साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण (भाग- 111)
23 नवम्बर 2025
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
भाजपा को त्रिफला की जरूरत
कम से कम 3 धड़ों में बंट चुकी बस्तर भाजपा में रस्साकशी का दौर जारी है। सभी धड़े आपस मे एक दूसरे को निपटाने में लगे रहते हैं। यही वजह है कि गाहे ब गाहे शक्ति प्रदर्शन चलता रहता है। आयुर्वेद की भाषा मे कहें तो स्वस्थ रहने के लिए वात, पित्त और कफ तीन प्रवृत्तियों का संतुलन होना जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ, तो त्रिदोष की स्थिति बन जाती है, जिसके निवारण के लिए हरड़, बेहड़ा व आंवला से बने त्रिफला चूर्ण का सेवन किया जाता है। जब तक डॉक्टर रमन के हाथ मे सत्ता थी, तब तक उन्होंने त्रिदोष का संतुलन बनाकर रखा था। अब उनके विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद स्थिति थोड़ी अलग हो गई है। पार्टी गतिविधियों पर उनका सीधा नियंत्रण नहीं रहा। अब उनकी तरह पार्टी का आयुर्वेदिक उपचार कर त्रिदोष का शमन विष्णुदेव कर पाएंगे, इसमें संशय है। जल्द ही इसका उपचार नहीं हुआ, तो इसका असर आने वाले चुनाव के परिणाम पर भी पड़ सकता है।
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कुत्ता भगाएं या अज्ञान का अंधकार ?
इन दिनों छत्तीसगढ़ के शिक्षा जगत में डीपीई यानी स्कूल शिक्षा विभाग के संचालनालय का एक वायरल पत्र खूब चर्चा में है, जिसमें स्कूलों के संस्था प्रमुख शिक्षकों को आवारा कुत्तों की निगरानी और उनकी सूचना देने हेतु नोडल बनाने का जिक्र है। शिक्षकों की पीड़ा यह है कि जनगणना, चुनाव, मतदाता सूची, एसआईआर, कोरोना नियंत्रण से लेकर तमाम कार्यों में ड्यूटी करवाने के बाद अब गुरुजी से यही काम करवाना बाकी रह गया था। अब गुरुजी कुकुर को भगाए या अज्ञानता का अंधकार मिटाए?
वैसे, देखा जाए तो स्कूलों के आस-पास मंडराते आवारा कुत्तों से बच्चों को खतरा तो रहता ही है, इसे देखकर सिर्फ सूचित करने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन पत्र में प्रयुक्त शब्दावली ही ऐसी है कि शिक्षक जगत में खासी नाराजगी छा गई है। दरअसल, बड़े पदों पर बैठे लोग यह नहीं देखते कि उनकी चिट्ठी तैयार करने वाले को लिखने का शऊर है भी या नहीं। किसी ने कहा भी है कि
“बातन हाथी पाइये, बातन हाथी पांव।”
यानी बात करने के तरीके से आप हाथी की सवारी भी कर सकते हैं, या हाथी के पांव के नीचे कुचले भी जा सकते हैं।
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ट्रांसफॉर्मर कलेक्टर नहीं, हम लगाते हैं!
दक्षिण बस्तर में बिजली विभाग के एक आला अफसर ने उपभोक्ता को जो हाई वोल्टेज जवाब दिया, वो चर्चा का विषय बन गया है। दरअसल, 6 माह से 3 फेस कनेक्शन के लिए चक्कर काट रहे एक उपभोक्ता ने कलेक्टर से गुहार लगाई। इसके बाद एक शुभचिंतक ने बिजली साहब को कॉल कर प्रकरण की स्थिति जानने की कोशिश की। साहब ने कहा कि मामले का निराकरण इसी सप्ताह हो जाएगा। इसके बाद जैसे ही बताया गया कि इस बारे में कलेक्टर महोदय को भी आवेदन दिया गया है। इतना सुनते ही साहब ने तमककर कहा कि ट्रांसफार्मर कलेक्टर नहीं, हम लगाते हैं। अगर ऐसी बात है तो मामला और लंबा खिंचेगा। शुभचिंतक ने कहा कि साहब, अभी तो आपने एक सप्ताह में होने की बात कही। इस पर साहब ने कहा कि वो तो सिर्फ सेंक्शन होने का टाइम बताया है। उसके बाद आगे के काम में समय तो लगता ही है।
कुल मिलाकर मामले का लब्बोलुआब यह है कि डबल इंजन सरकार में अधिकारी भी हाई वोल्टेज से चार्ज होकर काम कर रहे हैं। उस पर भी विभाग अगर बिजली वाला ही हो तो क्या कहना!
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हाफ बिजली का मसला
भूपेश सरकार ने बिजली बिल हाफ योजना शुरू की थी। भले ही वोल्टेज पूरा नहीं मिलता था, पर बिजली बिल हाफ आता था। कालांतर में सरकार बदली और डबल इंजन सरकार को ज्यादा करंट की आवश्यकता पड़ी तो यह योजना बंद हो गई। स्मार्ट मीटर वाले बिजली बिल से घबराए उपभोक्ताओं और विपक्षी कांग्रेस ने शोर मचाया, तो सरकार ने मजबूरन 200 यूनिट तक का बिजली बिल हाफ करने का ऐलान तो किया है, लेकिन प्राइवेट फाइनेंस कंपनियों की तरह “*नियम व शर्तें लागू” वाले कंडीशन के साथ। इसके नियम-कायदे समझना उतना ही कठिन है, जितना कठिन क्रिकेट मैच में बारिश होने पर लागू “डकवर्थ लुईस नियम” को समझना। खैर, अब इस नए 200 यूनिट हाफ बिजली योजना का प्रचार सत्ता पक्ष भाजपा के लोग कर तो रहे हैं, पर यह गणित खुद उनके ही पल्ले नहीं पड़ रहा है।
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हिड़मा बना फैंटम
कॉमिक किरदार फैंटम की तरह रहस्यमय बन चुके टॉप नक्सली लीडर हिड़मा का आखिरकार अंत हो गया। मौत के तरीके को लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया व सोशल मीडिया में तरह-तरह की चर्चा है। कई बड़ी-बड़ी वारदातों में संलिप्त दुर्दांत नक्सली के समर्थन व विरोध को लेकर सोशल मीडिया दो धड़े में बंट गया है। लेकिन उसकी मौत हो गई यह भी एक सच है। 6 दशक से ज्यादा समय से सरकार सशस्त्र नक्सलवाद से जितना परेशान रही है, उससे कहीं ज्यादा वैचारिक चुनौती सोशल मीडिया के दौर में मिल रही है। अब सरकार इससे कैसे निपटती है, यह तो भविष्य ही बताएगा। छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने रबर स्टैम्प बन चुके गृहमंत्री के पद को न सिर्फ इस छवि से बाहर निकाला, बल्कि आक्रामक नेतृत्व करते हुए 31 मार्च 26 की डेडलाइन वाले मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। कई टॉप लीडर या तो मारे जा चुके हैं या सरेंडर कर चुके हैं। कुछ बचे हुए लोगों की तलाश जारी है। अब देखना यह है कि विजय और अमित की जोड़ी का विजय अभियान तय समय सीमा में पूरा होता है या नहीं।
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काला कौवा काट खायेगा..
संभाग मुख्यालय जगदलपुर में बस्तर हाई स्कूल की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित शताब्दी समारोह की धूम मची रही। स्थापना के बाद से कई पीढियां गढ़ चुके इस सबसे पुराने व विशाल हाईस्कूल में पुराने छात्र पहुंचे और अपनी स्मृतियां ताजा की। अंतिम शाम आयोजित संगीतमय आर्केस्ट्रा में बालों में उम्र की सफेदी ला चुके कई बुजुर्ग छात्र भी सच बोल.. काला कौवा काट खायेगा.. जैसे गानों पर थिरकने से खुद को नहीं रोक पाए। उद्घाटन समारोह में पहुंचे सीएम ने तो विद्यालय के विकास पर डेढ़ करोड़ रुपए खर्चने का ऐलान भी कर दिया है, लेकिन उपेक्षित विद्यालय का खेल मैदान और अन्य जमीन छिनने के बाद इसका वजूद कैसे बाकी रहेगा, यह सवाल अनुत्तरित ही रह गया है। अब तो सच नहीं बोलने पर काटने वाला काला कौआ भी खुद अपना अस्तित्व बचाने संघर्षरत है।
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धरोहर पर ठेके की परत
दक्षिण बस्तर की ऐतिहासिक, पुरातात्विक महत्व की नगरी बारसूर की पहचान बत्तीसा मंदिर पर पुरातत्व विभाग ने ठेकेदारी का मुलम्मा चढ़ाकर इस प्राचीन धरोहर को निपटाने की शुरुआत कर दी है। व्यवहारिक अनुभव से शून्य विभागीय इंजीनियर ने अफसरों के साथ मिलकर इस प्राचीन मंदिर को आधुनिक बिल्डिंग की तरह मरम्मत करवा दिया है। सीपेज रोकने के नाम पर छत पर कांक्रीट की 4 इंच मोटी परत ढलवा दी। जबकि नियमानुसार पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षण, मरम्मत और पुनर्निर्माण उसी समकालीन प्राचीन तकनीक से ही किया जाता है। सिर्फ ठेकेदारी की गरज से कांक्रीट से किया गया यह कार्य इस धरोहर को खतरे में डालने के लिए काफी है। पुरातत्व विभाग की इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद जनप्रतिनिधि और विभागीय मंत्री मौन हैं।
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बेहतरीन सर 🙏🏼🙏🏼🙏🏼