अफसर बड़े या पेंटर….
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
(18जनवरी 2026)
दंतेवाड़ा जिले में पीएमजीएसवाय यानी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना विभाग के किस्से अनंत हैं। कई सड़कें नक्सली समस्या की आड़ में या तो अधूरी छोड़ दी गई, या फिर जितना काम हुआ, उससे ज्यादा राशि का आहरण कर लिया गया। अब नक्सल इलाके में काम का वेरीफिकेशन कौन करे? पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी जी का यह ड्रीम विजन अफसरों के कमीशन की भेंट चढ़ता दिख रहा है। ताजा मामला दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय में किवदंती बन चुकी कतियाररास-डेगलरास सड़क का है। 20 साल पहले इस सड़क का काम शुरू हुआ। ठेकेदार ने मुरुम, मिट्टी, पुलिया निर्माण तक का मलाईदार काम कर लिया और आगे का काम अधूरा छोड़ दिया। डेढ़ दशक बाद रीटेंडर हुआ। दूसरे ठेकेदार ने गिट्टी की परत बिछाई और काम अधूरा छोड़ दिया। योजना की जानकारी देने वाले लोहे के बोर्ड जंग खाकर सड़ गए, लेकिन सड़क अब तक डामरीकृत नहीं हुई। इस बोर्ड की पुरानी तस्वीरों में डामरीकृत सड़क निर्माण का जिक्र साफ दिखता है, लेकिन विभाग के
अफसर मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि सड़क की मंजूरी इतने तक, यानी डब्ल्यूबीएम की ही थी। पेंटर ने बोर्ड पर अपनी मर्जी से डामरीकृत सड़क लिख दिया था। डामरीकरण की मंजूरी के लिए अब आरआरपी के अगले फेज में प्रस्ताव भेजे हैं। अब बताइए, इस्टीमेट और मंजूरी अफसर तय करते हैं, या बोर्ड लिखने वाला पेंटर?
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खेल विभाग में खेला..
पिछले बस्तर पंडुम से लेकर बस्तर ओलंपिक के आयोजन में अफसरों ने बड़ा खेला कर दिया। इसमें खेल विभाग में हुए बड़े खेला की चर्चा अंदरखाने तक है। दरअसल, दक्षिण बस्तर में खेल विभाग अभी भी मुक्त होकर खेल नहीं पा रहा है। डेढ़ दशक पहले तक यह पुलिस विभाग के नियंत्रण में था। पुलिस से स्वतंत्र होकर विभाग चलना सीखने लगा, तो कभी पूर्णकालिक खेल अधिकारी की पोस्टिंग ही नहीं हुई। बिना डीडीओ पॉवर वाले डमी व प्रभारी अफसरों के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने की परंपरा जारी है। कभी डिप्टी कलेक्टर, तो कभी किसी दीगर अफसर को इस विभाग का प्रभारी अफसर बनाया जाता रहा, जिनका शारीरिक खेलकूद पर नहीं, बल्कि वर्चुअल गतिविधियों पर ज्यादा फोकस रहता है। ऐसे में मैदान पर खेल होने और मेडल जीतने की अपेक्षा खिलाड़ियों से कैसे की जा सकती है?
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लाल बुझक्कड़ की पहेली….
दंतेवाड़ा जिले में धान खरीदी की लिमिट लाल बुझक्कड़ के किस्से जैसी है। किसानों को पहले तो साढ़े 12 क्विंटल से ज्यादा धान नहीं बेचने की ताकीद कर दी गई। चेताया गया कि जिस किसान ने ज्यादा धान बेचा, तो सरकारी टीम खेत तक जाकर पराली यानी धान के ठूंठ गिनकर वेरीफिकेशन करेगी। फिर कई स्तर पर फोटोसेशन, बायोमैट्रिक वेरिफिकेशन का अलग झंझट। क्रिकेट टेस्ट मैच में पारी की हार टालने वाली टुकुर-टुकुर तकनीक अपनाई गई। 2 महीने का सीजन बीतने पर जब ज्यादा बवाल मचा तो कह दिया गया कि 21 क्विंटल धान नहीं खरीदने की बात महज अफवाह है। अफवाह फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। मजे की बात यह है कि चेतावनी भी वही अफसर दे रहे हैं, जो ज्यादा धान बेचने पर फील्ड वेरीफिकेशन की बात कहते आ रहे थे।
यानी
लाल बुझक्कड़ बूझ के, और न बूझो कोय।
पांव में चक्की बांध के, हिरणा कूदो होय।
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गीदम का महासंग्राम!
दक्षिण बस्तर की व्यवसायिक नगरी गीदम में इन दिनों माहौल ज्यादा गरमाया हुआ है। किराए के लेन-देन को लेकर हुई मारपीट का मामला बढ़ते-बढ़ते विकराल हो चुका है। हर रोज नए-नए एंगल सामने आ रहे हैं। कुछ एफआईआर भी दर्ज हो चुके हैं। कभी भाजपा-कांग्रेस, कभी समाजों के बीच गहमा-गहमी, तो कभी थाने में बवाल से विवाद को हवा मिलती ही जा रही है। इस मामले में व्यापारी संगठन के अलावा पत्रकार संगठनों में भी काफी गहमा-गहमी का माहौल बन रहा है। इस मामले का सबसे अहम पहलु भाजपा के जिलाध्यक्ष से जुड़े होने की वजह से कांग्रेस को अच्छा खासा मुद्दा मिल गया है। कुछ दिन पहले कांग्रेस जिलाध्यक्ष की नियुक्ति पर टिप्पणी करने से खार खाए कांग्रेसियों ने बदला लेने के मौके को लपक लिया। इधर, भाजपा का ही असंतुष्ट खेमा इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस की एंट्री से नाखुश दिख रहा है, उन्हें आशंका है कि पार्टी संगठन अब कार्रवाई से कहीं हाथ न खींच ले। इनमें वो लोग ज्यादा हैं, जो इस विवाद के बाद खुद को अगले जिलाध्यक्ष का ताज पहने हुए देखने की कल्पना करने लगे हैं। वैसे, महाभारत वाले शिशुपाल प्रसंग की तरह कार्रवाई के लिए भाजपा की गिनती इतनी जल्दी पूरी होने की संभावना कम ही दिखती है।
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पटाखे हो रहे ठंडे
दक्षिण-पश्चिम बस्तर में अलोकप्रिय अफसरों की विदाई की खुशी पटाखे फोड़कर जाहिर करने की नई परिपाटी विकसित हो चुकी है। ‘महोदय’ की विदाई पर कई चौक-चौराहों पर लड़ी जलाकर आतिशबाजी की गई थी। ऐसा पहली बार हुआ था। फिर सुकमा और बस्तर जिले में भी यह नजारा दिखा।
वैसे बस्तर संभाग में अब तक 3 अफसरों के लिए पटाखे फूट चुके हैं। अब
एक और अफसर की विदाई में पटाखे फोड़ने की तैयारी तो है, लेकिन ट्रांसफर आदेश के इंतजार में पटाखे ठंडे पड़ते जा रहे हैं। दरअसल, पंचायतों को अधिकतम 50 लाख रुपए तक का निर्माण कार्य करने का अधिकार मिला हुआ है, लेकिन नई सरकार बनने के बाद से गांवों में तय सीमा से कम लागत वाली सीसी सड़क, पुल-पुलियों को भी टेंडर के जरिए दूसरे विभागों से काम करवाने की नई प्रथा शुरू हो गई है, जिससे पंच-सरपंचों में खासी नाराजगी है। भुगतान अनावश्यक रोकने, नए कार्यों की फाइल अटकाने की शिकायत पहले भी हो चुकी है। इससे नेता, कार्यकर्ता, ठेकेदार भी नाराज हैं।
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डीएमएफ बना दिवा स्वप्न..
किसी समय डीएमएफ खजाने की समृद्धि के लिए मशहूर रहे दंतेवाड़ा जिले में फंड का कृत्रिम संकट आ गया है।
खनिज विभाग के सचिव ने 2 दिन पहले प्रेस कांफ्रेंस में भले भी हजारों करोड़ खनिज राजस्व राज्य और जिलों को मिलने का ब्यौरा दिया है, लेकिन लौह अयस्क खदान वाले जिले में ही मैदानी हकीकत कुछ और है।
डीएमएफ की 300 करोड़ की राशि मेडिकल कॉलेज भवन निर्माण के नाम पर बुक कर दी गई, जबकि इस मेडिकल कॉलेज निर्माण के लिए केंद्र व राज्य सरकार के मद से राशि मिलने वाली थी। अब फंड नहीं होने की बात कहकर जिले के लोगों को टरकाया जा रहा है। सरकार बदलने के बाद सबसे पहले पंचायतों के निर्माण कार्यों के इस्टीमेट बनवाने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद काम की मंजूरी के लिए सरपंचों को दर-दर भटकना पड़ रहा है। सरपंच सिर्फ प्रधानमंत्री आवास की प्रगति की मॉनिटरिंग करते रह गए हैं। इस स्थिति से सरपंचों में खासी नाराजगी देखी जा रही है, खासकर भाजपा समर्थित सरपंच ज्यादा खार खाए बैठे हैं। इसका असर हालिया बस्तर पंडुम आयोजन पर दिखा, जहां पंजीयन और भीड़ जुटाने में ज्यादातर सरपंचो ने सहयोग करने से मना कर दिया। सचिवों और अन्य सरकारी कर्मचारियों ने किसी तरह स्थिति को संभाला।
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तेंदुआ पर सवाल!!
दक्षिण बस्तर के बारसूर इलाके में सड़क पर तेंदुआ दिखने का वीडियो वायरल हो रहा है। एक स्थानीय व्यवसायी ने घने जंगल वाले रास्ते में कार के भीतर से इसका वीडियो बना लिया था। घनघोर जंगल वाले इस इलाके में तेंदुआ दिखना कोई नई बात नहीं है। लेकिन वन विभाग के ही आला अफसर ने इस पर अविश्वास जताते अपने विभाग की जग-हंसाईं करवा ली है। अब तेंदुआ हो, या बाघ, वन विभाग से पूछकर तो बारसूर नहीं आएगा। दरअसल, एसी रूम में बैठने के आदी हो चुके बड़े अफसर सिर्फ वन्य जीवों के बनावटी फुट-प्रिंट और कुछ पारंपरिक तकनीकों पर ही भरोसा कर आंकड़े तैयार करते रहे हैं, जिस पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाए जाते हैं।

