साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द-बाण भाग-121
शैलेन्द्र ठाकुर
(दंतेवाड़ा। 01 फरवरी 2026)
अपने पूरे कार्यकाल में ईमानदारी का ढोल पीट-पीटकर लोगों की नाक में दम करने वाले एक बड़े अफसर से मातहत अफसर खासे परेशान हैं। खबर है कि उक्त बड़े साहब अपने तनख्वाह की रकम से बिल्कुल भी खर्च नहीं करते। एक नम्बर की यह शुद्ध आमदनी आरडी खाते की तरह एकाउंट में बढ़ती जा रही है, वहीं मासिक राशन-पानी व अन्य खर्चों का बिल तक छोटे अफसरों को भरना पड़ता है, यानी आम के आम, गुठलियों के भी दाम। लेकिन दिक्क़त यह है कि इसके एवज में न तो आर्थिक आमदनी कमाने की छूट है, और न ही काम-काज के लिए आसानी से बजट रिलीज हो रहा है। ऐसे में छोटे अफसर अपना पेट काटकर भी यह खर्च मैनेज कर रहे हैं। वैसे, यह परंपरा बरसों से चली आ रही है। क्या लेकर आया था, क्या लेकर जाएगा, वाले सिद्धांत से हटकर ज्यादातर खाली हाथ आए अफसर ट्रांसफर के वक्त ट्रक भर-भरकर सागौन के फर्नीचर व महंगे होम अप्लाइन्सेज उपकरण यहां से ले जाते रहे हैं।
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अंधेरा कायम है…
31 मार्च 2026 तक लाल आतंक की समाप्ति की डेड लाइन केंद्र सरकार ने तय कर दी। इसके बाद बंदूक वाले दादाओं की धरपकड़ और मारधाड़ का काम तेज हो गया। सरकार की इच्छाशक्ति के आगे कई बड़े कैडर मारे जा चुके और कई लोग सरेंडर कर अपनी जान बचाने मजबूर हुए हैं। बाद में सरकार ने इसमें एक बारीक लाइन भी जोड़ दी कि इस डेडलाइन तक ‘सशस्त्र’ लाल आतंक का खात्मा हो जाएगा। सरकार को भी समझ में आ गया कि बंदूकधारियों को भले कम किया जा सकता है, लेकिन बिना बंदूक वाले लाल आतंक के सूत्रधारों पर इस डेडलाइन के भीतर काबू पाना इतना आसान नहीं है। वैसे भी, बैलाडीला में लौह अयस्क खदानों से निकलने लाल पानी और वेस्ट मटेरियल वाले लाल मिट्टी के डंप के जहर का ख़ौफ़ भी लाल आतंक से कम नहीं है, जो कम होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है।
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गुरुजियों की परीक्षा
रविवार को हुई शिक्षक पात्रता परीक्षा टीईटी में कई उम्रदराज शिक्षक भी शामिल होते दिखे। उम्र का चालीसा लगने के बाद परीक्षा देना कितना कठिन होता है, ये तो वे ही बता सकते हैं।
दरअसल, रिटायरमेंट के लिए 5 साल से कम समय बाकी रह गए शिक्षकों को छोड़ कर बाकी सभी शिक्षकों को मौजूदा गाइड लाइन के हिसाब से टीईटी पास होना जरूरी है। वरना प्रमोशन और अन्य सुविधाओं से वंचित होने की आशंका बनी रहेगी। ऐसे में सेवाकाल के ढलान पर पहुंचे शिक्षक भी खुद को अग्नि परीक्षा से गुजारते नजर आए, जो कई वर्षों से बच्चों को पढ़ाकर उनकी परीक्षा लेते आ रहे हैं। सफलतम बच्चों की पीढियां गढ़ चुके हैं। हालांकि परीक्षार्थी बने शिक्षकों में कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें गैर शिक्षकीय कार्यों में संलग्न होने की वजह से ब्लैक बोर्ड, चाक डस्टर को छूने का मौका वर्षों से नहीं मिला। नई शिक्षा नीति के नाम पर आने वाले दिनों में और भी कुछ नए-नए प्रयोगों का ऐसा असर देखने को मिल सकता है।
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दारू दुकान में धरना-प्रदर्शन
कांग्रेसियों ने महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर सरकारी शराब दुकानें खुली रखने का जमकर विरोध किया।धरना-प्रदर्शन कर इसे शहादत का अपमान बताया। दुकान के सामने धरना-प्रदर्शन से मदिरा प्रेमी सकते में आ गए। चखना रेडी कर दुकान पहुंचे ज्यादातर सुराप्रेमी चिंतित दिखे।
अपनी सरकार में कोरोना काल में भी दुकान खोलने और आर्डर पर घर बैठे ऑनलाइन दारू मंगवाने की सुविधा दे चुकी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से उन्हें ऐसे विरोध की उम्मीद नहीं की थी। हालांकि, ड्राई-डे पहले से घोषित नहीं होने का हवाला देकर प्रशासन ने दुकान बंद करने से इंकार कर दिया। वैसे भी आर्थिक संकट झेल रही सरकार को गाँधीजी की तस्वीर वाली करेंसी जुटाने की चिंता ज्यादा है। चाहे वो उनकी शहादत का दिवस ही क्यों न हो।
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तिनका-तिनका जोड़ रही सरकार
राज्य सरकार अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ करने के लिए चिड़ियों की तरह तिनका-तिनका जोड़ने में प्राण-पण से जुटी हुई है। विभिन्न विभागों खासकर ग्राम पंचायतों के ज्यादातर बैंक खातों को बंद करवाकर उसमें शेष जमा राशि को सरकार को लौटाने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। इसके पीछे तर्क यह है कि ये म्यूल खाते हैं, जिनकी योजनाएं काफी पहले बंद हो चुकी है और इन एकाउंट्स का कोई उपयोग नहीं बाकी रह गया है। हालांकि, विरोधी इसे भाजपा सरकार के गले की हड्डी बन चुकी चुनावी फ्रीबिज महतारी वंदन योजना में भुगतान के लिए राशि जुटाने का उपक्रम बता रहे हैं। सच क्या है, यह तो सरकार या उसके नुमाइंदे ही बता सकते है।
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सुकमा में अतिथि संकट
सुकमा जिले में पिछले कुछ समय से अतिथि संकट का दौर चल रहा है। यहां अतिथि के तौर पर मंत्रियों व जन प्रतिनिधियों को आमंत्रित करने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। हिड़मा जैसे मोस्ट वांटेड नक्सली लीडर के न्यूट्रलाइज होने के बाद भी ज्यादातर माननीय यहां आने से कतराते हैं। हालिया जिला स्तरीय बस्तर पंडुम आयोजन में कायदे से ट्राइबल मिनिस्टर को बुलाया जाना था, लेकिन वो नहीं आए। सवाल हेलीकाप्टर की उपलब्धता का भी था। प्रशासन की मजबूरी यह है कि यहां स्थानीय विधायक भी सत्ताधारी भाजपा के नहीं हैं। सो, किसी तरह बस्तर कमिश्नर को बुलाकर आतिथ्य की रस्म निभाई गई। ऐसा ही गणतंत्र दिवस के समारोह में हुआ। पूर्व निर्धारित सूची में ऐन वक्त पर फेरबदल करना पड़ा और केशकाल विधायक को बतौर मुख्य अतिथि यहां आना पड़ा।
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धान खरीदी का टारगेट
रकबा और गिरदावरी के नाम पर किसानों की धान खरीदी लिमिट को पूरे समय सख्त कर दिया गया। नतीजतन तय लक्ष्य के हिसाब से धान की खरीदी नहीं हो सकी है। कई किसान अपना फसल ऋण तक नहीं चुका पाए हैं।
इधर सीजन की अंतिम तारीख भी खत्म हो गई। किसान और कांग्रेस अब भी खरीदी की तारीख बढ़ाने की मांग पर अड़े हैं। जांजगीर जिले में तो टोकन नहीं कटने से नाराज एक किसान ने शोले फ़िल्म वाले वीरू की तरह हाई टेंशन टॉवर पर चढ़कर सरकार की टेंशन दिलाने की कोशिश भी कर ली, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। खैर,सरकार को टारगेट पूरा करने से ज्यादा अपना पैसा बचाने में ज्यादा दिलचस्पी है।

