फ्लावर नहीं, फायर हूँ मैं.. (शब्द बाण – 160)

फ्लावर नहीं, फायर हूँ मैं.. (शब्द बाण – 160)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 160
1 नवंबर 2026
शैलेन्द्र ठाकुर @ दंतेवाड़ा

फ्लावर नहीं, फायर है मैं..
इस बार एनएमडीसी के अफसर और अन्य लोग दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी का रौद्र रूप देखकर अवाक रह गए। जन भावनाओं को ताक पर रखकर सड़क पर बलपूर्वक गेट लगा रहे एनएमडीसी के खिलाफ विधायक का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने यहां तक कह दिया – ” आखिरी बार चेतावनी दे रहा हूँ। यहां का विधायक मैं हूँ, मेरी मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिल सकता। ” सहजता, सरलता और सादगी के लिए जाने पहचाने जाने वाले विधायक का दुर्वासा ऋषि की तरह क्रोधित होना कहीं एनएमडीसी को भारी न पड़ जाए। भर्ती में स्थानीय लोगों की उपेक्षा, विकास कार्यों में प्रॉपर चैनल काम करने की बजाय खुद ठेकेदारी करने के आरोप एनएमडीसी अफसरों पर लगते रहे हैं। 6 दशक से ज्यादा समय से एनएमडीसी यहां लौह अयस्क खनन कर रही है, लेकिन परियोजना के आस – पास के गांवों में विकास के मामले में दीया तले अंधेरा जैसी स्थिति है। ऐसे में विधायक का क्रोधित होना जायज ही है। अब पुष्पा की तरह फ्लॉवर समझते आ रहे एनएमडीसी को पता चल गया कि पुष्पा फ्लावर नहीं, फायर है ..। आगे ऐसी मनमानी नहीं चलेगी। वैसे, कुछ दिन पहले बस्तर सांसद महोदय भी स्थानीय भर्ती के मुद्दे पर गरज कर चले गए थे, लेकिन उनका गुस्सा चक्रवाती तूफान अर्नब की तरह कमजोर पड़ गया।
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वन विभाग की लाठी..
आपने अंधे की लाठी.., बुढ़ापे की लाठी और पुलिस की लाठी जैसे शब्द कई बार सुना होगा, लेकिन इस बार वन विभाग की लाठी काफी चर्चा में है। वजह यह है कि विभाग के एक वन मंडल में 46 लाख रुपये से 160 लाठियां खरीदने की प्रक्रिया की बात सामने आई है। अब इस हाईटेक लाठी का इस्तेमाल किस तरह होगा, यह तो विभाग ही बता सकता है, पर वन कर्मियों के पास पुलिस की तरह समय पड़ने पर लाठी चार्ज का अधिकार तो नहीं है, कम से कम चार्जिंग वाली लाठी खरीदकर ही यह शौक तो पूरा कर ही सकते हैं। इसके पहले वन कर्मियों को बंदूक दिलाने का प्रयोग विभाग में फेल हो ही चुका है । ऐसी स्थिति दक्षिण बस्तर स्थित आईटीआर यानि इंद्रावती टाइगर रिजर्व की भी है। अंधा पीसे कुत्ता खाए वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए दशकों से करोड़ों रुपए वन विभाग यहां फूंकता आ रहा है, जिसका कोई हिसाब लेने वाला पहले नहीं था। भले ही टाइगर यानि बाघ शिकारियों के भय से छिपते फिर रहे हों, पर खर्च काफी होता रहा है। नक्सलियों की मांद में काम होना बता दिया जाता था, इसका भौतिक सत्यापन या सोशल ऑडिट होना संभव नहीं होता था। लेकिन नक्सलवाद के खात्मे के बाद से धीरे – धीरे इन कारनामों की कलई खुलती जा रही है।

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बाली का बल वाले अफसर

किसी समय दंतेवाड़ा में पदस्थ रहे महोदय खुद को रामायणकाल वाला बाली बताते नहीं थकते थे। बाली की खासियत थी कि वो सामने वाले प्रतिद्वंद्वी का आधा बल ऑटोमेटिक खींच लिया करता था और प्रतिद्वंदी कमजोर हो जाता था। कालांतर में राजस्व विभाग का सुप्रीमो बन चुके महोदय ने अब यही फॉर्मूला पटवारियों की हड़ताल पर लागू कर दिया । सरकार ने हड़ताली पटवारी संघ के प्रदेशाध्यक्ष को ही सस्पेंड कर उनका बल आधा कर दिया है। अब पटवारी छटपटा रहे हैं कि बाली से अपने सुग्रीव को बचाने श्रीराम यानी विष्णुदेव की शरण में जाएं या फिर आधे बल के साथ ही सीधी लड़ाई लड़ें?
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कौन बनेगा अगला डीईओ?
बस्तर जिले में जल्द ही शिक्षा विभाग के डीईओ का पद वर्तमान डीईओ के रिटायरमेंट की वजह से खाली होने वाला है, जिसके लिए कुर्सी दौड़ अभी से शुरू हो गई है। केबीसी यानि कौन बनेगा करोड़पति गेम की होड़ लगती दिख रही है। संभावित दावेदार अपने – अपने एप्रोच के बल पर जोड़ – तोड़ में जुट गए हैं। बस्तर संभाग के इस सबसे महत्वपूर्ण जिले में डीईओ का पद न सिर्फ़ प्रतिष्ठापूर्ण, बल्कि काफी मलाईदार समझा जाता है। ऐसे में सत्ता पक्ष के विभिन्न राजनीतिक ध्रुवों को साधने और संतुलन बनाने वाला ही इस कुर्सी दौड़ का विजेता बन पाएगा, यह बात तय है।
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नेताजी फड़ पर, गार्ड ड्यूटी पर

इस बार दीवाली में नेताजी फड़ पर, गार्ड पहरे पर वाली स्थिति दिख सकती है, पर अगली बार इसकी संभावना कम रहेगी। कारण यह है कि सरकार ने नेताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को दी गई सुरक्षा में कटौती करने का ऐलान किया है। नक्सलवाद खत्म होने की घोषणा के बाद सरकार पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है कि आखिर नक्सलवाद खत्म हो गया तो भारी सुरक्षा का क्या औचित्य? सरकार अपने ही दांव पर फंसती दिखी तो पक्ष – विपक्ष के नेताओं की सुरक्षा की समीक्षा कर सुरक्षा को वन स्टेप डाउन कर दिया। कहा जा रहा है कि अगले 6 माह बाद फिर समीक्षा होगी। अगर ऐसा हुआ तो भले ही इस बार दीवाली पर कुछ नेताओं के पास गार्ड्स रह जाएं, पर अगली दीवाली तक कुछ छोटे नेताओं की सुरक्षा पूरी तरह हट सकती है। पिछली बार दक्षिण पश्चिम बस्तर के एक जिले में कुछ नेताओं पर गार्ड्स की निगहबानी में जुए के फड़ पर बैठने के आरोप लगे थे। गार्ड्स भी धर्मसंकट में रहते हैं कि लॉ एंड ऑर्डर के नियम का पालन करें, या फिर सिर्फ वीआईपी सुरक्षा संबंधी अपने टास्क को पूरा करें।
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आबकारी विभाग के किस्से

दक्षिण बस्तर में आबकारी विभाग में बड़ा गड़बड़ झाला चल रहा है। इतना ही नहीं, विभाग ने शराब बिक्री के 80 लाख रुपए की गड़बड़ी मामले में जेल यात्रा कर लौटे एक आबकारी इंस्पेक्टर को निलंबन से फिर बहाल कर यहीं वापस पदस्थ कर दिया है, जो अर्थव्यवस्था सुधारने में अपना योगदान देने में जुट गये हैं। आबकारी विभाग के प्रदर्शन से न तो मदिरा प्रेमी खुश हैं, न मातहत कर्मचारी। दुकानों से उनके मन – पसंद की ब्रांड गायब है। लोग दूसरे जिलों की तरफ रुख कर रहे हैं या स्वदेशी अपना रहे हैं। उनकी शिकायत है कि अफसरों के लिए पान का मतलब सिर्फ हरे पत्ते से है। जबकि पान खाने के शौकीनों को ही बंगला पान या मीठी पत्ती के स्वाद में फर्क का पता होता है। लेकिन विभाग के डीईओ साहब ऑर्डर पर वही मंगवाते हैं, जो किताबी हिसाब से नियम – कानून में फिट बैठे। ऐसा ही हाल दीगर सुविधाओं का भी है। मदिरा दुकानों से अपार कमाई के बाद भी विभाग दुकान तक एप्रोच रोड नहीं बनवाता है। खुद कमाई करता है, लेकिन सड़क बनवाने की अपेक्षा पीडब्लूडी जैसे निर्माण विभागों से करता है। मदिरा प्रेमी गिरते – पड़ते हुए दुकानों तक पहुंचते हैं और सरकार की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान देते हैं।
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माता के आंगन में तुलसी

इस बार शारदीय नवरात्रि पर राज्य के मुखिया माई के दरबार में माथा टेकने नहीं आए। लोगों को उम्मीद थी कि वे जरूर आएंगे और दक्षिण बस्तर को कुछ सौगातें जरूर देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। वैसे, कार्यकर्ताओं को यह भरोसा है कि सीएम आएं न आएं, पर जल्द ही भाजपा की तुलसी जरूर माता के आंगन में दिखेंगी। “मैं तुलसी तेरे आंगन की” टेली सीरियल फेम इस तेज तर्रार नेत्री को भाजपा ने छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया है, जो अभिनेत्री से नेत्री बनने के बाद इस भूमिका में भी खरी उतर रही हैं।
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प्रोफेसरों की आउटगोइंग ज्यादा

उच्च शिक्षा विभाग ने कॉलेजों में पदस्थ प्रोफेसरों की जो तबादला सूची जारी की है, उसमें दक्षिण बस्तर में असिस्टेंट प्रोफेसरों की इनकमिंग कम और आउटगोइंग ज्यादा है, यानी ट्रांसफर होकर यहां से बाहर जाने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा है। दूसरी तरफ दक्षिण बस्तर में नई पोस्टिंग पर प्रोफेसर नहीं भेजे जा रहे हैं। कुछ साल पहले ऐसे ही एक लिस्ट में अकेले पीजी कॉलेज दंतेवाड़ा से 6 असिस्टेंट प्रोफेसरों की एक साथ विदाई हो गई। किसी हड़बड़ी में प्राचार्य ने बगैर रिलीवर के छुट्टी के दिन ही सभी को यहां से रिलीव कर दिया। उनकी जगह ज्वाइनिंग देने एवजीदार आए ही नहीं। उसके बाद से ही ज्यादातर कक्षाएं अतिथि प्राध्यापकों के भरोसे चल रही हैं।
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