अब टाइगर मुक्त होने लगा आईटीआर.. (शब्द बाण – 144)

अब टाइगर मुक्त होने लगा आईटीआर.. (शब्द बाण – 144)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण ‘ भाग – 144

12 जुलाई 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

अब टाइगर मुक्त हो रहा आईटीआर

बस्तर के नक्सल मुक्त होते – होते यहां का इंद्रावती टाइगर रिजर्व आईटीआर भी टाइगर मुक्त होने की ओर अग्रसर हो रहा है। राष्ट्रीय पशु बाघ के संरक्षण के लिए ही सरकार दशकों से कवायद में जुटी है। जिस इलाके को टाइगर का बफर जोन होना था, उसे नक्सलियों ने अपनी सुरक्षित शरण स्थली बना लिया था। केंद्र व राज्य सरकार के दृढ़ संकल्प के बूते इस इलाके को नक्सल मुक्त करवा तो लिया गया है, लेकिन बाघों के अवैध शिकार के ताजा मामलों ने गिनती के रह गए बाघों के अस्तित्व को खतरा पैदा कर दिया है। हाल ही में इस इलाके में मानवता को नोचने वाले इंसानी गिद्धों की विदाई के बाद प्राकृतिक गिद्धों की संख्या बढ़ने का सुखद समाचार तो मिला, वन्य जीवन को नोचने वाले इंसानी गिद्धों पर नियंत्रण की जरूरत महसूस की जाने लगी है।
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फिर से नई बाढ़ की फीलिंग
दंतेवाड़ा जिले में बीते साल अगस्त महीने में बाढ़ से जल प्रलय जैसी स्थिति निर्मित हुई थी, उसके सदमे से लोग अब तक नहीं उभर पाए हैं। साल भर बीतने के बाद भी क्षतिग्रस्त ज्यादातर पुल – पुलिए नहीं बनाए जा सके हैं। सबसे ज्यादा समस्या बारसूर इलाके के पुल – पुलियों की है, जिनके एप्रोच रोड बारिश में दलदल में बदलने लगे हैं। इस सिचुएशन ने राज्य की आपदा प्रबंधन नीति की कलई खोलकर रख दी है। आम तौर पर आपदा प्रभावित क्षेत्रों में काम युद्ध स्तर पर किया जाता है और कम से कम समय में पुरानी सामान्य स्थिति बहाल कर ली जाती है, पर यहां ऐसा कुछ होता नहीं दिखाई पड़ रहा है। दंतेवाड़ा में ताश के पत्तों की तरह ढह गए पुल के बदले नया उच्च स्तरीय पुल का टेंडर तक सरकार नहीं करवा सकी है। करीब साल भर से इस मार्ग पर आवाजाही ठप है।
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आखिरकार हो ही गई विदाई

दंतेवाड़ा और बस्तर जिला पंचायत के सीईओ की विदाई आखिरकार हो ही गई। बस्तर सीईओ की पटरी जिला पंचायत के पदाधिकारियों से नहीं बैठ रही थी, यहां तक कि इन जन प्रतिनिधियों को मीडिया में आकर अपना दर्द सार्वजनिक करना पड़ गया था। इसी तरह पिछली भूपेश सरकार के समय से दंतेवाड़ा जिले में पदस्थ रहे आईएएस सीईओ का कार्यकाल कुछ ज्यादा ही लंबा चल गया। इसी वजह से ट्रांसफर होना स्वाभाविक ही माना जा रहा था। लंबे कार्यकाल की वजह से नाखुश लोगों की तादाद में खासा इजाफा होने लगा था। ट्रांसफर लिस्ट आते ही भाजपा – कांग्रेस के लोग और कर्मचारी-ठेकेदार तक एक दूसरे को बधाई देते नजर आए। गनीमत तो यह रही कि ‘ महोदय ‘ की विदाई के समय जैसी आतिशबाजी नहीं कर सके। दरअसल, आर्थिक तंगी के दौर में लोड और उड़ता तीर कोई लेना नहीं चाहता ।
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इतनी खुशी…!!!😀
दक्षिण बस्तर के महोदय कालीन जिपं सीईओ से त्रस्त जिला सरपंच संघ ने तमाम गंडे – ताबीज बांधकर देख लिया, पर ट्रांसफर नहीं हुआ। सरपंच संघ ने सीएम से मुलाकात के बाद भी बात नहीं बनने पर जनदर्शन में आवेदन लगाकर सीईओ के ट्रांसफर की मांग की थी। फिर भी बात नहीं बनी। नाराज़गी की असल वजह भुगतान संकट और फंड पर अनावश्यक सेंसरशिप रही। साथ ही 50 लाख से कम लागत वाले छोटे – मोटे निर्माण कार्य को भी टेंडर लगवाकर पंचायतों से छीनने, पुराना काम बताकर भुगतान नहीं करने जैसी तमाम बातें भी जिम्मेदार थीं। किसी तरह तपस्या पूरी हुई और आखिरकार देर से ही सही, पर येन – केन प्रकारेण ट्रांसफर ऑर्डर रिलीज हुआ, तो सरपंचों की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। ज्यादातर सरपंच वॉटरफॉल भ्रमण कर इस तनाव मुक्ति का आनंद उठाने निकल पड़े। लेकिन अति उत्साह उन पर ही भारी पड़ा। दरअसल, एक तेज तर्रार महिला सरपंच ने वॉटरफॉल के रेस्ट हाउस की छत पर फिल्मी गाने पर नृत्य करते हुए रील बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया।
स्व. किशोर कुमार के एक हिट गाने के बोल –
“रूप तेरा ऐसा कि दर्पण में न समाए,
खुशी मिली इतनी कि मन में ना समाए,

पलक बंद कर लूं, कहीं झलक ही न जाए ..

की तर्ज पर मनाई गई खुशी भी छलक ही गई।
नतीजा यह हुआ कि ढलान वाली छत पर इस तरह की रीलबाजी को जोखिम भरा दुस्साहस माना गया। अब एसडीएम से नोटिस मिलने के बाद महिला सरपंच समेत उनके साथ गए बड़े – बुजुर्ग सरपंचों को भी पेशी पर जाना पड़ रहा है ।

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आखिरी गेंद पर भी सिक्सर !
दंतेवाड़ा के पुलिस कप्तान गौरव रामप्रवेश रॉय तबादले पर जाते – जाते आखिरी गेंद पर सिक्सर लगा गए। दरअसल, अबूझमाड़ इलाके के तोड़मा में नक्सली डंप बरामद हुआ, जिसमें सोने का बिस्कुट, इंसास राइफल समेत हथियारों का जखीरा मिला। रिलीविंग के ठीक पहले प्रेस कांफ्रेंस करने का मौका उन्हें ही मिला। टीम इंडिया के पूर्व क्रिकेटर धोनी की तरह मिस्टर कूल वाली सरल, सौम्य शैली वाले इस पुलिस कप्तान ने ही अबूझमाड़ इलाके में थुलथुली एनकाउंटर में नक्सलियों के खिलाफ अपनी टीम के जांबाजों के साथ ऐतिहासिक सफलता हासिल की, जिसके बाद सही मायने में नक्सलवाद का काउंट डाउन शुरू हो गया। अपने कार्यकाल में अपने लड़ाकों के बेहतर इस्तेमाल से कई बड़े नक्सल विरोधी अभियानों को कुशलता पूर्वक सफल बनाकर नक्सलवाद की ताबूत में आखिरी कीलें ठोंकने के बाद उनकी विदाई भी नक्सली डंप निकालने की सफलता के साथ ही हुई।

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स्पेस टेक्नोलॉजी वाली सड़क !!
दंतेवाड़ा जिले के कोरकोटी में भी वन विभाग की सड़क पर स्पेस टेक्नोलॉजी का उपयोग करने की खबर आई है। यह खुलासा तब हुआ, जब विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मामले में पड़ताल शुरू की। खेत की जुताई से निकली मिट्टी का इस्तेमाल रेत की जगह करने, लोहे के सरिये की जगह बांस की खपच्चियां उपयोग में लाने का आरोप लगाया गया है। अगर इन बातों में जरा भी सच्चाई है, तो यह भी विचारणीय है कि अब तक अंदरवाले दादाओं का भय दिखा कर अधिकारी काला – पीला किया करते आ रहे थे, लेकिन 31 मार्च को सशस्त्र नक्सलवाद के खात्मे की डेड लाइन समाप्त होने के बाद भी इस तरह की भर्राशाही की क्या वजह हो सकती है?
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बोधघाट पर नेताओं का धर्म संकट
बस्तर के बहुचर्चित बोधघाट परियोजना का जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया है। ठंडे बस्ते में चली गई इस परियोजना को पिछली कांग्रेस सरकार ने निकालकर पुनर्जीवित करने की कवायद की। 500 मेगावाट पन बिजली की मूल परियोजना को घटाकर 300 मेगावाट क्षमता का बनाना तय हुआ। इसके लिए वेपकोस को सर्वे कर परियोजना की वर्तमान लागत, विस्थापन और अन्य तथ्य जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों के भारी विरोध और सामने आम चुनाव को देखते हुए भूपेश सरकार ने इसे फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब सरकार बदलने के बाद भाजपा की साय सरकार ने फिर से इस परियोजना को शुरू करने में दिलचस्पी दिखाई है। इस बार प्रस्तावित बिजली उत्पादन क्षमता घटाकर 125 मेगावाट भी कर दी है, लेकिन प्रभावित क्षेत्र के लोगों का विरोध कम होने का नाम नहीं ले रहा है। इन सबके बीच भाजपा – कांग्रेस के लोकल नेताओं की स्थिति खराब हो रही है। प्रभावित जनता के पक्ष में खड़े रहने के साथ ही अपनी पार्टी की सरकार की खिलाफत नहीं करने की उनकी मजबूरी भी होती है । जैसे ही सरकार बदलती है, इन्हें पाला बदलना पड़ता है। पिछली सरकार में परियोजना विरोधी बैठकों में ज्यादातर राजनीतिक चेहरे भाजपाई खेमे के हुआ करते थे, अब सरकार बदली है, तो कांग्रेसियों ने उनकी जगह ले ली है। ऐसे हालातों में परियोजना का ऊंट किस करवट बैठता है, यह कहना अभी मुश्किल है।
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नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा 28 नवंबर को

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