साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द-बाण’ भाग-123
(15 फरवरी 2026)
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
अब लाल जहर का आतंक
नक्सलवाद भले ही ढलान की ओर बढ़ता दिख रहा हो, लेकिन अब लाल जहर के आतंक से लोग भयभीत हैं। बैलाडीला की खदानों से लौह अयस्क के दोहन के बाद बचे हुए लाल अपशिष्ट को जहां-तहां ठिकाने लगाया जा रहा है, जिससे जमीन तो बंजर हो ही रही है, जल स्रोतों के प्रदूषित होने की आशंका को लेकर बवाल मचने लगा है। सबसे ज्यादा परेशानी निजी कंपनी द्वारा पाइप लाइन से लौह चूर्ण भेजने के बाद बचे हुए टेलिंग्स से है। सनद रहे कि एनएमडीसी की स्लरी पाइप लाइन बिछाने का काम भी पूर्णता की ओर है, जिसके बाद टेलिंग्स के निपटान की यह समस्या बढ़कर दोगुनी होने वाली है। बेहतर यह होगा कि इस टेलिंग्स से फ्लाई एश से ईंट निर्माण जैसी कोई तकनीक ईजाद कर ली जाए, जिससे आम के आम और गुठलियों के दाम मिल जाएं। वरना, एक लाल आतंक से निपटने के बाद कहीं दूसरी तरह का लाल आतंक आसमान से गिरे खजूर पर अटके टाइप स्थिति न पैदा कर दे।
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*नियम व शर्तें लागू !!
दंतेवाड़ा जिले में रहस्यमय खजाना बन चुके डीएमएफ को लेकर नए-नए रहस्योद्घाटन हो रहे हैं। इसके उपयोग को लेकर नई-नई गाइडलाइन बनती रहती है, जो अफसर अपने-अपने हिसाब से बनाते रहते हैं। खबर है कि दो साल पहले सदस्यों को अंधेरे में रखकर जो नियमावली गुपचुप तरीके से पारित करवा दी गई थी, उसके बारे में डीएमएफ शासी परिषद सदस्यों को ही पता नहीं है। अब सदस्य नियमावली मांगते फिर रहे हैं, लेकिन उन्हें इसकी कॉपी नहीं मिल रही है। ऐसे में जिले में डीएमएफ की राशि का उपयोग विकास कार्यों में किस अनुपात में हो, इसका पता करना मुश्किल हो चुका है। इसकी स्थिति निजी फाइनेंस कंपनियों द्वारा बारीक अक्षरों में लिखी लाइन *नियम व शर्तें लागू जैसी हो गई है।
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गंगाधर ही शक्तिमान है…
बीजापुर जिले में 4 पोटा केबिन आवासीय विद्यालयों के अधीक्षक सस्पेंड कर दिए गए हैं। छात्रावास में बच्चों की फर्जी उपस्थिति दिखाकर वर्षों से बड़ी राशि का गोलमाल करने के मामले में यह कार्रवाई की गई है। प्रथम दृष्टया यह मामला सिर्फ अधीक्षकों की गलती का लगता है, लेकिन मामला बड़ा गम्भीर है। अधीक्षकों की आड़ में दफ्तर में बैठकर मलाई खाने वाले उन अफसरों को अभयदान दे दिया गया, जो मुंडी गिनकर यानी दर्ज संख्या पर हेड काउंट कर हर महीने अधीक्षकों से दशवंद वसूला करते हैं। मामले की बारीकी से जांच हो जाए तो कई शक्तिमानों के गंगाधर होने का पता चल पाएगा।
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धूल से बन रही पहचान
सुकमा से जगदलपुर रुट पर स्थित ज्यादातर पर्यटन स्थलों पर साल भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है। कुटुमसर गुफा और तीरथगढ़ के लिए बुकिंग काउंटर में पर्यटक कतारबद्ध होकर अपने टिकट का इंतजार करते दिखते हैं। बारिश के बाद कुछ महीनों के लिए खुलने वाले कुटुमसर गुफा में भी भारी तादाद में सैलानी पहुंचते हैं। ऐसे ही धुड़मारास, माँझीपाल में बैम्बू राफ्टिंग, कयाकिंग और अन्य रोमांचक अनुभव के लिए लोग बस्तर आना तो चाहते हैं, लेकिन मुख्य मार्ग पर ही धूल स्नान और उबड़-खाबड़ रास्तों का अनुभव लेने की सुविधा से उनका मन खट्टा हो जाता है। इस सड़क की पहचान धूल से होने लगी है।
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नगर सैनिकों का वनवास
दंतेवाड़ा से अलग होकर नया जिला बने सुकमा में नगर सैनिकों को 14 वर्ष का वनवास काटने पर मजबूर होना पड़ रहा है। दरअसल, दंतेवाड़ा से अस्थायी रूप से इन नगर सैनिकों को जल्द ही गृह जिले में वापसी का आश्वासन देकर भेजा गया, लेकिन करीब 14 साल बीतने के बाद भी इनकी घर वापसी नहीं हुई है। नियमित कर्मचारी नहीं होने और मामूली मानदेय के बावजूद घर-परिवार से दूर रखकर ड्यूटी बजाना इनकी मजबूरी बन गई है। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा व अन्य संकट में एसडीआरएफ की भूमिका में भी ये सैनिक खरे उतरते रहे हैं, इसके बावजूद इनकी तकलीफ सुनने वाला कोई नहीं है। सनद रहे कि बस्तर यानी दण्डकारण्य में त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने वनवास काल बिताया था, और सुकमा के इंजरम से होकर गुजरे थे। उसी तपोभूमि में कर्मचारियों को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है।
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जैविक किसान खा रहे केमिकल चावल
दंतेवाड़ा जिले के किसान जैविक विधि से धान की फसल उगाते जरूर हैं, लेकिन जैविक उपज के बदले राशन दुकान में धमतरी व अन्य जिलों का रासायनिक खाद वाला चावल खरीदना उनकी मजबूरी है। आखिर जिले का जैविक उपज वाला धान जाता कहां है, और किसे बेचा जाता है, यह सवाल अनुत्तरित है। जैविक खेती की उपज वाले धान को भी सामान्य धान की कीमत पर सरकार खरीद रही है, जबकि बड़े महानगरों में खतरनाक पेस्टिसाइड और केमिकल फ़र्टिलाइज़र वाले के मुकाबले जैविक उत्पाद वाला चावल कई गुना महंगे दाम में बिकता है। जैविक धान की कीमत बढ़ाने की मांग करते किसान थक चुके हैं। आखिर जैविक धान वाले चावल की खपत जिले में ही क्यों नहीं होती, यह बड़ा सवाल है।
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क्रेडा की लापरवाही
बस्तर में भूजल स्तर को गिराने में क्रेडा यानी छतीसगढ़ अक्षय ऊर्जा अभिकरण की बड़ी भूमिका है। सौर ऊर्जा से पेयजल सप्लाई के नाम पर लाखों टंकियाँ जगह-जगह लगा दी गई हैं, जिनमें टंकी के पानी के ओवरफ्लो से बचाने का कोई सिस्टम ही नहीं रहता है, न ही ग्रामीणों को भूजल संरक्षण का महत्व बताया जाता है। टंकी से ओवरफ्लो होकर दिन-रात पानी बेकार बहता रहता है। एकाग्रचित्त अफसरों का ध्यान जल संरक्षण पर नहीं, बल्कि सिर्फ फिटिंग और संबंधित एजेंसियों से मिलने वाले कमीशन पर रहता है। यही हालत बनी रही तो आने वाले समय में भूजल स्तर की गिरावट पर काबू पाना मुश्किल हो जाएगा।
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