बेताल की तरह पीठ पर चिपके अफसर..(शब्द बाण-120)

बेताल की तरह पीठ पर चिपके अफसर..(शब्द बाण-120)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग-120

 

शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा

(25 जनवरी 2026)

रेत डंपरों की मौज
दक्षिण बस्तर में रेत का अवैध कारोबार जी का जंजाल बनता जा रहा है। डंपरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, जो नदी-नालों का सीना छलनी कर दिन-रात रेत निकाल रहे हैं और जहां-तहां डंप करते दिखते हैं। खनिज और वन, पर्यावरण के तमाम नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए हैं। माइनिंग विभाग का अमला या तो धृतराष्ट्र बनकर मौन रह जाता है, या फिर आंखों में पट्टी बांधकर धृतराष्ट्र के कार्यों में मौन समर्थन देता रहता है। ज्यादा बवाल मचा तो एक-दो गाड़ियों की जब्ती दिखाकर खानापूर्ति कर दी जाती है। इन सबके बीच रेत ‘डंपरों’ के हौसले बुलंद हैं। कोंटा-बीजापुर इलाके में रेत की अंतर्राज्यीय तस्करी का मामला जगजाहिर है।
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आकाश से उम्मीदें..
बस्तर संभाग के सबसे महत्वपूर्ण जिले बस्तर में युवा आईएएस आकाश छिकारा को प्रशासन की कमान सौंपी गई है। पिछले कुछ वर्षों से सुकमा जिले की कलेक्टरी कर चुके अफसरों को बस्तर की कमान सौंपी जा रही थी। इस बार यह मिथक टूट गया। इतना जरूर है कि आकाश को दक्षिण बस्तर यानी दंतेवाड़ा जिले में जिला पंचायत सीईओ के तौर पर काम करने का सुदीर्घ अनुभव है, जो पड़ोसी जिले की आकांक्षाओं को आकाश तक पहुंचाने में काफी काम आ सकता है। वैसे भी बस्तर जिले में काम करने और नया मील का पत्थर तय करने सम्भावनाओं का अनंत आकाश मौजूद है।
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टूट रही परंपरा
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से अमूमन सभी मुख्यमंत्री गणतंत्र दिवस पर बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर में ही राष्ट्रीय ध्वज फहराते आ रहे थे। लेकिन बीते कुछ सालों से यह परम्परा टूटी है। मुख्यमंत्री ने पहले सरगुजा और इस बार बिलासपुर का रुख किया है। अब उनकी जगह उप मुख्यमंत्री गणतंत्र दिवस पर बस्तर में झंडा फहराएंगे। कुल मिलाकर आम चर्चा यह है कि आम चुनाव में ‘सरकार’ तय करने वाला बस्तर ही अब सरकार की प्राथमिकता सूची में निचले पायदान की ओर खिसकता जा रहा है।
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बवाल के बाद भी जमे अफसर
खाद्य विभाग में मचे बवाल के बाद भी दंतेवाड़ा जिले के फ़ूड ऑफिसर को सरकार ने ‘अभयदान’ दिया हुआ है। इस अभयदान की क्या कीमत हो सकती है, ये तो सरकार में बैठे आका ही जानें, पर कांग्रेस सरकार के समय से जमकर राहुल द्रविड़ की तरह क्लासिकल बैटिंग कर रहे उक्त अफसर अब भी पिच पर नॉट आउट हैं। इधर ज्यादातर राशन दुकानों में आम जनता में बेस्वाद और बदरंग हो चुका चावल धड़ल्ले से खपाया जा रहा है।

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विक्रम-बेताल के किस्से
दंतेवाड़ा जिले में कुछ अफसर खराब परफॉर्मेंस के बाद भी कुर्सी से चिपके हुए हैं। राज्य में सत्ता बदले हुए 2 साल से ज्यादा वक्त हो गया, लेकिन इन अफसरों की सेटिंग के आगे नई सरकार बेबस है। विभाग और अफसरों के बीच विक्रम-बेताल जैसी केमेस्ट्री को देखकर लोग यह समझ नहीं पा रहे कि इनमें कौन विक्रम है, और कौन बेताल? कौन किसकी पीठ पर बैठा है? ट्रांसफर आर्डर की सुगबुगाहट होते ही राजा विक्रम की तरह दौड़कर बेताल यानी कुर्सी को फिर पीठ पर लाद लाते हैं। फिर यह रोना रोना भी नहीं छोड़ते कि यहां कुछ रखा भी नहीं है, मजबूरी में ढो रहे हैं। फूड, आईसीडीएस, पीडब्ल्यूडी, मार्केटिंग समेत कुछ और मलाईदार विभागों की यह कहानी जग जाहिर है।
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मेडिकल कॉलेज का रास्ता साफ
राज्य सरकार ने अंततः दंतेवाड़ा मेडिकल कॉलेज के लिए एकेडमिक डीन और मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की नियुक्ति का आदेश जारी कर ही दिया। इससे नए मेडिकल कॉलेज के खुलने का रास्ता साफ हो गया है। भले ही भवन निर्माण की जगह को लेकर चल रही रस्साकशी अलग चल रही हो, लेकिन मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल का शुरुआती संचालन जिला हॉस्पिटल में ही होगा, यह तय हो गया है। इससे अस्पताल में स्टाफ, संसाधन और फंड की कमी नहीं रहेगी, यह उम्मीद की जा सकती है।
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कौन बनेगा विजेता?

गणतंत्र दिवस पर चलित झांकियों को लेकर इस बार लोगों में उत्सुकता तो है, लेकिन पुरस्कार के मामले में मैच फिक्सिंग टाइप की स्थिति रहती है। एक ही पैटर्न और विभाग हर साल अव्वल घोषित होता है। रिजल्ट फिक्स मानकर दूसरे विभाग के लोग झांकी सिर्फ खानापूर्ति के लिए तैयार करते हैं। यह भी एक ट्रेंड है कि अक्सर प्रभारी मंत्री का विभाग ही विजेता बनता है। इस बार दंतेवाड़ा जिले में शिक्षा मंत्री मुख्य अतिथि होंगे, तो जाहिर सी बात है कि इस बार विभाग का उत्साह आसमान की बुलंदियों पर है। वो तो गनीमत रही कि कोरोना काल मे झांकी नहीं निकली, वरना दंतेवाड़ा में आबकारी विभाग लगातार चैंपियन बनता।

चलते-चलते…
दक्षिण बस्तर की व्यवसायिक राजधानी गीदम में चल रहा मिनी विश्वयुद्ध फिलहाल सीज फायर की स्थिति में आ गया है। इस युद्ध की स्थिति कोविड महामारी की तरह ही थी, जब तक मीडिया का अटेंशन मिलता रहता था, कोविड की नई-नई लहरें आती रहती थी, जैसे ही मीडिया ने उपेक्षा कर दी, कोविड की लहरें गायब होने लगी। खैर, इस लड़ाई में प्रदेशाध्यक्ष से मिली फटकार के बाद भाजपा की अंदरूनी कलह पर भी अस्थाई विराम लग गया है।

✍🏻 शैलेन्द्र ठाकुर की कलम से..

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