख रहा है। यहां कोतवाल ही हिरासत में लेकर कोतवाली में अंदर किए जा रहे हैं। ताजा मामला नारायणपुर जिले का है, जहां सैलरी बीमा योजना में बीमा का पैसा दिलाने के नाम पर कमीशनखोरी का आरोप लगा, तो जांच के बाद पूर्व दरोगा को साहब ने गिरफ्तार कर जेल भिजवा दिया है। दरोगा के अंदर होने का यह कोई पहला मामला नहीं है। इसके पहले सुकमा में कोंटा थाना के दरोगा यानी टीआई को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। मामला पत्रकारों को गांजा प्रकरण में फंसाने और डीवीआर निकालकर साक्ष्य मिटाने के आरोप का था। हालांकि, खानापूर्ति वाली कार्रवाई के बाद उक्त दरोगा न सिर्फ रिहा हुआ, बल्कि बहाली और नक्सल क्षेत्र से मैदानी क्षेत्र में पोस्टिंग का ईनाम भी पा गया। गनीमत है कि असाधारण वीरता का कोई पदक नहीं दिलवा दिया गया।
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अफसर के आगे मंत्री की बीन भी बेअसर
छत्तीसगढ़ सरकार के कड़े रुख और सुशासन के दावों को बीजापुर का पशुधन विकास विभाग खुलेआम चुनौती दे रहा है। अफसर विभागीय मंत्री के कड़े और लिखित आदेश को भी ठेंगा दिखा रहे हैं। दरअसल, यहां पदस्थ एक सहायक पशु चिकित्सा क्षेत्र अधिकारी के खिलाफ विभागीय मंत्री तक पहुंची शिकायत में बताया गया कि उक्त अधिकारी पिछले 30 वर्षों से एक ही जिले में जमा हुए हैं, ऊपर से नियमों को ताक पर रखकर पिछले 2 दशक से मूल कार्य करवाने की बजाय उपसंचालक दफ्तर में ‘संलग्न’ कर भंडार शाखा का प्रभारी बना दिया गया है। दवाई खरीदी और डीएमएफ निधि के पैसों में भारी वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोपों के बावजूद अधिकारी इस मलाईदार कुर्सी को छोड़ना नहीं चाहते। पिछले 20 वर्षों में इनका दो बार अन्यत्र तबादला भी हुआ, लेकिन ट्रांसफर ऑर्डर को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया। नए रिलीवर के आने के बाद भी इन्हें कार्यमुक्त नहीं किया गया। जब इस घोटाले और मनमर्जी की भनक विभागीय मंत्री को लगी, तो उन्होंने मामले को बेहद गंभीरता से लिया। मंत्री ने सख्त लहजे में कार्य मुक्ति का निर्देश जारी कर चेताया कि ऐसा नहीं करने पर बड़े अधिकारी के विरुद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही होगी, लेकिन 3 सप्ताह बाद भी आदेश का पालन नहीं हुआ। अब देखने वाली बात ये होगी कि कैबिनेट मंत्री के आदेश को न मानने वाले उपसंचालक पर विभाग कोई कार्रवाई करता है? या सिर्फ भैंस के आगे बीन बजाने जैसी स्थिति बनी रहती है।
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कश्मीर से भी बड़ी समस्या
खबर है कि अब एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस गांव की सड़कों की निगरानी करेगा, जो छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पीएमजीएसवाई और जनमन योजना की सड़कों पर पैनी नजर रखेगा। जिसमें पहले सभी सड़कों की वीडियोग्राफी होगी, फिर एआई तकनीक से उनकी गुणवत्ता की जांच की जाएगी। लेकिन दंतेवाड़ा जिले में हिडेन यानी गुप्त अधूरी सड़कों के मामले में एआई भी फेल होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। भले ही सरकार ने फोर्स की मदद से अरनपुर-जगरगुंडा मार्ग और बारसूर-नारायणपुर मार्ग को खोलने का असंभव दिखने वाला कार्य पूरा कर दिखाया हो, लेकिन ‘दीया तले अंधेरा ‘ की तर्ज पर कुछ पीएमजीएसवाई सड़कें जिला मुख्यालय के इर्द – गिर्द ही वर्षों से अधूरी पड़ी हैं। दंतेवाड़ा के कतियाररास से डेगलपारा सड़क 21 साल से, और टेकनार के कतियार पारा से मेन रोड तक की सड़क दशक भर से अधूरी पड़ी हुई हैं। सड़कों के मेंटेनेंस के नाम पर वर्षों से अफसर लाखों का वारा – न्यारा करते आ रहे हैं। इन सड़कों का नामकरण ही गोल – मोल ढंग से किया गया था, जिसकी वजह से इनकी ट्रैकिंग में एआई तकनीक के भी पसीने छूट सकते हैं। जबकि विभागीय मंत्री का दावा है कि इस तकनीक से अच्छी गुणवत्ता वाले कार्यों को सम्मान मिलेगा और 7लापरवाही व गड़बड़ी करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी।
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कर्मा के नाम का विलोपन
व्यवसायिक नगरी गीदम में बने शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के नामकरण का विवाद अचानक उठा। शहीद महेंद्र कर्मा के नाम पर स्वीकृत हुए इस प्रोजेक्ट के पूरा होते ही उनका नाम गायब होने को लेकर बवाल मच गया। अब ये नाम निकाय के अधिकारियों ने जानबूझकर गायब किया या मामला कुछ और था, ये तो वो ही जानें, पर इसे लेकर ध्यानाकर्षण भी एक भाजपाई नेता ने ही करवाया। कांग्रेसियों का कहना है कि पूर्व नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेसी नेता स्व महेंद्र कर्मा और भाजपाई विधायक स्व भीमा मंडावी दोनों ने ही नक्सली हमले में अपनी शहादत दी थी, दोनों ने अपार जन स्वीकार्यता हासिल की थी। स्व कर्मा की प्रतिमा तो शहर में स्थापित हो चुकी है, लेकिन सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा अपने पक्ष के दिवंगत विधायक भीमा मंडावी की प्रतिमा के लिए जगह तक नहीं ढूंढ पाई है, जबकि स्व भीमा ने ही दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर पहली बार भाजपा का खाता खोला था और पार्टी का चुनाव प्रचार करने के दौरान नक्सली हमले का शिकार बने थे।
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बाबू पर फूटा ठीकरा
सुकमा जनपद में पदस्थ एक बाबू का ट्रांसफर हो गया, लेकिन उनका जाने का मन नहीं हुआ। जनाब पुराने कार्यालय में ही डटे रहे। ट्रांसफर के बाद करीब साढ़े 17 लाख रुपये के चेक जारी कर दिए। बाद में प्रशासन ने इसे अनुशासनहीनता माना और निलंबित कर दिया। वजह भी दमदार बताई गई। अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर बाबू का ट्रांसफर हो चुका था, तो क्या यह बात कार्यालय प्रमुख को नहीं पता थी? यदि पता थी, तो उन्हें तत्काल कार्यमुक्त क्यों नहीं किया गया? और सबसे बड़ा सवाल यह कि चेक पर हस्ताक्षर किसके होते हैं- बाबू के या कार्यालय प्रमुख के?
वहीं, जब चेक जारी हो रहे थे, तब सब कुछ ठीक था। लेकिन मामला खुलते ही सारी जिम्मेदारी अकेले बाबू के कंधों पर आ गई। सारा ठीकरा बाबू पर फोड़ दिया गया। यानी व्यवस्था का पुराना नियम, जिसमें गलती चाहे व्यवस्था की हो, बलि का बकरा हमेशा छोटा कर्मचारी ही बनता है, यहां भी लागू हो गया।
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अटैचमेंट की पहेली
सुकमा जिले में स्कूल शिक्षा विभाग में नया खेल देखने को मिल रहा है। कहने को तो अटैचमेंट खत्म करके 27 शिक्षकों को उनके मूल स्कूल भेजने का आदेश प्रशासन ने दे दिया है, लेकिन हक़ीकत जमीन पर कुछ और ही है। आरोप है कि बीआरसी की कुर्सियों पर अभी भी वही पुराने चेहरे काबिज हैं, जिससे क्यू में खड़े वरिष्ठ और योग्य शिक्षकों में नाराजगी है। मजेदार बात यह है कि कोंटा ब्लॉक में एक स्कूल ऐसा है, जहां के दोनों शिक्षक क्रमशः बीआरसी और सीआरसी बनकर अफसरी कर रहे हैं और 23 बच्चे वाले स्कूल में पढ़ाने के लिए कोई सरकारी शिक्षक नहीं है। मजबूरी में गांव के एक पढ़े-लिखे लड़के को थोड़े से पैसे देकर बच्चों को पढ़ाने के लिए रखा गया है। बच्चे एवजीदार के तौर पर एक बेरोजगार लड़के से पढ़ने को मजबूर हैं। शिक्षा विभाग के इस रवैये से साफ है कि आदेश कागजों तक ही सीमित हैं। एक तरफ शासन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बात करता है, दूसरी तरफ बीआरसी जैसे जिम्मेदार पद पर एक प्राथमिक शाला के अनुभवहीन प्रधान पाठक को समग्र शिक्षा का दायित्व दे रखा है। धुर नक्सल प्रभावित इलाके से दशकों के सशस्त्र नक्सलवाद की विदाई तो हुई है, पर इस तरह के प्रशासनिक भर्राशाही के लाल आतंक से कब निजात मिलेगी, यह कहना मुश्किल है।
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देर आए, दुरुस्त आए
इस सप्ताह दंतेवाड़ा के लिए दो सुखद खबरें आई। भले ही देर से सही, पर दोनों ही खबरें राहत देने वाली रही। पहला यह कि अंततः दंतेवाड़ा के नए मेडिकल कॉलेज को नेशनल मेडिकल काउंसिल एनएमसी ने प्रथम वर्ष की मान्यता दे दी है और 50 सीट मंजूर की है। इसके पहले कुछ कमी – खामियों के आधार पर एनएमसी ने मान्यता देने से इनकार कर दिया था। अब इसी सत्र से एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू हो सकेगी। वहीं, दूसरी तरफ पिछले वर्ष विनाशकारी बाढ़ में बह गए दंतेवाड़ा बायपास पुल की जगह नए उच्च स्तरीय सेतु के लिए टेंडर निकाला गया। बाढ़ आपदा के मामले में इस प्रक्रिया तक पहुंचने में ही करीब साल भर का वक्त लग गया। देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर अब काम शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है, जो जिले वासियों के लिए बड़ी राहत की बात है।
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