साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण ‘ भाग – 143
5 जुलाई 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
धृतराष्ट्र की भूमिका में निकाय
व्यवसायिक नगरी गीदम में मुख्य बस्ती से सोनारपारा समेत कुछ बस्तियों को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क खुद लाइलाज बीमारी बनकर रह गई है। सड़क ऐसी कि चारपहिया वाहन के चारों पहिये एक साथ डामर सड़क पर टिक ही नहीं सकते। 3 वार्ड की सीमाओं को छूती हुई निकलने वाली इस सड़क के मरम्मत, चौड़ीकरण के मसले को लेकर नगरीय निकाय प्रशासन धृतराष्ट्र बनकर बैठा हुआ है। कमीशनखोरी तक सीमित रहने वाले अफसर आकर सिर्फ टाइम पास करते हैं और तबादला होने पर निकल लेते हैं। निकाय में पार्षदगण साल दर साल इस सड़क को सुधारने की मांग तो करते हैं, लेकिन चुने हुए जनप्रतिनिधियों की कोई सुनवाई ही नहीं होती है। असल समस्या का सामना स्थानीय लोग करते आ रहे हैं।
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कर्म करने की कोशिश में कांड हुआ
अटैचमेंट खत्म करने का शिगूफा हमेशा छोड़ने वाले शिक्षा विभाग ने इस बार इसे गंभीरता से ले लिया और मनचाही जगह अटैचमेंट का सुख भोग रहे शिक्षकों को उनके स्कूल का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया है। इससे कई सालों से चाक – डस्टर नहीं छूने वाले शिक्षकों को फिर से ब्लैकबोर्ड देखना पड़ रहा है और स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर होने की संभावना बढ़ गई है।
लेकिन कर्म करने के चक्कर में विभाग में ही बड़ा कर्मकाण्ड होता दिख रहा है। इतने साल में इन पदों पर भर्ती – प्रमोशन हुए नहीं। सिर्फ जुगाड़ से सिस्टम चल रहा था। अब अटैचमेंट खत्म होने से बीईओ – बीआरसी, बीईओ, मंडल संयोजक व आश्रम-छात्रावासों में अधीक्षक का काम संभाल रहे शिक्षकों की जगह कौन काम करेगा, यह बड़ा यक्ष प्रश्न सामने आ गया है। जाहिर सी बात है, कुछ दिनों बाद फिर से शिक्षकों को ही वापस बुलाने की नौबत आएगी, भले ही उन्हें ‘रिनीवल शुल्क ‘ चुकाना पड़े।
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बुलाती है मगर जाने का नई..!!
छत्तीसगढ़ सरकार के जन संपर्क विभाग ने दक्षिण बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नया कैंपेन शुरू किया है, जिसके लिए सोशल मीडिया पर बारसूर के ऐतिहासिक धरोहरों के कई पोस्टर जारी किए हैं। इनमें ‘बारसूर बुला रहा है ‘ स्लोगन का उपयोग किया गया है। लोग कमेंट्स लिखने लगे हैं कि पहले सड़क तो ठीक करवा लो । गीदम से बारसूर मार्ग की बदतर हालत को देखते हुए मशहूर शायर राहत इंदौरी साहब की ये पंक्ति – ‘ बुलाती है मगर, जाने का नई ..!! ‘ याद आ जाती है। बरसात में गड्ढे और कीचड़ से लथपथ स्टेट हाईवे – 5 से सफ़र तय कर बारसूर पहुंचना लोगों की मजबूरी है। इस सड़क की स्थिति अर्श रोग यानी बवासीर की तरह हो गई है, जिसका इलाज चांदसी दवाखाना वाले करते रहते हैं और मरीज से पैसे ऐंठते रहते हैं। मर्ज ठीक भी नहीं होता और साल दर साल इलाज भी जारी रहता है।
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दंतेवाड़ा पोस्टिंग बनाम काला पानी की सज़ा
अविभाजित मध्यप्रदेश के समय किसी को पनिशमेंट पोस्टिंग पर भेजना होता था, तो बस्तर, खासकर दंतेवाड़ा भेज दिया जाता था, जो अंग्रेज जमाने के काला पानी की सजा से कम नहीं माना जाता था। अब हालात बदले हैं । डीएमएफ फंड के मामले में सबसे धनी जिलों में शामिल दंतेवाड़ा जिला सरकार के लिए अब भी पनिशमेंट वाली जगह है, यह बात लोगों के गले नहीं उतर रही है। दरअसल, हाल ही में मोहला – मानपुर जिले में सरपंच संघ की शिकायतों और भारी विरोध प्रदर्शन के बाद वहां से जनपद सीईओ को हटाकर सीधे दंतेवाड़ा जनपद भेजा गया है। अफसर के लिए यह पनिशमेंट पोस्टिंग है या मनचाही जगह पर पोस्टिंग का गेम, यह बड़ा सवाल है, क्योंकि भीतरखाने यह चर्चा है कि विवाद होने से काफी पहले से उक्त अफसर इस जगह पर पोस्टिंग के लिए प्रयासरत थे। वैसे भी, जब यह जिला नक्सल प्रभावित होने के मामले में अति संवेदनशील घोषित था, तब भी कुछ मोस्ट टैलेंटेड अफसर इसका इस्तेमाल चारागाह की तरह कर लेते थे, अब तो सरकार ने जिले को नक्सलमुक्त घोषित ही कर दिया है, फिर यह कैसा काला पानी?
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महंत का गुपचुप प्रवास
छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष अचानक दंतेवाड़ा पहुंचे और शक्तिपीठ में देवी दर्शन कर लौट गए। यह प्रवास इतना आकस्मिक और गुपचुप रहा कि शहर में मौजूद ज्यादातर कांग्रेसियों को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। वहीं, नया जिलाध्यक्ष मिलने के बाद कांग्रेसियों को अपनी ही पार्टी के नेता प्रतिपक्ष से मिलने का मौका नहीं मिलने से उन्हें खासी मायूसी हुई। पार्टी का सूचना तंत्र नाकाम साबित हुआ।
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कानून की पढ़ाई कब?
दंतेवाड़ा जिले में कानून की पढ़ाई यानी एलएलबी की कक्षाएं कब लगेंगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। पीजी कॉलेज में इसकी शुरुआत हुई। 2 सहायक प्राध्यापकों की पोस्टिंग हुई और एडमिशन भी लिया गया। लेकिन शुरुआत के पहले ही साल मान्यता की तलवार लटकने लगी, तो बीच सत्र में ही उच्च शिक्षा विभाग ने विधि संकाय का डिब्बा बंद कर दिया। तब से आज तक दोबारा लॉ कॉलेज शुरू करने का प्रयास ही नहीं हुआ। इसकी चिंता न तो अफसरों को है, न ही जनप्रतिनिधियों को। बार काउंसिल के नॉर्म्स को पूरा करने पर यहां कॉलेज खुल सकता है, लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए इसकी संभावना दूर – दूर तक नहीं दिख रही है।
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कांग्रेस को मिला नया कप्तान
अंतर्कलह से जूझ रही कांग्रेस के लिए नया कप्तान मिला तो है, लेकिन कब तक के लिए, यह कहना अभी मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि कांग्रेस के नए सिस्टम में जिलाध्यक्ष के 6 महीने के कार्यकाल की समीक्षा और उसके बाद ही आगे एक्सटेंशन मिलने का प्रावधान किया गया है। परफॉर्मेंस बेस्ड नियुक्ति का राइट टू रीकॉल वाला यह तरीका पार्टी के भविष्य के लिए सुखद संकेत है। जबकि खुद को कैडरबेस कहने वाली भाजपा में ऐसी समीक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। एक बार संविदा टाइप नियुक्ति हो गई तो फिर टाइम पूरा होने तक कोई कुर्सी से हिला ही नहीं सकता। भले ही लाख शिकायतें हो जाएं।
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झाड़ – फूंक से करोड़पति बना वन रक्षक
बस्तर जिले में सुनवाई करने पहुंची महिला आयोग की टीम के सामने एक अजीबो गरीब मामला सामने आया। फरियादी महिला ने शिकायत दर्ज करवाई कि वन विभाग में पदस्थ एक वन रक्षक ने झाड़ – फूंक के नाम पर उससे करीब डेढ़ करोड़ रुपए वसूल लिए। इस मामले का क्या निराकरण होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, पर तंत्र – मंत्र और झाड़ – फूंक के जरिए एक ही क्लाइंट से डेढ़ करोड़ रुपये झटक लेने वाले वन कर्मी का सालाना टर्न ओवर क्या होगा, यह जानने की जिज्ञासा लोगों में बढ़ गई है।
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