साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘ शब्द बाण ‘ भाग – 133
26 अप्रैल 2026
शैलेन्द्र ठाकुर @ दंतेवाड़ा
नवाचारों की झड़ी
दक्षिण बस्तर का बीजापुर जिला अलग तरह के नवाचारों के चर्चित हो रहा है। यहां दो डीईओ वाले शिक्षा विभाग के कारनामों की चर्चा ज्यादा है। कभी स्पेस टेक्नोलॉजी वाला स्कूल भवन बन रहा है, तो कभी नाबालिग छात्राओं के गर्भधारण के मामले में विभाग घिर जाता है। कभी आश्रम छात्रावासों में हाजिरी घोटाला सामने आता है।
ताजा मामला हेडमास्टर की खुदकुशी का सामने आया है, जिसने सुसाइड नोट में प्रताड़ना का आरोप लगाकर सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। मामले में नेता, ठेकेदार और अफसर सवालों के कटघरे में खड़े हैं और ठेकेदार की गिरफ्तारी भी हो चुकी।
एक बात तो साफ है कि स्कूल मरम्मत मद में गुरुजी सिर्फ साइनिंग अथॉरिटी बनकर सिग्नेचर करने तक ही सीमित रहते हैं। चूना पुताई तक अपनी मर्जी से नहीं करवा सकते। पिछली सरकार में स्कूल जतन योजना में ऐसे ही बड़ा खेला कर दिया गया था, बड़े – बड़े अफसरों की संलिप्तता की वजह से नई सरकार भी इसकी जांच और कार्रवाई नहीं करवा सकी। वजह यह है कि सरकार बदलने से सिर्फ राजनीतिक चेहरे बदलते हैं, पर कार्यपालिका और सिस्टम के लोग वही रहते है। फिर कोई अपने ही ऊपर बाण कैसे चलाए?
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डीएमएफ का खजाना अब नारायणपुर में भी
आखिरकार सरकार को नारायणपुर जिला वासियों के हक में फैसला करना ही पड़ा। अब डीएमएफ मद का पैसा जिले को मिलने लगेगा। इसके पहले तक खदानों की धूल नारायणपुर जिले के लोग खा रहे थे और डीएमएफ की मलाई पड़ोसी जिले के हिस्से में जा रही थी। लोगों की जागरूकता और संघर्ष ने आखिर न्याय दिलवा दिया। अब देखना यह है कि नारायणपुर जिले के खाते में अंतरित होने वाली डीएमएफ की राशि सचमुच स्थानीय जरूरत के आधार पर खर्च होती है या छिपी हुई शर्तों के हिसाब से इसका बंटाधार होता है। दीगर डीएमएफ जिलों के अनुभव के आधार पर ऐसी शंका होना स्वाभाविक ही है।
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जिला पंचायत में तकरार
बस्तर संभाग के अलग – अलग जिलों में जिला पंचायत सीईओ और जन प्रतिनिधियों के बीच तकरार और खींचतान के मामले थमते नजर नहीं आ रहे हैं। बस्तर जिला में जिला पंचायत अध्यक्ष एवं अन्य जनप्रतिनिधियों ने हाल ही में प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर अपनी पीड़ा सार्वजनिक की थी। अब बीजापुर जिले में भी ऐसे ही खींचतान की खबर है। जनप्रतिनिधियों के आरोपों
में कितनी सच्चाई है, ये तो वही बता सकते हैं, पर ये बात भी सच है कि दशकों से नक्सलवाद का दंश झेलते आ रहे बस्तर में कई समानांतर सरकारें चलती आ रही हैं। जनताना सरकार के नाम से अपनी समानांतर सरकार चलाने वाले ज्यादातर दादाओं ने तो अब सरेंडर की राह पकड़ ली है, लेकिन जिला पंचायत अफसरों की समानांतर सरकार के आगे जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि अब भी बेबस रहते हैं। फाइलें धूल खाती पड़ी रहती हैं। अफसरों के आपसी ईगो की खींचतान में विकास के ट्रेन की जंजीर बार-बार खींची जाती है। पुनर्जीवन की आस में बैठे बस्तर जैसे संवेदनशील इलाके में नौसिखिए और प्रयोगधर्मी युवाओं की जगह अनुभवी और व्यवहारिक अफसरों की पोस्टिंग से ही यह समस्या सुलझ सकती है।
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दवाओं के बगैर हो रहा इलाज
बस्तर में मरीज वापस सिरहा – बैगा की शरण में लौटने को मजबूर हो रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले झाड़ -फूंक से थक हारकर अस्पताल जाते थे, अब अस्पताल से निराश होकर झाड़ -फूंक करवाने जा रहे हैं। दरअसल,
बस्तर संभाग के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर बिना दवाई के इलाज करने को मजबूर हैं। ज्यादातर लैब टेस्ट तक बाहर से करवाना पड़ता है। मलेरिया, उल्टी दस्त जैसी साधारण बीमारियों के लिए भी दवाओं का स्टॉक नहीं रहता है। स्लाइन चढ़ाने के लिए बोतलें तक नहीं है। जब से सीजीएमएससी खुद घोटालों में फंसा है, तब से जिलों में दवाओं से लेकर उपकरणों तक की सप्लाई ठप है। लोग कहने लगे हैं कि कम से कम अमानक ही सही, पहले दवाएं मिलती तो थी।
अस्पताल प्रमुखों को बाहर से दवा खरीदने की आजादी भी नहीं है।
अब सरकारी डॉक्टर परेशान हैं कि दवाओं से इलाज करे या मरीज के हाथ पैरों की मालिश करे। ज्यादा रेफर भी नहीं कर सकते, और बाहर की दवा लिख भी नहीं सकते, अस्पताल की जो दवा लिखेंगे, वो मिलेगी नहीं। ऐसे में सिर्फ मुकम्मल दुआ ही दे सकते हैं।
अच्छा होता कि सरकार डॉक्टरों को हिप्नोथैरेपी जैसे बगैर दवा के सम्मोहन से इलाज वाली ट्रेनिंग भी दिला देती।
किसी ने क्या खूब कहा है –
ईलाज ए दर्दे दिल मसीहा तुमसे हो नहीं सकता ,
तुम अच्छा कर नहीं सकते और मैं अच्छा हो नहीं सकता।
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सेनापति की तलाश
दंतेवाड़ा में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की स्थिति बिना सेनापति वाली सेना की तरह हो गई है। जिलाध्यक्ष के इस्तीफे की चर्चा तो है, पर अधिकृत तौर पर इसे स्वीकारा नहीं जा रहा है। लेकिन अंदरखाने से यह बात सामने आ रही है कि नए सेनापति की तलाश जारी है और सेनापति ऐसे व्यक्ति को ही बनाया जाना है, जो हर लिहाज से सर्वगुण सम्पन्न हो और पार्टी में नई जान फूंक सके। इस दौड़ में अब एक्स एमएलए देवती कर्मा के शामिल होने से समीकरण बदल गया है। पुराने जिलाध्यक्षों के रिपीट होने की संभावना कम ही दिख रही है और आर्थिक कारणों से नए दावेदारों की संख्या भी घट गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में एक्स एमएलए की ताजपोशी होने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
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मृतकों को भी नहीं बख्शा
कहा गया है कि दंतेवाड़ा में जो हो जाए, वो भी कम है। रोज कुछ न कुछ अतरंगी होता रहता है। इस कड़ी में मुक्तिधाम को भी नहीं बख्शा जा रहा है। कभी कोई कंस्ट्रक्शन वर्क के लिए कब्र खोद देता है, तो कभी कोई बाउंड्रीवाल बनाने लगता है। कभी दाह संस्कार वाले शेड की जगह बदल दी जाती है। इस बार मुक्तिधाम के प्रवेश द्वार पर संपत्ति कर के निर्धारण के लिए एक सर्वे कम्पनी ने क्यूआर कोड लगा दिया है। जिसमें पता निजी कॉलोनी का फीड हुआ है। अब ये टैक्स कौन पटाएगा, यह बड़ा सवाल है। मुक्तिधाम में जहां दिवंगत आत्माओं के मोक्ष की उम्मीद की जाती है, वहां भी
इन आत्माओं को चैन से रहने नहीं दिया जा रहा। यहां टैक्स का बोझ डालने से अजीबोगरीब समस्या खड़ी हो गई है। अब वो दिन दूर नहीं, जब कोई दिवंगत आत्मा यह कह उठे –
जीने भी नहीं देते तेरे शहर के लोग,
मरने भी नहीं देते तेरे शहर के लोग !
कैसे मरे चैन से कोई बताए अब तो ,
कि जहर पीने भी नहीं देते तेरे शहर के लोग !
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चिप वाले नोट
बस्तर में नक्सलवाद के सरेंडर के बाद जंगलों में गड़े डंप और उसमें छिपाए गए अकूत खजाने की तलाश में सुरक्षा एजेंसियां जुटी हुई हैं। नीले ड्रमों में भरकर छिपाए गए करारे नोटों को खोज निकालने का फिलहाल कोई फार्मूला पुलिस के पास नहीं है। कुछ साल पहले जब ऐतिहासिक नोट बंदी हुई थी, तब एक न्यूज चैनल की प्रसिद्ध एंकर चीख – चीखकर कह रही थी कि नए नोटों पर चिप लगा हुआ होगा, जिससे नोटों की ट्रैकिंग जीपीएस के जरिए होगी और कालेधन को छिपाया नहीं जा सकेगा। काश, सरकार ने सचमुच ऐसा चिप लगा दिया होता, तो लोगों को जमीन के भीतर से नक्सली हांडा वाला धन खोद निकालने में दिक्कत नहीं होती।
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