साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 148
9 अगस्त 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
मदिरालय पर बवाल
बीजापुर जिले के संगमपल्ली में सरकारी दारू दुकान खोलकर सरकार ने उड़ता तीर ले लिया है। शहरी क्षेत्रों में आबादी वाले इलाकों में प्रीमियम शराब दुकानों की अपार सफलता के बाद सरकार ने यह समाजवादी सोच रखी कि आखिर जब चाहे तब दारू लेकर टुन्न होने के हक से आखिर ग्रामीण क्यों वंचित रहें? अंतिम छोर के व्यक्ति तक भले ही विकास न पहुंचे, लेकिन गाहे ब गाहे ग़म गलत करने की सुविधा तो मिले। लेकिन हरिवंश राय बच्चन जी की मशहूर कविता मधुशाला की पंक्तियां ‘मेल कराती मधुशाला’ का अनुकरण करने की कोशिश में होम करते हाथ जलाने की नौबत आ गई है। ग्रामीण जनों के विरोध को समर्थन देने कांग्रेसी भी कूद पड़े हैं। उनका कहना है कि बच्चों के लिए स्कूल – छात्रावास खोलने से ज्यादा दिलचस्पी सरकार को दारू दुकान खोलने में है।
वैसे, सरकार की अर्थव्यवस्था को थामने वाले मदिरा प्रेमी इकोनॉमी वारियर्स को कोई भी सरकार नाराज करना नहीं चाहती है। भाजपाइयों का तर्क है कि कांग्रेस की भूपेश सरकार ने तो मदिरा प्रेमियों का और भी खास ख्याल रखा था। घर पहुंचाकर देने मदिरा की होम डिलीवरी का प्रावधान कर दिया, ताकि घर बैठे इकोनॉमी बूस्टर पेय मंगवा सकें। ऐसे में अगली सरकार ने दूरस्थ इलाके के मदिरा प्रेमियों की दुकान से दूरी घटाकर कौन सा गुनाह कर दिया?
यह तर्क भी वाजिब ही है। यह बात और है कि इस इलाके में जन सुविधा का ध्यान रखकर कुछ जनप्रतिनिधि ही पड़ोसी राज्यों से मदिरा लाकर धड़ल्ले से बेच रहे थे, जो मन पसंद ब्रांड सरकारी दुकान में नहीं मिलती, वो भी महंगी ही सही, लेकिन आसानी से मिल रही थी।
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खेल कोटे में भी बस्तर से हुआ खेल
राज्य सरकार ने अरसे बाद खेल कोटे से नौकरी देने उत्कृष्ठ खिलाड़ियों की सूची जारी की है, लेकिन बस्तर अंचल के खिलाड़ियों को काफ़ी मायूसी हुई। नौकरी पाने वाले 156 खिलाड़ियों की सूची में एवरेस्ट फतह करने वाली पर्वतारोही व बस्तर बाला नैना सिंह धाकड़ तक को जगह नहीं मिली, जबकि राष्ट्रपति भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। वैसे भी खेल के मामले में बस्तर के साथ हमेशा खेला होता आया है। कई जिलों में खेल विभाग बिना खेल अधिकारियों के चल रहा है। स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। ऐसे में उत्कृष्ठ खिलाड़ी कहां से आएं?
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दाल में काला या पूरी दाल काली?
बस्तर यूनिवर्सिटी (वर्तमान नाम शहीद महेंद्र कर्मा विवि ) शुरुआत से ही कभी पेपर लीक तो कभी अन्य घोटालों के चलते हमेशा ही सुर्खियों में रहा है। फिलहाल, इसका नाम प्रोफेसर भर्ती में कथित धांधली को लेकर उछल रहा है। आरोप काफ़ी गंभीर हैं। आरोप किसी और ने नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के पूर्व विधायक समेत अन्य नेताओं ने लगाया है, तो मामला वैसे ही गंभीर हो गया है। जब तक छात्र नेता और विपक्ष के लोग आरोप लगाते रहे, तब तक उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था।जब सत्ताधारी बीजेपी के नेताओं ने आरोप लगाना शुरू किया तो मामले की जांच का उपक्रम हुआ, लेकिन
जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। कुल मिलाकर दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल के ही काली होने का शक गहराता जा रहा है। इधर आरोपों से व्यथित कुलपति ने आरोप साबित होने पर इस्तीफा देने का चैलेंज भी कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ पार्टी अनुशासन की डोर से बंधे ज्यादातर भाजपा नेता इस घटनाक्रम से अंजान बन रहे हैं.
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अनुदेशकों की पीड़ा
दशकों से नक्सलवाद का दंश झेल रहे बस्तर के अंदरूनी इलाकों में शिक्षा का अलख जगाने डॉ रमन सिंह की सरकार ने पोटा केबिन आवासीय स्कूलों का संचालन शुरू किया, तब बाहर से शिक्षक आने को तैयार नहीं होते थे। इस समस्या से निपटने पढ़े लिखे स्थानीय युवाओं को अनुदेशक के तौर पर नियुक्त किया गया, जो पढ़ाने के साथ ही आवासीय स्कूलों के संचालन में मदद भी करते थे। दो दशक बाद इन अनुदेशकों को न सिर्फ मामूली मानदेय पर बिना साप्ताहिक अवकाश और मामूली मानदेय पर काम करना पड़ रहा है, बल्कि नक्सलवाद के अवसान के बाद दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंके जाने का भय भी सता रहा है। इन अनुदेशकों का तर्क है कि साथ – साथ ही काम शुरू करने वाले एसपीओ के मुकाबले उनकी किस्मत खराब है।एसपीओ को शैक्षणिक योग्यता, शारीरिक मापदंड में छूट देकर पुलिस में शामिल कर लिया गया, लेकिन बिना हथियार कलम के साथ मैदान में उतरने वाले अनुदेशक जहां के वहीं रह गए। अनुदेशकों ने दिल्ली जाकर बस्तर सांसद के साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपना दुखड़ा भी सुना दिया है। अब देखना यह है कि केंद्र व राज्य सरकार का क्या रूख अपनाते हैं।
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क्या वाकई बदलेगी टेबल?
लम्बे समय तक एक ही डेस्क पर जमे कर्मचारियों के बारे में आखिरकार जीएडी यानि सामान्य प्रशासन विभाग ने सख्त रूख अपनाना शुरू कर दिया है। अनिवार्य रूप से टेबल रोटेशन गंभीरता दिखाई जा रही है।
जीएडी ने सर्कुलर जारी कर कहा है कि सभी विभागाध्यक्ष कार्यालयों, संभागायुक्त कार्यालयों, कलेक्टर एवं उनके अधीनस्थ कार्यालयों में पदस्थ सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के डेस्क के अनिवार्य रूप से हर 3 साल में परिवर्तन किया जाए। अब यह फरमान वास्तव में अमल में लाया जाएगा या इसे भी रद्दी की टोकरी में या स्पैम बॉक्स में हमेशा की तरह डाल दिया जाएगा, यह देखने वाली बात होगी। एप्रोच और मनी पॉवर के बल पर मूसला जड़ें जमा चुके कर्मचारियों पर यह फरमान कितना कारगर साबित होगा यह वक़्त ही बताएगा।
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सफ़ेदपोश नक्सली..
पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सली बैनर पोस्टर लगाने के मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने दंतेवाड़ा जिले के बैलाडीला के एनएमडीसी कर्मचारी को गिरफ्तार कर चौंका दिया। मामले में एक राजनीति पार्टी के नेता समेत 2 की गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी है। एक बात तो तय है कि बग़ैर आग के धुआँ निकलना संभव नहीं है। वास्तव में आरोप सही हैं, तो यह बड़ा विचारणीय विषय है कि अच्छी जगहों पर बैठे और सार्वजनिक उपक्रम की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी कर रहे लोग भी नक्सलवाद की आड़ में अपनी जेबें भरते आ रहे थे। भले ही इसकी कीमत हजारों परिवारों को चुकानी पड़ी। किसी की कोख सूनी हुई, किसी का सिन्दूर उजड़ा, कितने अनाथ हुए और कितने बेघर बार हुए।
पर्चे बैनर बरामद होने के मामले में गनीमत तो यह रही कि नक्सल मुक्ति की 31 मार्च 26 वाली डेडलाइन समाप्त हो गई थी और पुलिस ने गंभीरता से जांच की, तब शहरी क्षेत्र में बैठे सफेदपोशों के गिरेबान तक उसके हाथ पहुंचे। वरना, नक्सली मामला मानकर इसे भी अनदेखा कर दिया गया होता।
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काम दंतेवाड़ा में, भर्ती डिमरापाल में!
मेडिकल कॉलेज दंतेवाड़ा में खुल रहा है और इसके लिए तमाम भर्तियां बस्तर जिला स्थित मेडिकल कॉलेज डिमरापाल से हो रही हैं, जिसके बारे में दंतेवाड़ा जिले के पात्र बेरोजगारों को हवा तक नहीं लग पा रही है। ऐसी ही कई चीजें हैं, जो दक्षिण बस्तर के निवासियों का हक छीन लेती हैं। एनएमडीसी की भर्ती का मामला हो या कोई भी रोजगार का अवसर, दूरस्थ क्षेत्र के स्थानीय बाशिंदों को अक्सर हाथ मलते रह जाने की नौबत बनी रहती है। पहले नक्सलवाद की आड़ में और अब एप्रोचवाद, परिवारवाद की ओट से उनके अवसरों पर ग्रहण लगाया जा रहा है। यही वजह है कि एक बार नौकरी पा जाने के बाद अगली कई पीढ़ियां सेवा देती नजर आती हैं।
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आखिर रिलीव हुआ कर्मचारी..
बीजापुर जिले के पशुधन विभाग में दशकों से दफ़्तर में जमे फील्ड कर्मचारी को आखिरकार अफसर ने जगदलपुर के लिए रिलीव कर ही दिया। यह कार्रवाई तब हुई जब मंत्रालय से उक्त अफसर पर ही निलंबन की तलवार लटकने लगी। मंत्री के आदेश की नाफरमानी को गंभीरता से लिया गया। मंत्रालय ने स्टोर कीपर का काम कर रहे एवीएफओ को तबादला वाली जगह पर तत्काल ज्वाइन करने की चेतावनी भी दी है। अब मज़बूरन अफसर को अपनी कारगुजारियों की बन्दूक चलाने दूसरा कंधा खोजना पड़ेगा। खैर, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर पशुधन विभाग में यह बदलाव हुआ।

