साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 147
2 अगस्त 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
अटेंडेंस एप और झंडा पंडुम गुरुजी
शिक्षकों के ऑन लाइन अटेंडेंस को लेकर राज्य भर के शिक्षकों में असंतोष फैला हुआ है। इसे अव्यवहारिक बताकर शिक्षक संगठनों ने तो आंदोलन की चेतावनी तक दे दी है। सबसे बड़ी समस्या बस्तर के दूरस्थ अंचल में नेटवर्क और कनेक्टिविटी की है, जहां मोबाइल पर कॉलिंग हो जाए, वही किस्मत की बात होती है। उस पर वीएसके एप में अटेंडेंस लगाने लायक तगड़ा नेटवर्क और इंटरनेट स्पीड कैसे पाएं? ड्यूटी वाले स्थल पर पहुंचकर भी अटेंडेंस लग ही जाएगी, इसकी गारंटी नहीं रहती। वैसे, अटेंडेंस वाले इस एप ने दक्षिण – पश्चिम बस्तर के उन झंडा पंडुम गुरुजियों की मुसीबत बढ़ा दी है, जो साल भर में सिर्फ झंडा उत्सव यानी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे खास मौकों पर झंडा फहराने के लिए स्कूल पहुंचते थे, बाकी साल भर ईद का चांद बने रहते थे। धुर नक्सली इलाकों में न तो सड़कें होती थी, न ही नदी – नाले पार कर अफसर पहुंचने का भय। ऐसे में मजे से घर बैठे सैलरी लाभ मिलता रहता था। दूसरी तरफ कई ऐसे भी थे, जो शनिवार की प्रातःकालीन पाली में पहुंचते ही नहीं थे। इतनी सुबह किसी अधिकारी के अंदरूनी इलाके तक निरीक्षण में पहुंचने की कोई संभावना ही नहीं रहती थी। ऐसे शिक्षकों को टाइट करने के चक्कर में ही वीएसके ऐप सरकार ने लागू किया तो गेहूं के साथ घुन के पिस जाने की बजाय घुन के चक्कर में गेहूं भी आफत झेलने को मजबूर हो गए हैं। नेटवर्क और तकनीकी दिक्कत की वजह से ईमानदारी से ड्यूटी बजाने वाले कर्मठ शिक्षकों की मुसीबत बढ़ गई है। लेकिन एक फायदा जरूर हुआ है कि इधर – उधर अटैच होकर कई साल से टाइम पास करते आ रहे शिक्षकों को ऑनलाइन अटेंडेंस के चक्कर में अब स्कूल पहुंचकर पूरे टाइम रुकना पड़ रहा है।
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कांग्रेस को मिला मुद्दा
राष्ट्रपति प्रवास और बस्तर पंडुम आयोजन में टैंट लगाने के लिए साढ़े 6 करोड़ रुपये की बिलिंग के मामले से विपक्षी दल कांग्रेस को बैठे बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस ने हमलावर रुख अपनाते हुए इसके औचित्य पर सवाल उठाया है। बिजली के स्मार्ट मीटर को लेकर जनता में आक्रोश को भुनाने की कोशिश कर रहे विपक्ष के लिए ये बड़ा ब्रेक थ्रू साबित हो सकता है। वैसे, टेंट को लेकर भारी भरकम बिलिंग का यह कोई पुराना मामला नहीं है। जो खुल गया, वो विवाद, वरना बाकी सब जिंदाबाद। बस्तर में अक्सर बड़ी हस्तियों के कार्यक्रम में पंडाल राजधानी या बड़े शहरों के कैटरिंग वाले ही लगाते आए हैं। मोबिलिटी से लेकर उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं को लेकर भारी भरकम बजट बनता है। इधर, भाजपाई खेमे के लोग अब पलटवार के लिए पिछली सरकार के कार्यकाल में मजदूर दिवस पर बोरे बासी खिलाने और बाटी – भंवरा खेलने में हुए खर्च के आंकड़े खंगालने में जुट गये हैं।
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टॉप टेन की दौड़
दक्षिण बस्तर प्रवास पर आये जिले के प्रभारी सचिव ने दंतेवाड़ा में समीक्षा बैठक ली। साथ ही यह भी कहा कि जिला राज्य के टॉप टेन जिलों में शामिल हो, यह लक्ष्य लेकर चलें। अब किन पैरामीटर्स पर जिला टॉप टेन में लाया जाएगा, ये तो अंदर की बात है, पर पूर्व में यहां पदस्थ रहे ‘महोदय’ ने जिस तरह जिले की लाइन लेंथ बिगाड़ी थी, उससे विकास की पिच पर जो बड़े – बड़े गड्ढे हो गए थे। उसे अगले 2 साहब भी ठीक नहीं कर सके और उनका तबादला हो गया। गड्ढे पाटने में ही समय बीतता चला गया।अब न तो डीएमएफ फंड को खर्च करने में उस तरह की आजादी है, न ही वैसा माहौल। सड़कों की दुर्दशा पहले से ज्यादा हो रही है। पंचायतों को पर्याप्त फंड नहीं मिल रहा।
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अंगद के पाँव की तरह जमे बाबू
स्वास्थ्य विभाग में अटैचमेंट खत्म करने के नाम पर हलचल जरूर मची हुई है, लेकिन प्रशासनिक कसावट के मामले में विभाग फिसड्डी साबित हो रहा है। कई बाबू और लेखापाल एक ही शाखा की टेबल पर वर्षों से कब्जा जमाए बैठे हैं। सुस्ती इतनी कि फाइलें धूल खाती हुई पड़ी रहती हैं। अफसर चाहकर भी न तो उनका प्रभार बदल पा रहे हैं, न ही उनसे कोई काम करवा पाते हैं। जबकि समय – समय पर कर्मचारियों का अनिवार्य टेबल रोटेशन करने को लेकर सामान्य प्रशासन विभाग जीएडी का सख्त नियम है। अफसर प्रभार में बदलाव की कोशिश भी करते हैं, तो राजनैतिक रसूख और एप्रोच के बूते पर इसे टलवा दिया जाता है।
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रेल नेटवर्क का विस्तार
बस्तर को इस बार रेल नेटवर्क की बड़ी सौगातें मिली हैं। अरसे से लंबित जगदलपुर – दल्ली राजहरा लाइन के काम को हरी झंडी मिल चुकी है। साथ ही अन्य प्रांतों से भी रेल लाइन बस्तर तक बिछाने की बात हुई है। देखना यह है कि रेल नेटवर्क का विस्तार विकास और यात्री सुविधाओं के लिए होगा या सिर्फ बस्तर से लौह अयस्क दोहन तक सीमित रहता है। अब तक रेलवे केके लाइन के जरिए सिर्फ़ लौह अयस्क ढुलाई से भाड़ा कमाने तक ही सीमित रहा है। रेल लाइन बिछाए गए ज्यादातर गांवों तक विकास पहुंचा ही नहीं। जिन गांवों से होकर रेल पटरी बिछती है, उन गांवों के विकास का जिम्मा भी रेलवे को लेना चाहिए। साथ ही उन गांवों के लोगों को रोजगार में प्राथमिकता देना जरूरी है।
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विज्ञप्ति युद्ध
दक्षिण बस्तर में इन दिनों विज्ञप्ति युद्ध जारी है। आए दिन प्रेस नोट जारी हो रहे हैं। कंधा किसी का, बंदूक किसी की, जैसी स्थिति निर्मित हो रही है। हद तो तब हो गई जब गीदम में भाजपाइयों के बीच चल रहे शीत युद्ध के दौरान एक भाजपा नेता के खिलाफ किसी कांग्रेस नेता की ओर से बेनामी विज्ञप्ति कुछ अखबारों में छप गई, जिसमें विज्ञप्ति जारी करने वाले का नाम तक नहीं था। कांग्रेस का नाम इस्तेमाल कर किसी ने मौके पर चौका लगा दिया था। इसके बाद बवाल मचा तो कांग्रेस के अधिकृत पदाधिकारी को बयान जारी कर इसका खंडन करना पड़ा। इससे पार्टी में बेलगाम चल रहे कार्यकलाप उजागर हो गए। घटनाक्रम ने वह डायलॉग याद दिला दिया कि बिजली के तारों में करंट न हो तो लोग इस पर कपड़े भी सुखाने लगते हैं। पार्टी को मिले नए कप्तान के लिए इस स्थिति को सुधारने की बड़ी चुनौती रहेगी।
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नया काम बनाम पुराना काम
दक्षिण बस्तर में कार्य एजेंसियों और ठेकेदारों का भुगतान रोकने के लिए कुख्यात रहे एक अफसर की अंततः विदाई हो ही गई। भुगतान में जान बूझकर देरी और बाद में पुराना काम बताकर भुगतान से इंकार करने की गजब नीति से लोग परेशान थे। काम की गुणवत्ता पर फोकस करने की बजाय पेमेंट रोकने से विकास की रफ्तार काफी सुस्त हो गई थी। अब अफसर बदलने के बाद हालात बदलने की उम्मीद तो जागी है, लेकिन यह खुशी कितने दिनों तक बनी रहती है, यह देखने वाली बात होगी।
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चलते – चलते..
- शक्तिपीठ मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा को गीदम से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क का कायाकल्प कब होगा, यह बड़ा सवाल है। एनएच घोषित हो जाने के बाद इस पर जिला प्रशासन और पीडब्ल्यूडी का नियंत्रण भी नहीं रहा। गनीमत है कि एनएच घोषित होने से पहले ही डिवाइडर युक्त सड़क बनाने का काम पुलिस लाइन कारली तो हो चुका था। अब जो भी होना है, वो एनएच वालों की मर्जी से ही होगा। और एनएच के कड़े और अव्यवहारिक मापदंड के हिसाब से जल्द ही यह काम होगा, यह कहना मुश्किल है।
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रेल तो केवल दोहन के लिऐ है भंडार भरा है केवल उसका दोहन होगा विकास यही तक सीमित है