गुरिल्ला नीति वाला बैंक .. (शब्द बाण – 140)

गुरिल्ला नीति वाला बैंक .. (शब्द बाण – 140)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण ‘ भाग – 140
14 जून 2026

शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

बैंक की गुरिल्ला नीति
कहते हैं कि माहौल का असर जल्द ही आम जन जीवन पर भी पड़ने लगता है। ठीक ऐसा ही वाकया दक्षिण बस्तर के मुख्यालय दंतेवाड़ा में देखने को मिलता है। दशकों तक धुर नक्सल प्रभावित इलाका रहे दंतेवाड़ा में बैंक भी लगभग इसी हिसाब से काम करने लगे हैं। एक सबसे बड़े व प्रतिष्ठित बैंक की शाखा में लोग इसीलिए परेशान रहते हैं कि यहां कैश काउंटर से लेकर तमाम अन्य लेन – देन वाले काउंटर भी ठीक उसी तरह बिना सूचना के बदलते रहते हैं, जिस तरह से नक्सली अपना ठिकाना बदलते रहते हैं। गुरिल्ला नीति पर काम करने वाले नक्सलियों की यही सबसे बड़ी ताकत होती है। खैर, इस नामचीन बैंक में किसी काउंटर पर घंटों लाइन लगने के बाद नंबर आता है, तो कस्टमर को पता चलता है कि यह वह काउंटर नहीं है, अगले काउंटर पर जाइए। काउंटर में बदलाव की न तो कोई सूचना, न नोटिस या तख्ती। ऊपर से बैंक स्टाफ भी दूल्हे के फूफा की तरह मुंह फुलाए बैठे मिलते हैं, जिनसे पूछे गए किसी सवाल का जवाब देने से मानो मुंह से कीमती मोती ही झरने लग जाएं।
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मान्यता को तरसा मेडिकल कॉलेज
बेमन से शुरू किए जा रहे मेडिकल कॉलेज दंतेवाड़ा को एनएमसी ने मान्यता देने से फिलहाल इंकार कर दिया है। यानी पहले वर्ष में ही जीरो ईयर घोषित होने की स्थिति है। पर्याप्त समय मिलने के बावजूद फर्स्ट ईयर की मान्यता के इंस्पेक्शन से पहले पुख्ता तैयारी क्यों नहीं हो सकी, यह बड़ा सवाल है। मेडिकल कॉलेज की घोषणा के वक्त से ही मुफ्त का क्रेडिट लेने की होड़ जरूर मची हुई थी। केंद्र सरकार की योजना को सार्वजनिक मंच से घोषित कर तत्कालीन सीएम ने क्रेडिट लेने में कोई कमी नहीं की, लेकिन तैयारियों के नाम पर कुछ नहीं कर सके। अब सरकार बदलने के बाद भी वही स्थिति है। पहले जमीन फाइनल करने में पसीने छूट गए, इसके बाद ठेकेदार और टेंडर फाइनल करते काफी देर हो गई। कॉलेज शुरू करने के अस्थाई इंतजाम भी पूरे नहीं हो सके। न तो स्टाफ की व्यवस्था हुई, न ही पढ़ाने वाले प्रोफेसरों की। अब सरकार एनएमसी के नॉर्म्स को पूरा करने क्या कदम उठाती है, यह देखने वाली बात होगी।
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अंगद के पांव
दंतेवाड़ा जिले में आईसीडीएस विभाग में अंगद की तरह पांव जमाए अफसर को अंततः दूसरी जगह पोस्टिंग दे दी गई है, लेकिन वो सरकार के आदेश व निर्देश को मानेंगे या नहीं, यह अभी भी स्पष्ट नहीं हुआ है। महिला स्टाफ द्वारा लगाए गए उत्पीड़न के आरोपों के बाद सस्पेंड हुए अफसर ने निलंबन आदेश को चुनौती दे दी और फिर से दंतेवाड़ा में ही बैठने लगे। इस बार सीएम हाउस ने शिकायत को गंभीरता से लेकर मुख्यालय ट्रांसफर तो करवा दिया है, लेकिन विभाग का स्टाफ संशय में है कि साहब इस आदेश को मानेंगे या फिर इसे भी चुनौती देकर रुक जाएंगे। विभागीय योजनाओं खासकर प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना की राशि में हेरफेर जैसी गड़बड़ियों के चलते वैसे भी विभाग की छवि काफी खराब हो चुकी है, उस पर आईसीडीएस जिला अधिकारी की कुर्सी पर लगे चिपकू गम की वजह से सरकार की और भी मिट्टी पलीद हो रही है।
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किस्सा कुर्सी का
बीजापुर जिले में अंततः दो जिला शिक्षा अधिकारी वाले मामले का पटाक्षेप होता दिख रहा है। लंबे समय तक दो डीईओ की मौजूदगी से जिले में शिक्षा विभाग की व्यवस्था डगमगा गई थी। इस बीच कई विवादित मामले हुए, जिसमें सरकार भी इस कंफ्यूजन में रही कि आखिर किस डीईओ पर जिम्मेदारी तय करें? अब राज्य सरकार ने दोनों ही प्रभारी डीईओ को हटाकर लिस्ट में दूसरी जगह भेज दिया है, उनकी जगह नए अफसर को मौका दिया गया है। लेकिन पुराने प्रभारी डीईओ नई जगह पर जाकर ज्वाइन करेंगे भी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस बात को लेकर विभाग में भी चर्चा आम है। ऐसा हुआ तो इस बार दो नहीं, बल्कि तीन डीईओ जिले में मौजूद रहकर मुफ्त में कुर्सी तोड़ेंगे। पिछले अनुभव को देखते हुए लोग दूध का जला छाछ भी फूंक – फूंककर पीता है, टाइप की सावधानी बरत रहे हैं।
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पानी गए न उबरे..

‘रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानस चून।’ रहीम जी का यह दोहा आपने पढ़ा व सुना होगा। इसमें पानी यानी चमक, सम्मान के बगैर जीवन निरर्थक होने की बात कही गई है। लेकिन दूसरी तरफ़ आम जनता के लिए शुद्ध पेयजल यानी पानी की व्यवस्था करने वाला पीएचई विभाग ही सरकार की पानी उतारने में पीछे नहीं रहता। दंतेवाड़ा जिले के टेकनार में प्रवास पर पहुंचे डिप्टी सीएम अरुण साव को नल जल योजना के उद्घाटन के लिए जिस टोंटी से पानी निकालना था, वही टोंटी अफसरों की मेहरबानी से सूखी हुई निकली। फिर क्या था मंत्री का गुस्सा फूट पड़ा। जाते ही उन्होंने बड़े साहब के लिए नोटिस जारी करवा दिया।
इसके पहले बस्तर ब्लॉक में सड़क पार से घुटनों के बल पानी ढोने वाली दिव्यांग महिला दुलमा कश्यप की मजबूरी ने विभाग की नाकामी की पोल खोल दी थी, तो अफसरों ने आनन – फानन में दिव्यांग महिला के घर के घर नल लगाकर पानी निकालकर दिखा दिया। साथ ही फोटो – वीडियो भी बनवा ली। जादूगर बने अफसरों के गांव से जाते ही नल से पानी निकलना बंद हो गया। ऐसे कई अनगिनत किस्से हैं, जिन पर पूरी किताब लिखी जा सकती है।
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कागज में सब कुछ
दक्षिण बस्तर में अब माइनिंग यानी अयस्क खनन भी कागजों में होने लगा है। बैलाडीला की खदानों में से एक खदान जिस निजी कंपनी को लीज पर दी गई, उसने न सिर्फ 8 साल से लौह अयस्क खनन करना बताया, बल्कि 23 करोड़ रुपए की रॉयल्टी खनिज विभाग के पास जमा करवा दी है। इतना ही नहीं, अयस्क परिवहन करने वाली कथित गाड़ियों के नंबर तक लिखवा दिए हैं। अब मामले का खुलासा हुआ तो खनन से लेकर परिवहन तक बोगस पाया गया। पड़ताल करने वाले हैरान हैं कि अगर खनन हुआ ही नहीं तो इतनी बड़ी रॉयल्टी की राशि आई कहां से? अगर सच में अयस्क का खनन और परिवहन हुआ तो रास्ते के जांच नाकों पर एंट्री क्यों नहीं हुई? कहीं हेलीकॉप्टर से अयस्क ढुलाई तो नहीं हुई?
कुल मिलाकर सबकुछ गोलमाल वाला मामला है, जिसमें माइनिंग से लेकर अन्य विभागों की भूमिका संदिग्ध है।
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कैंची इंजीनियरिंग की शिकायत

आम तौर पर इंजीनियरिंग के विभिन्न ब्रांच में सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, माइंस, एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग जैसे विंग प्रचलित हैं, लेकिन दंतेवाड़ा में डीएमएफ शाखा के संविदा इंजीनियर ने शासकीय तकनीकी विभागों के नियमित इंजीनियरों की लिखा – पढ़ी पर कैंची चलाने की जो विधा विकसित की है, उसे लेकर खूब चर्चा है। डीएमएफ इंजीनियर की कैंची इंजीनियरिंग की शिकायत अब मंत्री – सांसद तक पहुंच चुकी है। पिछले दिनों डीएमएफ शासी परिषद की बैठक लेने आए सांसद से स्थानीय जन प्रतिनिधियों व नेताओं ने इस कैंची इंजीनियर की जमकर शिकायत की। बताया गया कि सेंक्शन 10 लाख का होता है, तो काटकर 6 लाख कर देते हैं। पुल का ढांचा बनता है, तो एप्रोच रोड की मिट्टी गायब कर देते हैं। ऐसी कई शिकायतें हुई। इस शिकायत के बाद भी व्यवस्था में कोई बदलाव होता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।
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चलते – चलते …
अंततः एक बार फिर दंतेवाड़ा में लोक निर्माण विभाग के कार्यपालन अभियंता का तबादला हो गया है। दो साल पहले भी तबादला हुआ था, नए साहब ने ज्वाइनिंग भी दे दी थी, लेकिन पुराने साहब कुर्सी पर बने रहे। इस बार फिर तबादला हुआ है, तो देखना यह है कि साहब अबकी बार जाते हैं या फिर संशोधित आदेश निकलवाते हैं। स्टाफ से लेकर ठेकेदार तक इसी जिज्ञासा में हैं। वैसे, नक्सल मुक्त घोषित हो चुके जिले में तेजी से विकास की दरकार है। ऐसे में इस विभाग को क्रिकेट टेस्ट मैच की तरह टुकुर – टुकुर खेलने वाला नहीं, बल्कि टी-20 फॉर्मेट में तेज खेलने वाले कप्तान की जरूरत है।
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