कैलेंडर से पहले बदले जा रहे कलेक्टर… (शब्द बाण-116)

कैलेंडर से पहले बदले जा रहे कलेक्टर… (शब्द बाण-116)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग-116
28 दिसंबर 2025

शैलेन्द्र ठाकुर @ दंतेवाड़ा

कैलेंडर से पहले बदल रहे कलेक्टर
कभी नवाचारों के लिए सुर्खियों में रहे दंतेवाड़ा जिले में अब नई तरह का नवाचार चल रहा है। यहां साल का कैलेंडर बदलने से पहले कलेक्टर बदले जा रहे हैं। जब तक नए साहब क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति समझ पाते हैं, तब तक उनका तबादला आदेश निकल चुका होता है। हालिया कुछ प्रशासनिक सर्जरी तो प्री मेच्योर डिलवरी की तरह हुई, जिसमें 7-8 माह में ही सरकार ने सर्जरी कर दी। अभी सरकार के कार्यकाल के 2 साल ही पूरे हुए हैं, 3 साल और बाकी हैं। बदलाव की यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले समय में और भी नए कलेक्टरों का नाम दफ्तर के सूचना पटल पर अंकित हो जायें, तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा।
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डीएमएफ पर आइआईटियन का जोर
कारूं के खजाने की तरह चर्चित डीएमएफ मद को नियंत्रित करने का काम प्रशासनिक अफसर नहीं, बल्कि संविदा पर काम कर रहे ऐसे आइआईटियन कर रहे हैं, जिन्हें फील्ड का कोई व्यवहारिक ज्ञान व अनुभव नहीं रहता है। यही वजह है कि निर्माण कार्यों के मूल्यांकन व भुगतान में अनाप-शनाप कैंची चलाने से निर्माण एजेंसी व ठेकेदारों को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। आरईएस व पीडब्ल्यूडी जैसे विभागों के एसडीओ स्तर के नियमित इंजीनियरों द्वारा प्रमाणित प्राक्कलन व मूल्यांकन पर भी डीएमएफ के संविदा उप अभियंता बेरहमी से कांट-छाँट करने से नहीं झिझकते हैं।
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SIR ने सिर खुजलाने पर किया मजबूर
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण SIR की प्रक्रिया ने राजनीतिक दलों और टिकटार्थियों को सिर खुजलाने पर मजबूर कर दिया है। उन्हें अगले चुनावों का राजनीतिक समीकरण बिगड़ने की आशंका है। यह चिंता भी बेवजह नहीं है। बस्तर संभाग में मतदाता सूची से लाखों नाम कट गए। किसके समर्थक और कितने वोटर कटे, इसका हिसाब निकालना मुश्किल है। इससे अगले चुनाव में वोट और बूथ मैनेजमेंट को लेकर नए सिरे से माथापच्ची करने की नौबत आएगी।
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भुगतान का सदमा
बैलाडीला में खनन कर रही देश की नवरत्न कंपनी एनएमडीसी को भी भुगतान में लेटलतीफी का सरकारी रोग लग गया है। प्रशासनिक जगत में जो रेड टैप यानी लाल फीताशाही सिस्टम कम्प्यूटर वायरस की तरह फ़ाइलों के सरकने की रफ्तार को सुस्त कर देती है, वही वायरस अब एनएमडीसी के स्टॉफ को संक्रमित करने लगा है। मामला तब सुर्खियों में आया जब महीनों से काम का भुगतान नहीं होने के सदमे में एक युवा ठेकेदार की मौत हो गई और परिजनों ने एनएमडीसी पर गंभीर आरोप लगाए।
काम विधिवत पूरा होने के बाद भी भुगतान नहीं होने से सिस्टम में भ्रष्टाचार की बू आना स्वाभाविक ही है। यह तो तय है कि निर्माण कार्य या किसी भी तरह के बड़े भुगतान में परसेंटेज की अंडर टेबल डीलिंग के बगैर फ़ाइल आगे नहीं सरकती है। कई मामलों में सरकार के प्रशासनिक अमले की साठ-गाँठ के बगैर यह मुमकिन भी नहीं है।

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अफसर का टाइम पास
सुकमा जिले के बेहद अंदरूनी इलाके में पदस्थ एक पुलिस अफसर भले ही ऑन रिकॉर्ड वाले पोस्टिंग स्थल पर पूरे समय सशरीर मौजूद नहीं रहे, लेकिन नक्सल क्षेत्र में पोस्टिंग काटने वाला टाइमर बंद नहीं हुआ। अब नई पोस्टिंग अपेक्षाकृत सरल नक्सल जिले में हो गई है। यानी पोस्टिंग क़ी भाषा में एक्सट्रीम हार्ड स्टेशन से मीडियम हार्ड स्टेशन का सफर तय हो गया। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि एप्रोच और एफिसिएंसी अच्छी हो तो कहीं भी सुखी रहा जा सकता है। सनद रहे कि यह वही सुकमा जिला है, जहां इसी रैंक के बहादुर अफसर आकाशराव गिरीपूंजे ने फील्ड पर खुद नेतृत्व करते हुए शहादत पाई और अपना नाम अमर कर लिया।

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बारसूर के गड्ढे और सत्कार की रस्म

दक्षिण बस्तर के पर्यटन स्थलों पर वर्षान्त यानी दिसंबर के आखिरी दिनों में बहार आई हुई है। देश-विदेश के सैलानी यहां उमड़ रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में सुविधायें नहीं दिखती हैं। पर्यटक और दर्शनार्थियों को खुले आसमान के नीचे खाना पकाते और रात बिताते देखा जा सकता है। गीदम-बारसूर सड़क का अधूरा डामरीकरण पर्यटकों को अपनी हड्डियां तुड़वाने में मदद कर रहा है, तो ऐतिहासिक नगरी बारसूर की संकरी सड़कों पर गाड़ियों के पहिए फंस रहे हैं। ऐसी ही स्थिति प्रोटोकॉल यानी सरकारी सत्कार शाखा की भी है। इस शाखा के जिम्मेदार अफसर-कर्मी फोन ही रिसीव कर लें, यह किसी सौभाग्य से कम बात नहीं। पर्यटन स्थलों पर आपात कालीन व्यवस्था भी नदारद है। पर्यटन विकास से क्षेत्र की छवि चमकाने के दावों के बीच यह गज़ब का विरोधाभास है।
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सत्ता का सुरूर..

सत्ता का सुरूर सर चढ़कर बोलता है। पद और पावर मिलने के बाद वही पत्रकार आँखों में खटकने लगते हैं, जिनके साथ विपक्ष में रहते लोकतंत्र रक्षा की दुहाई दिया करते थे। यह सत्ता की स्वाभाविक तासीर है। ताज़ा मामला सुकमा जिले का है, जहां एक पत्रकार को सत्तापक्ष भाजपा के एक ओहदेदार ने न सिर्फ जेल भिजवाने की धमकी दी, बल्कि भविष्य में भी सजग रहने की ताकीद भी कर दी। लेकिन यह दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। मामले की शिकायत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुकी है। यह भी सच है कि अब तक सुकमा जिले की इस सीट पर भाजपा अपना खाता नहीं खोल सकी है, ऊपर से पार्टी की लुटिया ऐसे ही सिपहसालार डुबोते आ रहे हैं। यही वजह है कि दादी का चुनावी रथ अब तक कोई नहीं रोक सका। अब जबकि दादी स्वयं ईडी के चक्कर में जेल यात्रा पर हैं, तब भाजपा के पास यह सीट जीतने का गोल्डन चांस तो है, पर सत्ता और पावर के मद में अपने ही पोस्ट पर आत्मघाती गोल दाग रहे बेलगाम नेताओं की वजह से कहीं यह मौका भी हाथ से न निकल जाए।
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चलते-चलते….
आप सभी सुधि पाठकों को ग्रेगोरियन कैलेंडर नव वर्ष की ढेरों बधाई एवं शुभकामनाएं। नूतन वर्ष आपके जीवन में खुशियों की नई बहार लेकर आए, यही कामना करते हैं।
शैलेन्द्र ठाकुर

✍🏻 Shailendra Thakur

1 thoughts on“कैलेंडर से पहले बदले जा रहे कलेक्टर… (शब्द बाण-116)

  1. कई दिनों बाद सुकमा से जगदलपुर जाना हुआ, कुटुमसर गुफा और तीरथगढ़ के लिए बुकिंग काउंटर में पर्यटक कतारबद्ध होकर अपने टिकट का इंतजार कर रहे थे, हमारी पहचान अब इस शानदार रोड से होती होगी- धूल की चादर और उबड़ -खाबड़ रास्तों से युक्त
    आपसे आग्रह है कि
    कृपया इस मुद्दे को भी अपनी लेखनी में जगह दें
    शुभेक्षा और शुभकामनाओं के साथ आपका
    राजेश सोनकर, सुकमा 🙏🏼🙏🏼

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