साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द-बाण’ भाग-103
29 सितंबर 2025
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
बोधघाट परियोजना और विरोध की राजनीति
भाजपा-कांग्रेस समय समय पर एक दूसरे को कोस कर रस्म पूरी करते हैं। दशकों से डिब्बा बंद पड़ी इस परियोजना को पुनर्जीवित करने की कोशिश कांग्रेस की भूपेश सरकार ने की, तब वर्तमान कांकेर सांसद भोजराज नाग भाजपा नेता की हैसियत से इसके विरोध में उतरे थे। चुनाव परिणाम बिगड़ने की आशंका में भूपेश सरकार ने इस परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब भाजपा की विष्णुदेव सरकार ने परियोजना को शुरू करने का ऐलान किया तो विपक्षी कांग्रेसी विरोध में उतर आए हैं। आम जनता को इस राजनीतिक दांव-पेंच से क्या लेना-देना? सत्ता के हिसाब से विरोध व समर्थन का गणित समझ से परे है। परियोजना आम जनता के लिए कितनी फायदेमंद या नुकसानदेह है, यह असल सच सामने आना चाहिए।
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ठेकेदारों का फूटा गुबार
दंतेवाड़ा जिले में पिछले कुछ वर्षों से भुगतान का संकट झेल रहे ठेकेदारों के दिल का गुबार फट ही पड़ा। तभी तो जल जीवन और अमृत मिशन के कमीशन वसूली की शिकायत राज्य के पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर और राज्य के डिप्टी सीएम अरुण साव के सामने कर दी। ठेकेदारों ने न सिर्फ लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अफसर की शिकायत की, बल्कि पीडब्ल्यूडी, आरईएस जैसे अन्य तकनीकी विभागों के अफसरों की शिकायत भी हेडमास्टर यानी पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर से कर दी। एक-दो के खिलाफ तो बगैर भुगतान के ही एडवांस में दसवंद मांगने का आरोप है। आखिर ऐसी क्या नौबत आ गई कि जो ‘शिष्टाचार’ पहले से चला आ रहा है, उसे ‘भ्रष्टाचार’ कहने से गुरेज नहीं रहा। खैर, भुगतान न हो तो भला कोई भूखे पेट भजन कैसे करे?
अब देखना यह है कि डिप्टी सीएम से की गई शिकायत रंग लाती है या फिर भूपेश कका के जमाने वाले नख-शिख-दंत विहीन डिप्टी सीएम बाबा की तरह लाचारी में सिर्फ आवेदन लेने की खानापूर्ति होती है।
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रिटायरमेंट की उम्र में मारे जा रहे नक्सली
पिछले कुछ महीनों से बड़े नक्सली लीडर लगातार मारे गए हैं, जिनकी औसत उम्र 60 से 70 के बीच की है। इसी उम्र के कुछ शीर्ष लीडरों ने सरेंडर भी किया है। इनमें से कुछ पर तो 1 करोड़ या उससे भी ज्यादा के इनाम विभिन्न राज्यों में घोषित हैं। अब सवाल यह उठता है कि सारी उम्र अपने संगठन के जरिये हिंसात्मक गतिविधियां चलाने वाले इन नक्सल नेताओं की परछाई तक सुरक्षा एजेंसियां कैसे पकड़ नहीं सकीं। वहीं, जीवन भर पुलिस को छकाने के बाद अब रिटायरमेंट की उम्र में सरेंडर कर नौकरीपेशा व्यक्तियों से भी ज्यादा ग्रेच्युटी व आर्थिक लाभ का सुख भोगने का मौका मिलने को लेकर दूसरे पक्ष में चर्चा का विषय बनता जा रहा है।
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श्रीमती एनजीओ का मामला
राज्य में समाज कल्याण विभाग में कुछ आईएएस अफसरों की पत्नियों के एनजीओ की हेराफेरी का मामला उजागर हुआ है। यह मामला खुलने के बाद से करीब दर्जन भर अफसर जांच एजेंसियों के राडार पर आ गए हैं। यह मामला तब खुला, जब फर्जी नियुक्ति के जरिए अपने नाम से वेतन आहरण की शिकायत एक बेरोजगार ने दर्ज करवाई। वरना, यह मामला भी बस्तर संभाग में महिला व बाल विकास विभाग के आंगनबाड़ी केंद्रों में सस्ते व घटिया खिलौने सप्लाई वाले मामले की तरह ठंडे बस्ते में चला जाता। इसमें भी एक श्रीमती एनजीओ की भूमिका संदिग्ध बताई जाती है। वैसे मालामाल होने को यह ‘श्रीमती’ एनजीओ वाला आईडिया भी अच्छा है। सरकार इतना वेतन-भत्ते तो देती नहीं है कि विलासितापूर्ण ढंग से जिंदगी गुजर-बसर हो जाए। फिर ऐसी निंजा टेक्निक अपनाने की जरूरत पड़ ही जाती है। महंगाई के जमाने में यह प्राचीन सूक्ति कोई अपनाना नहीं चाहता..
“सांई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय।
मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए।।”
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अंधेरे में पदयात्रा या अंधेरे में प्रशासन?
जगदलपुर से दंतेवाड़ा मार्ग पर बास्तानार घाट में पदयात्री अंधेरे में पदयात्रा कर दंतेवाड़ा पहुंचने को मजबूर हैं। घाट में लगे सोलर स्ट्रीट लाइट्स कोरोना काल से बंद पड़े हैं। कोरोना जैसा घातक वायरस भी वापस चला गया, लेकिन सोलर स्ट्रीट लाइट नहीं सुधारी गई। बस्तर जिले का हिस्सा होने की वजह से क्रेडा विभाग जगदलपुर और एनएच के अफसरों पर इसके मेंटेनेंस की जिम्मेदारी तो बनती है, लेकिन दोनों में कोई भी यह जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं दिखते हैं। अब लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर पदयात्रियों को अंधेरे में रखा जा रहा है या फिर बस्तर जिला प्रशासन के अफसरों को, जो घाट में सिर्फ कुछ पदयात्री सेवा केंद्र संचालित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं।
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सांप गुजरने के बाद लाठी पीट रहा विभाग
राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग कितनी दूरदर्शी सोच रखता है, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि मानसून की विदाई बेला में बाढ़ जैसी आपदा से निपटने का प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा में ये मॉक ड्रिल आयोजित कर तैयारियां इसी हफ्ते परखी गईं, जबकि इस मानसून सीजन का बाढ़ इन तीनों जिलों में भारी तबाही पहले ही मचा चुका है। अब जबकि मानसून की वापसी का टिकट कट चुका है, ऐसे में सांप गुजरने के बाद लाठी पीटने जैसी औपचारिकता निभाने का भला क्या औचित्य है? अच्छा होता कि इस बार की बाढ़ से सबक लेकर पर्याप्त संख्या में मोटरबोट, स्टाफ का स्थायी इंतजाम किया जाता।
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विकासशील से विकसित छत्तीसगढ़ की उम्मीद
विकसित राज्य बनने की दिशा में अग्रसर छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कमान अब ‘विकास शील’ अफसर के हाथ में सौंपी गई है। छत्तीसगढ़ के नए मुख्य सचिव की दौड़ में कई सीनियर महिला आईएएस अफसर भी थीं, पर सरकार ने विकासशील की कार्यकुशलता व सुदीर्घ अनुभव पर भरोसा जताया है। इसके पहले मुख्य सचिव रहे एक अफसर के नाम के विपरीत ‘विवेकहीन’ करतूतों की वजह से रिटायरमेंट के बाद अदालतों के चक्कर काटने की नौबत आ गई है। अब देखना यह है कि नए अफसर नाम को सार्थक करते हुए राज्य को विकासशील से विकसित राज्य बनाने में कितना सफल हो पाते हैं।


शानदार जबरदस्त
बेहतरीन सर,