आसमान से गिरे, खजूर पे अटके.. (शब्द बाण -117)

आसमान से गिरे, खजूर पे अटके.. (शब्द बाण -117)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द-बाण’ भाग- 117
5 जनवरी 2026

शैलेन्द्र ठाकुर @ दंतेवाड़ा

दाल में काला, या पूरी दाल काली..

नए वर्ष की शुरुआत में ही दंतेवाड़ा में 2 घटनाएं चर्चित हो गई हैं। एक राइस मिल में लगी आग से लाखों बारदाने व फोर्टिफाइड राइस का जलकर खाक होना और दूसरी घटना में नागरिक आपूर्ति वाले कई टन चावल का सड़ना। यहां दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली लगती है। इन मामलों में विभागीय अफसरों की भूमिका की पड़ताल करने की जरूरत तो है, लेकिन कई साल से जमे अफसरों पर कोई आंच भी आएगी, ऐसा नहीं लगता है। सुरक्षा मानकों की जांच में हीला-हवाला करने वाले अफसरों को पहले भी अभयदान मिलता रहा है। इस चक्कर में जनता के खून पसीने की कमाई के पैसे से लिए जाने वाले टैक्स की कोई कीमत नहीं रह गई है।

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दूसरे पंडुम तक क्लीन स्वीप
राज्य सरकार ने बस्तर पंडुम लोकोत्सव का आयोजन की शुरुआत पिछले साल की थी। इसे नक्सलवाद के खिलाफ जंग में सांस्कृतिक जागरण बताया गया और इसी मंच से केंद्रीय गृहमंत्री ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे का संकल्प दोहराया था। साल बीतते-बीतते सचमुच फ़ोर्स की समन्वित कार्रवाई ने नक्सल संगठन की कमर तोड़ दी। कई टॉप नक्सल लीडर मारे गए और कई बड़े कैडर ने हथियारों के साथ सरेंडर कर दिया। एक साल के भीतर यानी दूसरे पंडुम तक क्लीन स्वीप होता दिख रहा है। अभी भी सरकार के पास डेडलाइन के लगभग 3 माह बचे हुए हैं। कुछ बंदूक धारी अब भी जंगल में हैं और बिना बंदूक वाले शहरों में। देखना यह है कि इनसे निपटने सरकार तीसरे पंडुम तक की क्या कार्ययोजना बनाती है।
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बगैर सौगात दिए लौटे सीएम

नए साल के दूसरे दिन मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने दंतेवाड़ा आकर माई दंतेश्वरी के दर्शन किए तो लोगों की उम्मीद जागी कि कोई बड़ी घोषणा कर जाएंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मंच से बगैर कोई नव वर्ष की सौगात दिए प्रदेश के मुखिया लौट गए। करोड़ों के डीएमएफ फंड वाले जिले में विकास कार्यों को तरस रही ग्राम पंचायतों का सवाल अनुत्तरित रह गया। नक्सलवाद की समाप्ति के बाद विकास की गंगा बहने की बात तो उन्होंने कही, लेकिन विकास कैसे आएगा, ये स्पष्ट नहीं हुआ। वास्तव में विकास नहीं होने को लेकर सरकारें और नक्सलवाद के पैरोकार एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ते आ रहे थे। धुर नक्सल प्रभावित अंदरूनी इलाकों में सरकारी तंत्र कागजों में ही विकास करता आ रहा था और मैदानी हकीकत देखने वाला कोई नहीं था। इन 6 दशकों में अरबों-खरबों रूपये पानी की तरह बहाये गए। अब जबकि नक्सलवाद के उन्मूलन की ओर सरकार अग्रसर है, तो इन इलाकों में फंड की कमी से विकास नहीं हो पाना दुर्भाग्यजनक बात होगी।
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उधार का आयोजन

पिछले वर्ष बस्तर पंडुम का संभाग स्तरीय आयोजन दंतेवाड़ा में जुगाड़ व उधार में निपटा था। इसके लिए विधिवत फंडिंग नहीं हुई। भारी भरकम रकम खर्च हुई थी, जिसका कुछ हिस्सा संस्कृति विभाग ने वहन किया, तो बाकी हिस्सा अन्य विभागों के जिम्मे आ गया।
‘कहीं का रोड़ा, कहीं का पत्थर’ की तर्ज पर नोडल अफसरों ने जुगाड़ से आयोजन निपटाया। इसका कर्ज ठीक से उतरा भी नहीं था, सम्बंधित अफसर उधार का रोना रोते थकते नहीं हैं, और फिर से अगले बस्तर पंडुम आयोजन की तैयारी शुरू करने का दबाव आ गया है। इस बार इस मेगा इवेंट का खर्च कैसे मैनेज होगा, यह बड़ा सवाल है।

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आसमान से गिरे, खजूर पे अटके..

दक्षिण बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर को पर्यटन विकास के नाम पर अब तक उपेक्षा और छलावा ही मिला है। दशक भर पहले शुरू हुआ बारसूर महोत्सव 3 एपिसोड के बाद टेलीविजन धारावाहिक की तरफ ऑफ एयर हो गया। राज्य सरकार सिरपुर महोत्सव या चक्रधर समारोह जितना महत्व बारसूर महोत्सव को भी देती तो इसका भाग्य कब का बदल चुका होता। यहां होने वाले विकास कार्यों में स्थानीय जरूरत और राय को तवज्जो नहीं दी जाती है, जो बाद में फेल हो जाती है। हाल ही में बारसूर में साहसिक खेलों को बढ़ावा देने के नाम पर जिप लाइन तैयार करवाया गया है, जिसमें एक तरफ बने ऊँचे टावर से पानी के ऊपर केबल पर लटकते हुए तालाब के दूसरे छोर पर उतरने का रोमांच महसूस करने की सुविधा है। इसमें जिस जगह लैंडिंग होनी है, वह एक प्राचीन मंदिर का आंगन है, जिसमें महिलाओं के प्रवेश की सख्त मनाही वाला बोर्ड पहले से लगा हुआ है। यानी इस ज़िप लाइन का उपयोग करना महिलाओं के लिए आसान नहीं होगा। आसमान से गिरे, खजूर पे अटके टाइप यह मामला है। वैसे भी, जिप लाइन के लिए तालाब के जिस हिस्से का चयन किया गया है, उस हिस्से में सिर्फ मानसून काल और उसके एक दो महीने बाद तक ही पानी रह पाता है। मार्च महीने से फ़िल्म स्टार अजय देवगन के फेमस डायलॉग
मेरी कश्ती वहां डूबी, जहां पानी कम था” वाली स्थिति दिखेगी।

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जन सुनवाई में न्योता भोज
बैलाडीला क्षेत्र में लौह अयस्क का दोहन करने बहुराष्ट्रीय कंपनी एस्सार (अब आर्सेलर मित्तल निप्पोन स्टील) ने बैलाडीला से पाइप लाइन बिछाई। अब कंपनी पड़ोसी राज्य में स्टील प्लांट लगाने के मकसद से बैलाडीला में प्लांट की क्षमता विस्तार की कोशिश में जुट गई है। पर्यावरणीय अनापत्ति के लिए जन सुनवाई का आयोजन बड़े विरोध के बीच हुआ। इसमें जनता को रिझाने के लिए खास व्यंजन वाले भोजन पैकेट भी बांटे गए। अब तक क्षेत्रवासियों को बचा हुआ लाल डस्ट यानी धूल सड़कों पर खिलाते आ रही कंपनी द्वारा मिठाई और कबाब खिलाना आश्चर्यजनक रहा। यह ठीक वैसा ही है जैसे – कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, बाद गंगा जल पिलाने का क्या फायदा?
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बैलाडीला बचाने का अभियान

देर से ही सही, पर दक्षिण बस्तर में बैलाडीला पहाड़ को बचाने को लेकर विपक्षी दल एकजुट होते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के साथ ही सीपीआई, आम आदमी पार्टी, जोगी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं व पदाधिकारियों ने भी इस मसले पर कदम से कदम मिलाकर चलने का ऐलान किया है। 60 के दशक से यहां लौह अयस्क खनन कर रही एनएमडीसी की प्रचलित खदानों को लेकर पहले कोई विरोध नहीं दिखा था। अब ज्यादा डिपोजिट शुरू करने और निजी कम्पनियों को लीज पर खदानें देने को लेकर विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। देश की अरावली पर्वत श्रेणी को जलवायु परिवर्तन का कारक मानते हुए इसके खनन पर मचे बवाल के बाद बैलाडीला पर्वत श्रृंखला को भी लोगों ने संजीदगी से लेना शुरू किया है। निचले पठारी हिस्से में होने की वजह से बैलाडीला के पहाड़ ही मानसूनी बादलों को रोककर क्षेत्र में बारिश करवाते रहे हैं। ऐसे में बैलाडीला पर्वत के अस्तित्व की चिंता लाजिमी है। अब देखना यह है कि यह एकजुटता कितनी स्थाई रहती है।

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एक और कलेक्टर की विदाई!
बदलावों के दौर से गुजर रहे बस्तर संभाग के सबसे बड़े जिले बस्तर में फिर नए कलेक्टर की पोस्टिंग होने वाली है। यहां पदस्थ वर्तमान कलेक्टर के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने का रास्ता साफ हो गया है। अब सरकार इस सबसे महत्वपूर्ण जिले का नया कप्तान किसे बनाती है, यह तो वक्त ही बताएगा, पर लोग मजाक में कहने लगे हैं कि हाल के दिनों में जिस तरह से नाम के अंग्रेजी अल्फाबेट के हिसाब से पोस्टिंग हुई है, उससे तो लगता है कि किसी जे या बी अक्षर वाले अफसर की पोस्टिंग यहां हो सकती है। ऐसा हुआ तो पड़ोस के जिले से ही एक अफसर यहां शिफ्ट किए जा सकते हैं।
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चलते-चलते…

दंतेवाड़ा में लम्बे समय से पदस्थ रहकर एसपी से डीआईजी के तौर पर सेवाएं दे रहे बस्तर माटीपुत्र अफसर कमलोचन कश्यप पुराने साल के अंतिम दिन 31 दिसंबर को रिटायर हो गए। नक्सलवाद की जड़ों पर मट्ठा डालने और तब हर मोर्चे पर मात खा रही फ़ोर्स को चलना सिखाने वाले इस बहादुर अफसर को भले ही वो नाम व शोहरत नहीं मिली, जिसके वो हकदार हैं, लेकिन नक्सल मोर्चे पर मिल रही सफलता की नींव के पत्थर के तौर पर उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

  • ✍🏻 शैलेन्द्र ठाकुर की कलम से

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