झोलाछाप ठेकेदारों के भरोसे रेल्वे.. (शब्द बाण -122)

झोलाछाप ठेकेदारों के भरोसे रेल्वे.. (शब्द बाण -122)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण’ भाग-122

शैलेन्द्र ठाकुर। दंतेवाड़ा  (09 फरवरी 2026)

रेल्वे केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में से एक होने का दम भले ही भरता हो, लेकिन दक्षिण बस्तर में झोलाछाप ठेकेदारों के भरोसे इसका काम चल रहा है। अंडरब्रिज की सड़क हो या कोई भी महत्वपूर्ण निर्माण कार्य, सभी में बड़े-बड़े ठेकेदार अपने नाम टेंडर तो पास करवा लेते हैं, जिसके लिए दीर्घ कार्य अनुभव, संसाधन और अन्य योग्यताएं जरूरी होती है। लेकिन टेंडर पास होने के बाद अनुभवहीन पेटी ठेकेदारों के जरिए निर्माण कार्य करवाते हैं, जिन्हें न तो काम की गुणवत्ता और मजबूती से मतलब होता है, और न ही जन सरोकार से। थर्ड पार्टी होने के चलते सीधे तौर पर उनकी कोई जवाबदेही या जिम्मेदारी भी नहीं बनती है। उन्हें सिर्फ पेमेंट से मतलब होता है। यही वजह है कि दंतेवाड़ा जिले में गुमड़ा, कतियाररास में अंडरब्रिज की एप्रोच सड़क साल भर के भीतर ही टूटकर मरम्मत के लायक हो जाती है। फरसपाल-दंतेवाड़ा मार्ग पर अंडरब्रिज की कांक्रीट सड़क को फिर से उखाड़कर मरम्मत काम शुरू हो चुका है, यहां ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। केंद्र सरकार का विभाग होने की वजह से स्थानीय प्रशासन का इस पर कोई नियंत्रण भी नहीं रहता है।

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बजट बुक ही नहीं आया
छत्तीसगढ़ सरकार का नया बजट पेश होने वाला है, लेकिन पीडब्ल्यूडी के पिछले सत्र की बजट पुस्तिका ही अब तक नहीं आई। विभागीय अफसरों को ही नहीं पता कि बजट में जिले के लिए कौन-कौन से प्रावधान किए गए हैं। इससे कई काम औपचारिकताओं के इंतजार में अटके रह गए। लोक निर्माण विभाग के अलग-अलग विंग होने की वजह से सभी एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने में जुटे रहते हैं।कभी सामान्य डिवीजन व ब्रिज डिवीजन के बीच, तो कभी राजमार्ग संभाग के साथ वॉलीबाल का खेल चलता रहता है।
पिछले सत्र में राज्य सरकार ने जिले में एक फ्लाईओवर के अलावा 4 रेल्वे अंडरब्रिज/ओवरब्रिज के लिए मंजूरी दी थी, लेकिन किसी भी काम का सर्वे या डीपीआर यानी डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार नही किया गया। कावड़गांव, कतियाररास, कुपेर और कमालूर में ये ओवरब्रिज बनाए जाने हैं, लेकिन अफसरों की लापरवाही से एक साल वैसे ही बीत गया।
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स्टॉप डैम किसके लिए??
दक्षिण बस्तर में स्टॉप डैम की संख्या इतनी ज्यादा है कि खुद सरकार के पास इसका हिसाब नहीं है। पंचायत, जल संसाधन, भूमि संरक्षण विभाग, वाटरशेड की ओर से जहां-तहां स्टॉपडेम बनाए गए हैं। लेकिन इन स्टॉप डैम के गेट कभी बंद नहीं किए जाते हैं। अगर मानसून काल के बीतते ही फाटक बंद कर दिए जाने लगे तो ग्रामीणों को न सिर्फ निस्तारी उपयोग का पानी मिल जाता, बल्कि गिरते भूजल स्तर को थामने में भी मदद मिलती। सिर्फ अफसरों और ठेकेदारों के फायदे के लिए बने इन स्टॉप डैम के बारे में यह मॉडिफाइड परिभाषा उचित होगी।
स्टॉप डैम अफसरों का, अफसरों के लिए, अफसरों के द्वारा निर्मित वह स्ट्रक्चर है, जिसका जल संरक्षण व आम जनता से कोई लेना देना नहीं होता।
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सरपंचों ने खोला मोर्चा
पंचायतों को फंड नहीं मिलने और बेकार बैठने से तंग आकर आखिरकार दंतेवाड़ा जिला सरपंच संघ ने प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल ही दिया। पहले चरण में ज्ञापन सौंपकर धरना प्रदर्शन का अल्टीमेटम भी दिया गया है। सरपंचों की सबसे ज्यादा नाराजगी इस बात को लेकर है कि केंद्र सरकार की योजना से खुल रहे मेडिकल कॉलेज के जिले के हिस्से की डीएमएफ राशि से 300 करोड़ रुपए बुक कर दी गई, जबकि राज्य के अन्य मेडिकल कॉलेजों के लिए केंद्र से फंड मिल रहा है। इधर, फंड के संकट से पंचायतों का कामकाज ठप हो गया है। बीते दो साल से पंचायतों में काम नहीं मिल रहा है। अब देखना यह है कि सरपंचों की नाराजगी क्या रंग दिखाती है?
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फिर निकला रेलिंग का जिन्न
भूपेश सरकार के कार्यकाल में दमन का प्रतीक बने रेलिंग वाला जिन्न फिर बोतल से बाहर निकल आया है। कांग्रेस की तेजतर्रार नेत्री तूलिका कर्मा ने रेलिंग हटवाने की मांग फिर से उठाई है।
इस रेलिंग ने फागुन मेला और तीज त्यौहारों पर पसरा लगाकर पूजन सामग्री बेचने वाले गरीब ग्रामीणों और कुम्हारों को बेदखल कर दिया। “महोदय” की हठधर्मिता और दमनात्मक कार्रवाई झेल चुके लोगों को उम्मीद थी कि सरकार बदलने के बाद नई सरकार इस रेलिंग को हटवाकर राहत देगी। लेकिन महोदय का तबादला होने और रेलिंग के कट्टर समर्थक भाजपा नेता के चुनाव हारने के बाद भी रेलिंग अपनी जगह तनी हुई है। इधर फागुन मेला फिर करीब आ चुका है। बायपास मार्ग का पुल बाढ़ में बहने के बाद से फागुन मेला में यातायात व्यवस्था बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। ऐसे में मेला की दुकानें शहर के भीतर मुख्य मार्ग पर ही सजाने की जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए रेलिंग को हटवाना जरूरी हो गया है।

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सांसदों की सीट पर बवाल
बस्तर पंडुम महोत्सव के संभाग स्तरीय आयोजन में बस्तर संभाग के दोनों सांसदों को मंच पर नहीं बिठाने को लेकर बवाल मचा हुआ है। विपक्षी दल कांग्रेस को बैठे-बिठाए एक मुद्दा मिल गया है। महामहिम राष्ट्रपति के साथ मंच साझा करने का अवसर नहीं मिलने को लेकर पीसीसी अध्यक्ष ने तो मोर्चा ही खोल दिया है। उनका आरोप है कि आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर जो सरकारी आयोजन हुआ, उसमें बस्तर के ही दोनों आदिवासी सांसदों की उपेक्षा कर दी गई।
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दादी की दहाड़
आबकारी घोटाले में करीब साल भर से जेल में बंद रहे लखमा दादी अब जमानत पर छूट चुके हैं। अदालत ने उन्हें राज्य से बाहर रहने की शर्त के साथ जमानत पर रिहा किया है, तो दादी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र से सटे पड़ोसी राज्य ओड़िशा के मलकानगिरी में अपना ठिकाना बना लिया है, और वहीं से भाजपा सरकार के खिलाफ दहाड़ना शुरू कर दिया है। अपनी वाकपटुता के लिए मशहूर दादी के बाहर आने से विरोधियों की बेचैनी बढ़ गई है। प्रशासनिक हल्के में भी ऐसी ही हलचल है।
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चलते-चलते…
दक्षिण बस्तर में बीजेपी के ग्रह-नक्षत्र ठीक नहीं चल रहे हैं, ऐसा लगता है। सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी के युवा नेताओं व पदाधिकारियों पर एफआईआर दर्ज होने का सिलसिला जारी है। गीदम का बवाल शांत हुआ भी नहीं था और जिला पंचायत पदाधिकारी पर एफआईआर हो गई। जवानी के जोश पर पानी छिड़कने वाले बुजुर्गों की कमी साफ महसूस की जा रही है।

✍🏻 शैलेन्द्र ठाकुर की कलम से..

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