साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग-118
11 जनवरी 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
चर्चा करें का मतलब!!
दक्षिण बस्तर में अक्सर टाल-मटोल वाले मामलों में फाइलों पर एक खास प्रशासनिक शब्दावली प्रयोग की जाती है। अगर बड़े साहब ने फ़ाइल पर ‘चर्चा करें’, लिख कर चिड़िया बिठा दिया तो समझ लें कि यह काम ठंडे बस्ते में डालना है। एक साहब ने तो ट्रांसफर पर जाने के अंतिम दिन एक फ़ाइल को ओके करने की जगह ‘चर्चा करें’ लिखकर पैकअप कर दिया। अब संबंधित विभाग के अफसर यह सोच-सोच कर सिर खुजाते रह गए कि चर्चा जाते हुए अफसर से करना है, या फिर नए आने वाले अफसर से। वैसे, कका कालीन महोदय के समय “चर्चा करें” का सीधा मतलब “खर्चा करें” होता था। जिन फाइलों पर ‘आवक-जावक’ नहीं दिखता या उसे अटकाना होता तो ‘महोदय’ उन फाइलों पर “चर्चा करें” वाला चिड़िया बिठा दिया करते थे। फ्री-फंड काम करवाने वालों की फ़ाइल चर्चा के इंतजार में त्रिशंकु बनकर लटकने लगती थी। खैर, अब सरकार बदली, तो निजाम बदले गए हैं। उम्मीद है कि अब बगैर लाग-लपेट के फाइलों के साथ न्याय होगा।
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‘माननीयों’ का मान दांव पर
बस्तर संभाग के कई विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां विधायकों की न तो कलेक्टर सुनते हैं, न ही सरकार। विपक्ष के विधायकों की तो छोड़िए, सत्ता पक्ष के विधायक की सुनवाई भी नहीं होती। कई जगह विधायक जनहित से जुड़े विकास कार्यों की घोषणा तो कर आते हैं, लेकिन कलेक्टर से राशि का एएस यानी प्रशासकीय स्वीकृति करवाने में माननीयों के पसीने छूट जाते हैं। फील्ड में इमेज अलग खराब होती है। दरअसल, विधायक निधि हो या डीएमएफ जैसा मद, जब तक प्रशासकीय स्वीकृति न मिले, माननीय की घोषणा का कोई अर्थ नहीं रह जाता। पिछली सरकार में कका के निर्देश पर टीएस बाबा के समर्थक कांग्रेसी विधायकों को ऐसे ही निपटाया जाता था। विधायक घोषणा के बावजूद एक हैंडपंप तक नहीं खुदवा पाते थे। ऐसे में जनता के सामने ‘माननीय’ का मान ही नहीं बच पाता है। फाइलों को अटकाने की यह कुप्रथा नई सरकार में भी जारी है।
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आखिर कब बनेगा पुल??
बायपास मार्ग का पुल ध्वस्त होने के बाद वैकल्पिक नए बायपास-2 मार्ग के जल्द शुरू होने का इंतजार दंतेवाड़ा के लोग कर रहे हैं, लेकिन यहां डंकनी नदी पर पुल निर्माण की कछुआ चाल से ऐसा जल्द सम्भव होता नहीं दिख रहा है। बगैर पुल निर्माण के बायपास-2 पर आवागमन शुरू होना नामुमकिन है। मानसून आगमन से पहले पुल नहीं बना, तो कम से कम डेढ़ साल बाद ही इस पुल का काम पूरा हो सकेगा। यह बात सरकार से लेकर जनप्रतिनिधियों तक को मालूम है, लेकिन पुल निर्माण करने वाले ब्रिज डिवीजन की खोज-खबर लेने में किसी की ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिख रही है। सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि विपक्ष को भी जन सरोकार से जुड़े इस मुद्दे से कोई खास लेना-देना नहीं है। भले ही शहर के भीतर की सड़क भारी वाहनों से दबकर तहस-नहस हो जाए और आम लोग धूल स्नान करते रहें।
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बाघ कॉरीडोर निशाने पर..
एक तरफ केंद्र व राज्य सरकार बाघ बचाने के नाम पर प्रोजेक्ट टाइगर और टाइगर रिज़र्व जैसे उपक्रम करती रहती है, वहीं दूसरी तरफ बाघों के स्वच्छंद विहार और जैव विविधता के लिए मशहूर बैलाडीला पर्वत श्रृंखला के जंगलों को खनन के लिए लीज पर बेचा जा रहा है। इससे न तो जंगल का राजा बचेगा, न ही यहां रियासतकाल में बना हुआ राजा बंगला बाकी रहेगा। इसके विरोध में जाग उठे ग्रामीण आदिवासियों ने अब विरोध-प्रदर्शन की राह पकड़ ली है। इसके पहले बैलाडीला श्रृंखला के नंदराज पर्वत और पिटोर मेटा को लेकर विरोध हो चुका है। जितने एरिया में एनएमडीसी पहले से खनन कर रही है, उसमें अब भी मौजूद भंडार को प्रसंस्कृत स्वरूप में दोहन कर बेचा जाए, तो सरकार को ज्यादा फायदा है, लेकिन सरकार सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को ही हलाल करना चाहती है।
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बीजापुर या बदलापुर?
बीजापुर जिले में बीते कुछ दिनों से विपक्षी दल कांग्रेस को बैठे-बिठाए बड़े-बड़े मुद्दे मिल गए। बीजापुर को बदलापुर बनाने का आरोप लगाने का मौका कांग्रेस को मिला है। इनमें से दो मामले तो सीधे तौर पर भाजपा बनाम कांग्रेस वाले निकले, जिनमें भाजपाईयों द्वारा 2 युवकों को अंदर करवाने और एक में महिला के घर घुसकर सामान बाहर फिंकवाने, महिला को घर के भीतर ताला लगाकर बंद करने का आरोप लगा है। गिरफ्तार किए गए 2 युवकों की अंततः रिहाई हो गई, लेकिन ऐसे मामलों से सत्तापक्ष की हो रही बदनामी को लेकर जल्द ही संज्ञान नहीं लिया गया तो आने वाले समय मे पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। वैसे भी बीते 2 चुनावों में यह विधानसभा सीट कांग्रेस की झोली में जा चुका है।
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बारसूर महोत्सव का मसला
पिछली रमन सरकार के समय शुरू हुए बारसूर महोत्सव का दोबारा नाम लेने को कोई तैयार नहीं दिख रहा है। 3 साल तक आयोजन के बाद ही इस कांसेप्ट की अकालमृत्यु हो गई थी। पहले सूखा पड़ने और फंड की कमी को वजह बताया गया, फिर सरकार बदली और कोविड महामारी का बहाना सामने आया। हालात सामान्य हुए भी तो बारसूर महोत्सव को पुनर्जीवित नहीं किया गया। इस बीच सिरपुर महोत्सव, चक्रधर समारोह, चित्रकोट महोत्सव जैसे आयोजन लगातार होते रहे। हाल में दंतेवाड़ा प्रवास पर आए सीएम साय ने बारसूर महोत्सव आयोजन पर हामी तो भरी, लेकिन मकर संक्रांति करीब पहुंचने पर भी कोई सुगबुगाहट होती नहीं दिख रही है।
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हटाए गए डीएमसी
बीजापुर जिले में पोटाकेबिनों में अव्यवस्था के मामलों के बाद वहां पदस्थ डीएमसी यानी जिला मिशन समन्वयक को हटाए जाने की खबर है। वैसे भी राजीव गांधी शिक्षा मिशन से सर्व शिक्षा अभियान तक के सफर में अब शिक्षण व्यवस्था सुधारने के लिए पहले जैसा न तो फंड आ रहा है, न ही वो जमाना बाकी रह गया है। अविभाजित दंतेवाड़ा और हरे राम के जमाने में केंद्र से फंडिंग की कोई कमी नहीं रहती थी। तब व्हाट्सप्प और ऑनलाइन समीक्षा का झंझट भी नहीं होता था। अब सिर्फ मिनट टू मिनट समीक्षा और वीसी के तनाव के सिवाय कुछ नहीं बचा है। यही वजह है कि ज्यादातर डीएमसी, बीआरसी, सीआरसी बेमन से काम कर रहे हैं।

