रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था.. (शब्द बाण -155)

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था.. (शब्द बाण -155)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण’ भाग – 155
27 सितंबर 2026

शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था..
सुकमा जिला बाढ़ आपदा से ग्रस्त हो चुका है और तीन दिनों तक इस संकट से जूझने के बाद थोड़ी राहत मिलने के आसार नज़र आए हैं, लेकिन हैरत की बात रही कि कुछ जिला स्तरीय अफसर पूरे समय जिले से नदारद रहे। वो तो गनीमत रही कि अकेले कलेक्टर साहब ने पूरे समय मोर्चा संभाले रखा हुआ है। सबसे ज्यादा दिक्कत यह रही कि कोंटा सब डिविजन के आला अफसर भी राहत कार्य के समय में मौजूद नहीं थे। रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था, वाली कहावत की तर्ज पर इन अफसरों की अपने फील्ड में गैर मौजूदगी चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐन वक्त में लापतागंज चले गए इन अफसरों की खोज खबर सरकार लेती भी है या नहीं, ये देखने वाली बात होगी।

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सरकार से हारे, तब देवी के सहारे ..

सीएम विष्णुदेव की सरकार में भी सुनवाई नहीं होते देख कर ग्रामीण जन समस्या निवारण के लिए देवी दंतेश्वरी की शरण में जाने को मजबूर हुए हैं। दंतेवाड़ा में शक्तिपीठ मांई दंतेश्वरी मंदिर की दान पेटी में मिली चिट्ठी इस बार न सिर्फ सुर्खियों में है, बल्कि सियासी उठा – पटक की वजह भी बन गई है। ग्रामीणों की पीड़ा यह है कि 21 साल पहले जिस पीएमजीएसवाय सड़क के पक्की बनने की मंजूरी मिली थी, वो काम आज तक पूरा नहीं हो सका है। इसमें भाजपा की डॉ रमन सरकार के 13 साल, भूपेश सरकार के 5 साल और विष्णुदेव साय सरकार के लगभग ढाई साल का समय बीत चुका। इसके बाद भी अगर सड़क अधूरी रहे, तो भोले – भाले ग्रामीणों के लिए दैवीय शक्ति की शरण में जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है। सबसे बड़ी हास्यास्पद बात यह रही कि पंचायत मंत्री की अधीनता वाले पीएमजीएसवाई विभाग पर सरकार का नियंत्रण ही नहीं रह गया है, तभी तो पंचायत मंत्री की जगह पीडब्ल्यूडी मंत्री को बचाव में सफाई वाला अपना रटा – रटाया जुमला लेकर प्रकट होना पड़ गया कि बरसात में सड़कें तो खराब होती ही हैं, जबकि हकीकत में इस सड़क का डामरीकरण हुआ ही नहीं, तो बरसात में इसके उखड़ने का सवाल पैदा नहीं होता।

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बुलंद हुए बगावत के स्वर
दक्षिण बस्तर की व्यवसायिक नगरी गीदम में खराब सड़कों को लेकर इस सप्ताह लोगों का सब्र जवाब दे गया। नगर पंचायत अध्यक्ष ने तो सत्ताधारी पार्टी का होने और पार्टी अनुशासन में बंधे रहने मजबूरी की परवाह न करते हुए जनता का साथ देने का साहसिक कदम उठाया। व्यापारियों और ड्राइवरों ने तो सड़क सुधारने की मांग को लेकर चक्का जाम ही कर दिया। पुलिस और प्रशासन ने किसी तरह समझा – बुझाकर जाम हटवाया। इसके बाद भी सड़क सुधारने की तत्परता संबंधित विभाग में नहीं दिख रही है। सड़क सुधरे या न सुधरे, हारम चौक में गड्ढे वाली जगह के ठीक ऊपर महंगा सीसी टीवी कैमरा जरूर लग चुका है, जिसमें गिरते – पड़ते सफ़र करने की फुटेज जरूर देखी जा सकती है।

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बदलाव के दौर में भाजपा

एक व्यक्ति, एक पद वाली नीति पर चलने वाली भाजपा ने छत्तीसगढ़ में कड़ा फैसला लिया है। भाजपा के छत्तीसगढ़ प्रभारी नेताओं के बदले जाने से पार्टी बस्तर में अब बदलाव के नए दौर से गुजरने को तैयार है। पुराने प्रभारी को साधकर अपनी मनचाही पोस्टिंग करवाने वाले नेताओं में बेचैनी की लहर तो है, लेकिन दूसरा धड़ा इससे काफी खुश नजर आ रहा है। टिकट वितरण हो या पद आबंटन, सभी सेक्टर पर इसका असर पड़ सकता है। अब अकेले सीएम साय ही सत्ता के पावर सेंटर बने रहेंगे। दूसरे साय की विदाई के साथ ही नई जिम्मेदारी की शुभेच्छा भी दे दी गई है । अब देखना यह है कि पार्टी में बदलाव से नेताओं, कार्यकर्ताओं में बढ़ते असंतोष को चुनावी साल से पहले कैसे शांत कर पाते हैं।
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तर – ब – तर हुआ बस्तर

सितम्बर महीने के अंतिम पखवाड़े में समूचे बस्तर में बाढ़ ने कहर ढाया है। तूफानी चक्रवात के असर से हुई बारिश और फिर खातीगुड़ा डैम के गेट खुलने से आई बाढ़ ने हजारों को बेघर बार कर दिया। इंडियन एयरफोर्स के जांबाजों ने कुछ जगहों पर हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू कर बाढ़ में फंसे लोगों को जीवनदान दिया। प्राकृतिक आपदा पर किसी का बस तो नहीं चलता, लेकिन जिस तरह से ओड़िशा के खातीगुड़ा बांध से भारी मात्रा में अचानक पानी छोड़ा गया, उससे पड़ोसी राज्य ओड़िशा के जल प्रबंधन की खराब रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। अगर समय रहते बाँध से पानी कम किया जाता रहता तो शायद इतने बड़े पैमाने पर एक साथ पानी छोड़ने की नौबत नहीं आती। वैसे तो, हर साल खातीगुड़ा बांध से पानी छोड़े जाने की वजह से बस्तर की जीवनदायिनी इंद्रावती नदी में बाढ़ की स्थिति बनती है, लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा ही बिगड़ गया। बस्तर और छत्तीसगढ़ के कर्णधार कभी इस विषय पर दमदारी से छत्तीसगढ़ का पक्ष नहीं रख पाते हैं। अब तो दक्षिण का पड़ोसी राज्य भी पोलावरम बांध परियोजना लेकर ताल ठोंकने को तैयार है, जिसका ज्यादा नुकसान छत्तीसगढ़ के बस्तर को ही उठाना पड़ सकता है।
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फिर निकला खदान का जिन्न !

बैलाडीला पर्वत श्रृंखला के नंदराज पहाड़ में लौह अयस्क खनन का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। 7 साल पहले भी यहां खनन का प्रयास हुआ था, तब आदिवासियों के काफी विरोध के बाद तत्कालीन भूपेश सरकार बैकफुट पर आ गई थी और खनन पर रोक लगाना पड़ा था। इस बार भाजपा की सरकार है और फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई है। यानि जिस खनन वाले जिन्न को बोतल में भरकर भूपेश कका ने ढक्कन बंद किया था, अब फिर से कार्क खुलता दिखाई पड़ रहा है। फर्क सिर्फ इतना होगा कि विरोध करने वालों के समर्थन में अब दूसरी पार्टी होगी और समर्थन में दूसरी पार्टी। एक तरफ, आम जनता और ग्रामीण इसे अपनी आस्था और परम्परा का विषय मानते हैं और दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियां सिर्फ राजनीति का विषय।
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दांतों तले उंगली
मुंबई – पुणे के अध्ययन यात्रा पर गए बस्तर के पत्रकारों ने वहां समुद्र के भीतर कई किमी लंबी सुरंग और अटल सेतु समेत कई किमी लंबे फ्लाई ओवर का जाल बिछा हुआ देखकर दांतों तले उंगली दबा ली और यह कहते सुने गये कि हमारे यहां 100 मीटर लंबा पुल भी ढंग से बनाया नहीं जाता, इसमें कई साल लग जाते हैं। सड़कें वाटरप्रूफ नहीं होती, बारिश में खराब हो जाती हैं, फिर बारिश के बाद उनमें रफू करवाना पड़ता है। फिर यहां कौन सी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता होगा?
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