साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण (भाग – 136)
( 17 मई 2026)
शैलेन्द्र ठाकुर @ Dantewada
सटोरियों और जुआरियों की शामत
दक्षिण बस्तर में अचानक ही जुआरियों और सटोरियों की शामत आ गई है। पुलिस ताबड़तोड़ धरपकड़ की कार्रवाई कर रही है। इसके साथ ही शराब की अवैध बिक्री करने वाले कोचियों पर भी गाज गिरी है। दरअसल, अब तक नक्सल विरोधी अभियानों में इंगेज रही पुलिस के पास अब रूटीन क्राइम पर नियंत्रण के लिए ज्यादा वक्त मिलने लगा है। सरल व्यवहार और साफ – सुथरी छवि वाले कप्तान साहब ने सभी थानेदारों को चेता दिया है कि जुआ, सट्टा और नशे के कारोबार का कोई मामला सामने आया तो उनकी खैर नहीं। अब सभी टीआई अपने – अपने इलाके में ‘एरिया डोमिनेशन ‘ में लग गए हैं। कुछ दिल से, तो कुछ कलेजे पे पत्थर रखकर। आखिर, सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को भला सीधे हलाल करना कौन चाहेगा? अतिथि सत्कार से लेकर कई तरह के ‘ऑफ दी रिकॉर्ड ‘ खर्च भी तो उन्हें ही उठाना होता है।
——
भूपेश से कटवाएंगे पुलों का फीता !!
दंतेवाड़ा जिले में बड़े पुल – पुलियों का काम, जिस कछुआ रफ्तार से चल रहा है, उसे देखकर यह नहीं लगता है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में काम पूरा हो पाएगा। तभी तो कांग्रेसी अंदर ही अंदर इस प्रत्याशा में खुश हैं कि फिल्म वाले करन – अर्जुन की तरह कका- बाबा फिर अगली बार सरकार में आयेंगे और भूपेश कका ही इन पुलों का फीता काटकर उद्घाटन करेंगे। ऐसा पहले हो भी चुका है। छिंदनार में इंद्रावती नदी पर पाहुरनार घाट में बने पुल का काम रमन सरकार ने शुरू करवाया था और सरकार बदल गई। फिर काम पूरा करवाकर भूपेश कका ने फीता काटा था। इस बार भी ऐसी स्थिति दिख रही है। बालूद में बायपास-2 मार्ग का पुल समेत कुछ और बड़े प्रोजेक्ट की रफ्तार सुस्त है। वहीं, पिछली बार बाढ़ में बह गए चितालंका बायपास पुल और मांढर नाला पुल की स्थिति तो और भी खराब है। प्रस्तावित नए पुलों का काम शुरू होना तो दूर इनकी प्रशासकीय स्वीकृति तक नहीं मिल सकी है। आम तौर पर बाढ़ एवं अन्य प्राकृतिक आपदा के मामलों में इतनी सुस्ती नहीं दिखाई जाती है। अब देखने वाली बात यह होगी कि इन बड़े प्रोजेक्ट्स का काम इसी सरकार के कार्यकाल में पूरा हो पाता है या फिर अगली सरकार के कार्यकाल में।
——
सरकार की ओवरहॉलिंग और ग्रीसिंग कब ?
विष्णुदेव साय की सरकार को बने हुए ढाई साल से भी ज्यादा वक्त होने को है, लेकिन सरकार ने सिस्टम की ओवरहॉलिंग और ग्रीसिंग – सर्विसिंग का काम अब तक शुरू नहीं किया। फाइलों की रफ्तार इतनी सुस्त है कि अकेले पीडब्ल्यूडी ने ही राज्य में कुल विभागीय बजट का 52 फीसदी हिस्सा लेप्स करवा दिया। बजट में स्वीकृति मिलती है, लेकिन डीपीआर बनवाने और प्रशासकीय स्वीकृति, टेंडर लगवाने में ही इतना ज्यादा वक्त निकल जाता है कि बजट की राशि ही लेप्स हो जाती है।
विष्णुदेव सरकार के अधिकांश विभाग पुराने सेनापति और जंग खाए हथियारों के भरोसे लड़ रहे हैं । कुछ खटराल अफसर सरकार की लुटिया डुबो रहे हैं। गलती से ट्रांसफर हो भी गया तो स्थगन आदेश लाकर वापस बैठ जाते हैं। पता नहीं, सिस्टम का वायरस हटाने और डीबगिंग के लिए विष्णुदेव का सुदर्शन चक्र कब चलेगा ?
——-
नया थाना, नई खुशी
दंतेवाड़ा जिले के टिकनपाल में नया थाना खुला, तो स्टाफ और अन्य लोगों में खुशी की चमक दिखी। खास बात यह है कि इस बार ज्यादातर पुलिसकर्मी खाकी वर्दी में दिखाई पड़ने लगे हैं। वरना, नक्सलवाद की जड़ें गहरी होने के बाद से अंदरूनी ही नहीं, बल्कि कस्बाई क्षेत्रों में भी पुलिस के जवान या तो हमेशा कामाफ्लेज वाले कॉम्बैट ड्रेस पहने दिखते या फिर नक्सली हमले से बचने सादे कपड़ों में दिखाई पड़ते थे। मोटा भाई की डेडलाइन और संकल्प पूर्ण होने के बाद से अब पुलिस के जवान अंदरूनी इलाकों में भी शान से खाकी वर्दी पहन पा रहे हैं। अब चुनौती यह है कि खाकी वर्दी के प्रति जनता के विश्वास को और कितना पुख्ता किया जा सकता है। वैसे, नया थाना खुलने को लेकर एक बात अवश्य है कि पिछली भूपेश सरकार के कार्यकाल में जिले में 5 नए थाने खोलने की घोषणा जरूर हुई थी, पर एक भी नहीं खुल पाया था।
——–
आवारा कुत्तों का फ्रस्ट्रेशन
दंतेवाड़ा नगर के भीतर आवारा कुत्ते अचानक आक्रामक हो उठे हैं। रोज कई लोगों को काटकर अपना फ्रस्ट्रेशन निकाल रहे हैं। दर्जनों लोग हॉस्पिटल जाकर एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने को मजबूर हुए हैं। लोगों की सुविधा को देखते हुए कुछ संवेदनशील कुत्तों ने तो जिला हॉस्पिटल के पास ही लोगों को काटना शुरू कर दिया, ताकि पीड़ित मरीज कम समय में अस्पताल पहुंच सके। लेकिन टेंडर – टेंडर खेलने में जुटी पालिका के कर्ता – धर्ताओं के इतनी संवेदना भी बाकी नहीं रही। इससे उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है। ज्यादा हल्ला मचा तो खानापूर्ति के लिए थोड़ी बहुत धरपकड़ कर दी गई। जबकि पड़ोसी जिला बस्तर में आवारा कुत्तों की नसबंदी का अभियान चर्चा में है, जिसमें अभियान शुरू करने से पहले किए गए कर्मकाण्ड की रील्स काफी वायरल हुई थी। यहां भी रील बाजी के लिए ही सही, पर कुछ तो कदम उठा लिया जाना चाहिए था।
———
बिना पॉवर वाले माननीय !
एक समय था, जब त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के शुरुआती दौर में जिला पंचायत की तूती बोलती थी। विकास योजनाओं के निर्धारण व क्रियान्वयन में महती भूमिका होती थी। तब जिला पंचायत अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा तक मिला हुआ था। जिलों के विकास की भाग्य – दशा तय करने में जिला पंचायत अध्यक्ष की निर्णायक भूमिका होती थी। लेकिन कालांतर में सरकार ने अध्यक्ष पद का वित्तीय अधिकार छीनकर उनके पर कतर दिए। कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी छिन गया।अब न तो चेक पर अध्यक्ष का संयुक्त हस्ताक्षर होता है, न ही किसी बात पर दाल गल पाती है। इस वजह से अफसर भी उनकी नहीं सुनते। वित्तीय अधिकारों के बगैर उनकी स्थिति सिर्फ बिना विभाग वाले राज्य मंत्री की तरह हो गई है, जो सिर्फ नाम के मंत्री होते हैं।
सबसे ज्यादा बुरी स्थिति बस्तर में है, जहां कुछ पदाधिकारियों को मजबूरन मीडिया में आकर अपनी पीड़ा सार्वजनिक करने की नौबत आ चुकी है। पता नहीं, इनके अच्छे दिन फिर से कब लौट आएंगे?
————-
मोटा भाई का बस्तर प्रवास
बस्तर में केंद्रीय गृह मंत्री के प्रवास की तैयारियां जोर – शोर से जारी है। सशस्त्र नक्सलवाद के खात्मे का संकल्प लेकर उसे पूरा करने के बाद उनका यह पहला बस्तर प्रवास कई मायनों में अहम है। नक्सलवाद की विदाई के बाद विकास का रोडमैप कैसे बनेगा, इस पर चर्चा की संभावना है। गुजराती में बड़े भाई को स्नेह पूर्वक मोटा भाई कहने की परंपरा है, सो यहां के गृहमंत्री समेत राज्य के लोग उनकी अगवानी को उत्सुक हैं। लेकिन डीजल – पेट्रोल की किल्लत के बीच आम जनों के साथ ही भाजपाइयों को भी मोटा भाई से मिलने जाने में काफी पापड़ बेलने पड़ सकते हैं। ज्यादातर पेट्रोल पंप वैसे भी ड्राई हो चुके हैं।
———
