साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 149
16 अगस्त 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
‘विष्णु‘ देव का ‘अश्वमेध‘ यज्ञ
पुराने समय में चक्रवर्ती सम्राट घोषित होने के लिए राजा अश्वमेध यज्ञ किया करते थे, जिसमें छोड़ा गया बलवान घोड़ा साल भर तक जिस भी इलाके में विचरण कर लौट आता वो इलाका उस राजा के आधिपत्य में मान लिया जाता था। इस बार छत्तीसगढ़ में सीएम विष्णुदेव के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को विचरण कराने की जिम्मेदारी खुद डिप्टी सीएम ने ली। धुर नक्सल प्रभावित रहे इलाकों में बाइक रूपी घोड़ा निर्बाध दौड़ा कर कर डिप्टी सीएम ताड़मेटला, कर्रेगुट्टा पहाड़, झीरम घाटी, एर्राबोर तक तिरंगा लहरा आए, जहां कुछ महीने पहले तक फ़ोर्स या वीआईपी का मूवमेंट जोखिम से भरा हुआ होता था, या उन जगहों पर बड़े पैमाने पर जवानों की शहादत हुई थी। कर्रेगुट्टा पहाड़ को नक्सलमुक्त कराने में तो लगभग महीने भर ऑपरेशन चलाने की जरूरत पड़ गई थी। फिर भी यह “विजय” यात्रा रोकने या घोड़ा पकड़ने किसी ने भी विष्णुदेव के चक्रवर्ती सम्राट बनने की यात्रा को चैलेंज करने की हिमाकत नहीं की। ऐसा माद्दा रखने वाले ज्यादातर दादा लोग या तो मारे जा चुके या सरेंडर कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं। वैसे, साय मंत्री मंडल के सबसे मुखर और डैशिंग मंत्रियों में से एक साबित हो चुके डिप्टी सीएम के लिए यह ‘विजय’ यात्रा काफ़ी चर्चा का विषय बन गई है। लोग तो दबी जुबान यह भी कहने लगे हैं कि अश्वमेध यात्रा कहीं पदनाम के आगे से डिप्टी शब्द हटवाने और प्रमोशन में मददगार न साबित हो जाए। वैसे भी राजनीति को क्रिकेट की तरह अनिश्चितता वाला गेम माना जाता है।
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आउट सोर्सिंग पर भरोसा !!
बस्तर के सबसे धनी जिले में पदस्थ रहे एक धन पिपाशु बड़े साहब अपने साथ ठेकेदार लेकर चलते थे। जहां भी नई पोस्टिंग पर जाते उनके ठेकेदार और वेंडर पहुंचकर पसरा लगा लेते थे। फिर सीमेंट, गिट्टी, छड़ से लेकर मजदूर तक राजधानी क्षेत्र से डायरेक्ट आने लगे, नतीजा यह हुआ कि बस्तर के पैसे से अधो संरचना का विकास तो जमकर हुआ, लेकिन यहीं पर लोकल मार्केट में मंदी छाई हुई थी। लोकल लेबर मिस्त्री के पास न रोजगार था, न व्यापारियों को आमदनी। इस आर्थिक मंदी का दीर्घकालिक असर सरकार बदलने के बाद भी खत्म नहीं हुआ है। अब उनकी नीति को कुछ दूसरे अफसर भी फ़ॉलो करने लगे हैं। आउट सोर्सिंग के चलते गाड़ियों से लेकर होम एप्लायंसेज तक राज्य के दूसरे छोर से आ रही हैं। ऐसे में नक्सलमुक्त होने के बाद भी रोजगार और अवसरों की कमी दूर होगी, यह कहना मुश्किल है।
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उसी से ठंडा, उसी से गर्म
बस्तर में पुलिस कब किससे क्या सलूक करना है, यह अच्छी तरह जानती है। इसी रेंज के एक जिले में पत्रकारों की डिक्की में गांजा रखवाकर झूठे केस में फंसाने का आरोप तो पुलिस पर लग ही चुका है, अब संभाग मुख्यालय के एक थाने में राजस्थान के एक गांजा तस्कर की गाड़ी को पकड़ने और निछावर लेकर छोड़ने का आरोप भी अख़बारों की सुर्खियों में है। यह मामला ठीक उसी किस्से की तरह है, जो कभी स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल रहे उसी से ठंडा और उसी से गर्म शीर्षक पाठ में लिखा था। जिसमें जंगल में ठंड से ठिठुरते लकड़हारे को मुंह से फूंककर हाथ गर्म करते और बाद में आग में भुने हुए गरमा – गरम आलुओं को भी मुंह से ही फूंककर ठंडा करते देख कर बौने के मन में उलझन पैदा हो जाती है, कि आखिर उसी से ठंडा और उसी से गर्म कैसे हो सकता है?
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ख़राब सड़क पर भी मक्ख़न जैसी राइडिंग
कहते हैं कि नज़रिये का फ़र्क साफ दिखता है। यही बात नारायणपुर से नक्सलियों के गढ़ रहे अबूझमाड़ के रास्ते से होकर बाइक पर साहसिक यात्रा कर दंतेवाड़ा पहुंचे डिप्टी सीएम व गृहमंत्री विजय शर्मा ने साबित की। दंतेवाड़ा में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए सड़क को ज्यादा खराब नहीं माना। इतना बड़ा जोखिम भरा रास्ता तय करने के बाद छोटी – मोटी तकलीफें वैसे ही गौण हो जाती है। दरअसल, गलतियां छिपाने में माहिर पीडब्ल्यूडी अफसरों ने डिप्टी सीएम व वन मंत्री की तिरंगा रैली से ठीक पहले गिट्टी भरकर सड़क के गड्ढे सफाई से छिपा लिए। नतीजा यह हुआ कि एक दिन पहले तक उधड़ी हुई सड़क पर मक्ख़न की तरह स्मूथ बाइक राइडिंग हो गई। यह बात और है कि मंत्रियों का काफिला गुजरने के एक- दो दिन बाद ही उधड़कर सड़क जस की तस हो चुकी है। गीदम में तो इस सड़क की हालत ज्यादा खराब है। हमेशा अपनी सरकार के बचाव में उतरने वाले एक भाजपा नेता खुद बाइक से गिरकर गीदम में जख़्मी हुए, तब जाकर गड्ढों के खिलाफ सोशल मीडिया पर मुख़र हुए। मंत्री की तिरंगा रैली निकलने से पहले जब पीडब्ल्यूडी ने टूटी -फूटी सड़क पर रफू करना शुरू किया, तो इसका श्रेय लेने से भी कुछ नेता नहीं चूके।
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दर्शर्नाथियों का सैलाब..
शक्तिपीठ मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शनार्थियों का सैलाब उमड़ने लगा है। इनमें अन्य जिलों और दीगर राज्यों से पहुंचने वाले दर्शनार्थियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि ठहरने और भोजन की व्यवस्था चरमरा गई है। वाहन पार्किंग की जगह तक कम पड़ने लगी है। बरसात के सीजन में भी दर्शनार्थियों की संख्या में इस इजाफे की मुख्य वजह क्षेत्र के नक्सलमुक्त घोषित होने को माना जा रहा है। पहले लोग छत्तीसगढ़ और बस्तर, खासकर दंतेवाड़ा आने के नाम पर ही ख़ौफ़ खाते थे। अब वो भय खत्म हो चुका है, तो धार्मिक पर्यटन और बस्तर के नैसर्गिक स्थलों में पर्यटन विकास की संभावनाएं उछाल मारने लगी हैं, लेकिन उस अनुपात में बुनियादी सुविधाओं की कमी साफ महसूस की जा रही है।
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खरबूजे की तरह रंग बदल रहे..
बस्तर संभाग के सरकारी डिग्री कॉलेजों की पढ़ाई को लेकर न तो विभाग गंभीर हैं, और न ही मंत्री। विभागीय मंत्री प्रवास पर आने पर भी नजदीकी कॉलेजों का दौरा नहीं करते। कई कॉलेज प्राध्यापकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिन कॉलेजों में प्राध्यापक हैं भी, तो सीनियर रेगुलर प्राध्यापकों की देखा – देखी जूनियर भी खरबूजे की तरह रंग बदल रहे हैं। योग्य और अनुभवी होने के बावजूद कक्षाएं लेने से कतराने लगे हैं। स्कूल शिक्षा विभाग की तरह अटैचमेंट खत्म करने का साहसिक कदम उच्च शिक्षा विभाग नहीं उठा पा रहा है। इसका खामियाजा आदिवासी क्षेत्र के गरीब छात्र – छात्राओं को भुगतना पड़ रहा है।
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हाईटेक चोर का चैलेंज
- बस्तर पुलिस ने रांची से आकर होटलों में चोरी करने वाले एक पढ़े – लिखे और हाई टेक अंतर्राज्यीय चोर के चैलेंज को न सिर्फ स्वीकार किया, बल्कि दूसरे राज्य से धर दबोच कर उसके सारे कसबल ढीले कर दिए। दरअसल, होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुका चोर पहले बड़े होटल में स्टॉफ के तौर पर घुसपैठ करता, फिर हर बार एक ही पैटर्न पर चोरी कर नदारद हो जाता था। साथ ही फोन कॉल करने पर चैलेंज भी करता कि पुलिस को क्या इंटरपोल को भी बुलाओ, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। इसी दम पर वो कई राज्यों में चोरी करता रहा, लेकिन इस बार बस्तर पुलिस से उसका पाला पड़ गया। बस्तर पुलिस ने साइबर सेल की मदद से इस बड़बोले शातिर चोर को पकड़कर उसकी गलत फहमी दूर कर दी।
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