गब्बर इज़ बैक (शब्द बाण-100)

गब्बर इज़ बैक (शब्द बाण-100)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम “शब्द बाण” भाग-100
7 सितंबर 2025

शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

शेख इज बैक..
गब्बर इज़ बैक की तर्ज पर गीदम में फिर से पोस्टिंग करवाकर लौटने की कोशिश में गीदम के निलंबित बीईओ शेख साहब के अरमानों पर पानी फिर गया। पुराने समय से खार खाए शिक्षकों ने विरोध का परचम बुलंद कर दिया। विरोध प्रदर्शन और चरणबद्ध हड़ताल का शेड्यूल तक शिक्षकों ने घोषित कर दिया है। शिक्षकों का यह तर्क भी वाज़िब है कि आखिर विभागीय जांच का सामना कर रहे किसी निलंबित बीईओ को उसी जगह पर फिर से पोस्टिंग कैसे दी जा सकती है। जांच को प्रभावित करने और लीपा-पोती की आशंका से कैसे इनकार किया जा सकता है। पोस्टिंग देने की पालिसी पर भी सवाल उठने लगे हैं।
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एक नाव के भरोसे आपदा प्रबंधन

इन दिनों जब एक साथ दो नावों की सवारी का चलन बढ़ गया है, खासकर प्रेमी से अपने पति राजा की हत्या करवाने वाली सोनम रघुवंशी के दौर में, तब भी दंतेवाड़ा जिले का आपदा प्रबंधन सिर्फ इकलौते नाव के भरोसे चल रहा है। तभी तो अचानक मचे जल प्रलय में लोग नाव का इंतज़ार करते रहे, लेकिन नाव एक छोर पर उपलब्ध रही, दूसरे छोर पर भगवान भरोसे बचाव कार्य चलता रहा। इतने बड़े जिले में बचाव दल के लिए सिर्फ एक नाव का उपलब्ध होना चर्चा का विषय बना हुआ है।

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श्रमदान या आफ़त को न्यौता?
सबसे ज्यादा लापरवाह एनएच यानी नेशनल हाईवे विभाग की किरकिरी बार-बार होती है। पहले दिन कांग्रेसियों ने गीदम शहर में सड़कों के गड्ढे श्रमदान कर भरे, तो अगले ही दिन गीदम पुलिस ने भी सड़कों के गड्ढे कांक्रीट से भरकर सराहना पाई। अब देखना यह है कि गड्ढे भरने पर सरकार से उन्हें शाबाशी मिलती है या निलंबन। दरअसल, राज्य के बलरामपुर-सूरजपुर में सड़क पर श्रमदान करने वाले शिक्षकों को नोटिस व निलंबन का पुरस्कार इसी हफ्ते मिला है। उनकी गलती सिर्फ यही थी कि नेकी कर दरिया में डालने की जगह वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दी और इसका फायदा विपक्षी कांग्रेसियों को मिल गया। वैसे, सड़कों की मरम्मत, रिनीवल को लेकर एनएच विभाग का जिस तरह का सुस्त रवैया रहता है, उससे इस विभाग के कर्ता-धर्ताओं के लिए ‘कुंभकर्ण’ अवार्ड की स्थापना करने की जरूरत है।

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बाढ़ आपदा और आरबीसी-64 का राग

जापान प्रवास से लौटते ही मुख्यमंत्री साय बाढ़ आपदा प्रभावितों का हाल-चाल जानने दंतेवाड़ा पहुंच गए। मुख्यमंत्री महोदय की इस संवेदनशीलता की खूब तारीफ भी हुई, लेकिन प्रभावित क्षेत्र के लिए किसी तरह का राहत पैकेज घोषित करने की उम्मीदें लिए जनता को खासी मायूसी हुई। मुख्यमंत्री महोदय सिर्फ आरबीसी-64 के प्रावधानों के तहत मदद देने का राग अलापते दिखे, जिसमें मकान की पूर्ण क्षति पर 1.20 लाख रुपये देने का प्रावधान है। यह राशि इतनी कम है कि ढंग का एक टॉयलेट भी न बन पाए। अच्छा होता कि चुनावी लॉलीपॉप में पूरे राज्य में किसानों की कर्जमाफी देने की बजाय सिर्फ बाढ़ प्रभावित क्षेत्र वाले ब्लॉकों में तत्काल सारे कर्ज माफ कर दिए जाते।
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स्कूलों में शनिवार हाफ डे पर बवाल

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने दफ्तरों में 5 डे वीक वाली कार्य संस्कृति को तो यथावत जारी रखा है, जिसे कांग्रेस सरकार ने शुरू किया था, लेकिन इसकी जगह स्कूलों में शनिवार की सुबह वाली पाली को समाप्त कर दिन भर स्कूल संचालन का नया फरमान जारी कर दिया है। इससे शिक्षकों में खासी नाराजगी है। शनिवार को हाफ डे वाली पुरानी व्यवस्था के फायदे गिनाए जा रहे हैं, जिसमें बच्चों को रूटीन में नयापन तो मिलता ही था, शिक्षकों को भी डेढ़ दिन का अवकाश मिल जाता था। हालांकि, पहुंचविहीन व दूरदराज के ज्यादातर स्कूलों में सुबह की पाली का कोई ठिकाना नहीं हुआ करता था, क्योंकि अफसर भी इतनी सुबह निरीक्षण पर नहीं पहुंच पाते थे। इसके बावजूद शनिवार के हाफ डे के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अब देखना यह है कि शिक्षकों की मांग पर कोई सुनवाई हो पाती है या नहीं।
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पीडब्ल्यूडी की सुस्ती
बाढ़ आपदा से ग्रस्त दंतेवाड़ा जिले में सड़क निर्माण करने वाले प्रमुख पीडब्ल्यूडी और पीएमजीएसवाई विभाग की सुस्ती एक बार फिर उजागर हो गई। कागजी पैच रिपेयर और वार्षिक मेंटेनेंस से गुजारा चलाने वाले इन विभाग के अफसरों को बाढ़ से क्षतिग्रस्त पुल-पुलियों की मरम्मत और यातायात बहाली की कोई योजना ही नहीं सूझ रही थी। बाढ़ का पानी उतरने के कई दिनों बाद भी स्थिति वैसी ही बनी रही। बारसूर मार्ग पर जब जिलाधीश ने स्वयं स्थल निरीक्षण कर 24 घन्टे के भीतर गड्ढे भरने की हिदायत दी, तब जाकर काम शुरू किया गया। इन जगहों पर पुल नहीं टूटे थे, सिर्फ एप्रोच बह गया था। यानी काम बाढ़ के अगले ही दिन भी शुरू किया जा सकता था।

चलते-चलते..

सर्किट हाऊस जगदलपुर में कर्मचारी से कथित मारपीट का मामला सुर्खियों में है। मंत्री के खिलाफ विपक्षियों को संजीवनी बूटी मिल गई ऐसा लगता है। पीसीसी अध्यक्ष से लेकर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री तक बयान जारी कर मंत्री से इस्तीफे की मांग करते दिख रहे हैं। वहीं, मंत्री समर्थकों के अपने तर्क हैं। अब देखना यह है कि यह मामला क्या रंग दिखाता है।
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पाठकों से….

 

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण’ का शतक 
साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम “शब्द-बाण” का यह 100 वां एपिसोड है। दक्षिण बस्तर जैसी जगह से पहला व्यंग्य कॉलम शुरू करना जितना आसान था, उतना ही कठिन इसकी निरंतरता जारी रखना भी था। इसके बाद भी बिना नागा किए हर सप्ताह यह व्यंग्य कॉलम आपके सामने लाने की कोशिश काफी हद तक सफल रही। यह आप सभी सुधि पाठकों के स्नेह, समर्थन और अमूल्य फीडबैक से संभव हो सका है। आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश हमने की और परिणाम आपके सामने है।
आगे भी आपके बहुमूल्य सुझावों, आलोचनाओं की प्रतीक्षा हमेशा रहेगी।
सदैव आपका ही…

शैलेन्द्र ठाकुर

Editor

Bastarupdate.com

1 thoughts on“गब्बर इज़ बैक (शब्द बाण-100)

  1. बहुत ही सुंदर व्यंग्य है भैया। जो सत्यता को चीख चीख के बंया कर रही है।

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