बस्तर में हांडा बनाम नक्सली खजाने की दौड़…(शब्द बाण – 131)

बस्तर में हांडा बनाम नक्सली खजाने की दौड़…(शब्द बाण – 131)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग – 131
12 अप्रैल 2026

शैलेन्द्र ठाकुर @ दंतेवाड़ा

बस्तर में हांडा बनाम नक्सली डंप

बस्तर में जमीन पर गड़े धन को हांडा कहा जाता है, जिसकी खुदाई कर मालामाल होने का ख्वाब ज्यादातर लोग देखते हैं। इसी सब्जेक्ट पर हाल ही में बनी छत्तीसगढ़ी मूवी ‘ हंडा ‘ भी काफी पसंद की गई थी। बॉलीवुड की हिट कॉमेडी मूवी धमाल में भी गड़े खजाने के सिग्नल डब्ल्यू की खोज दिखाई गई थी। ठीक ऐसी ही स्थिति अब बस्तर के जंगलों की है, जहां नक्सलियों द्वारा जमीन में गाड़ कर रखे गए नोटों की गड्डियां और सोने के बिस्कुट देखकर लोगों की हसरतें जाग उठी है। फर्क सिर्फ इतना है कि मॉडर्न जमाने में इसे ‘डंप ‘ कहा गया है और इसे मटकी या हंडी की जगह नीले ड्रम में भरकर गाड़ा जाने लगा है। यह वही कुख्यात नीला ड्रम है, जो इन दिनों पतिहंता बेवफा महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो चुका है। खैर, आने वाले दिनों में शहरी लोग बोड़ा- फूटू की जगह डंप यानी हंडा खोजने फावड़ा – कुदाली लेकर जंगल का रास्ता पकड़ते दिख जाएं, तो कोई अचरज वाली बात नहीं होगी।

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नालंदा परिसर को लेकर खींचतान

दंतेवाड़ा जिले को भी राज्य सरकार ने नालंदा परिसर की सौगात दी है और इसका निर्माण जल्द ही शुरू होने वाला है। नालंदा परिसर यानी विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियों के लिए सेंट्रल लाइब्रेरी। लेकिन असल मुद्दा यह नहीं है, बल्कि गीदम के जावंगा में इसका भूमिपूजन होने और निर्माण एजेंसी नगर पालिका दंतेवाड़ा को बनाए जाने को लेकर पालिका में ही अंदरूनी कलह जैसी स्थिति बनती दिख रही है। ज्यादातर पार्षद इस निर्णय से खफा हैं। हालांकि सत्ताधारी पार्टी से जुड़े होने की वजह से अधिकांश पार्षद सार्वजनिक तौर पर कुछ कहने से बचते नजर आ रहे हैं। लेकिन उन्होंने इस ड्रीम प्रोजेक्ट वाले वित्त मंत्री व पूर्व आईएएस ओपी चौधरी तक से इसकी शिकायत कर दी है। कुछ नेताओं ने भी प्रभारी मंत्री से इस विषय पर बात कर असंतोष जताया है। यहां असली विषय दो शक्ति केंद्र गीदम व दंतेवाड़ा के बीच खींचतान का ज्यादा लगता है। अब देखना यह है कि यह खींचतान क्या रंग दिखाती है।
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हॉस्पिटल का लैब
भूपेश सरकार के कार्यकाल में सभी जिला अस्पतालों के लिए करोड़ों खर्च कर हमर लैब का सेटअप डाल दिया गया। चकाचक केबिन, नई और महंगी जांच मशीनों से लैस तो कर दिया गया, लेकिन उदघाटन से पहले सरकार बदल गई। अब इन लैब्स के पास मशीनों में डालने वाले रीएजेंट यानी केमिकल की सप्लाई ठीक से नहीं हो रही है। जिस कंपनी ने ये उपकरण सप्लाई की थी, उसने मशीनों में ऐसा फीड कर रखा है कि कोई दूसरे ब्रांड का रीएजेंट काम ही न करे। अब करोड़ों के रीएजेंट घोटाले में फंसने के बाद कंपनी ब्लैक लिस्टेड हो गई, तो मशीनों को चलाना मुश्किल हो गया है। अब खबर है कि सरकार ने अस्पतालों के लैब संचालन के लिए सरकारी कंपनी एचएलएल लाइव केयर से एमओयू किया है और इससे अस्पतालों में निजी पैथोलॉजी लैब की तरह जांच की सुविधा मिल सकेगी। अगर वास्तव में ऐसा हुआ तो बस्तर संभाग के सभी जिला अस्पतालों, सीएचसी, पीएचसी में मरीजों को राहत मिलेगी, जहां बिना पर्याप्त पैथोलॉजी लैब रिपोर्ट के डॉक्टर अनुमान और लक्षण आधारित इलाज करने को मजबूर हैं।
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बास्तानार घाट की सोलर लाइट
जगदलपुर से दंतेवाड़ा जिले को जोड़ने वाले बास्तानार घाट की सोलर स्ट्रीट लाइट बीते 4 – 5 साल से बंद पड़ी है। इस स्ट्रीट लाइट के मेंटेनेंस का जिम्मा किस विभाग के पास है, इसकी ठीक ठीक जानकारी जिला प्रशासन को भी नहीं है। कभी पीडब्ल्यूडी, तो कभी क्रेडा, तो कभी पंचायत विभाग को जिम्मेदार ठहराकर मामले को टाल दिया जाता है। वजह यह है कि स्ट्रीट लाइट लगाने और कमीशन खाने वाले अफसर यहां से विदा हो चुके। परेशानी इस रास्ते से गुजरने वाले राहगीरों को उठानी पड़ती है। सबसे ज्यादा दिक्कत नवरात्रि जैसे मौके पर पदयात्रा कर दंतेवाड़ा पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को होती है। इसीलिए इस स्ट्रीट लाइट की याद नवरात्रि पर सबसे ज्यादा आती है। लेकिन कई नवरात्रि बीतने के बावजूद सोलर स्ट्रीट लाइट सुधारी नहीं जा सकी है।
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जब बाड़ ही फसल चरने लगे..
आम तौर पर जानवरों से फसल की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाई जाती है, लेकिन जब बाड़ खुद ही फसल चरने लग जाए तो क्या हो? ऐसे ही कुछ आरोप दंतेवाड़ा जिले में महिला व बाल विकास विभाग के साहब पर लग रहे हैं। आम तौर पर पुरुष मधु जाल यानी हनी ट्रैप के शिकार होते हैं, लेकिन इस तरह के हनी ट्रैप की कोशिश का आरोप कर्मचारी महिलाओं द्वारा लगाया गया है। इस मामले में हमलावर हुई महिला कांग्रेस ने न सिर्फ धरना प्रदर्शन किया, बल्कि आरोपी अधिकारी का पुतला भी फूंक दिया। लंबे समय से जिले में जमे उक्त साहब को विभागीय मंत्री और मंत्रालय से खास संरक्षण प्राप्त होने के आरोप तो पहले भी लगते रहे हैं, इस बार भी कार्रवाई टालने के लिए इस पर राजनीति प्रेरित आरोप का टैग लगाकर पल्ला झाड़ दिया जाए, तो कोई हैरानी नहीं होगी।
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भुगतान पर रार
दंतेवाड़ा जिले के कुआकोंडा जनपद में बस्तर ओलंपिक व बस्तर पंडुम के भुगतान को दबाने को लेकर उठा विवाद तूल पकड़ता दिख रहा है। यहां पदस्थ रहे पूर्व सीईओ से स्थानीय जनप्रतिनिधि खासे नाराज हैं। आयोजन के लिए जरूरी सामान, टेंट से लेकर भोजन तक का भुगतान नहीं हुआ। वेंडर दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं। आहरण के बाद भी राशि काम करने वालों तक कैसे नहीं पहुंची, यह सवाल अनुत्तरित रह गया है। ऐसे और भी मामले हैं, जिन्हें लेकर जनप्रतिनिधियों और आमजन में काफी असंतोष है।
वैसे भी कुआकोंडा ब्लॉक जिले में सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित रहने के चलते विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गया है। अब जबकि नक्सलवाद के खात्मे का दावा सरकार कर रही है, तो यहां टाइमपास सीईओ की बजाय संवेदनशील, अनुभवी और पूर्णकालिक अफसर की पोस्टिंग की जरूरत है, ताकि विकास को तेज गति दी जा सके।
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पहला मोबाइल ट्रैफिक सिग्नल
बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर में संभवतः राज्य का पहला चलित ट्रैफिक सिग्नल लगा हुआ है, जो कभी कभार उपयोग होता है और वीवीआईपी प्रवास के बाद हटा दिया जाता है। सिटी कोतवाली के सामने यह अजूबा ट्रैफिक सिग्नल पोस्ट देखा जा सकता है। बाकी चौक – चौराहों के सिग्नल भी कब चालू रहते हैं और कब बंद रहते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। इसका नतीजा यह होता है कि बाहर से आने वाले वाहन चालक खड़े होकर सिग्नल का इंतजार करते रह जाते हैं। ऐसा ही हाल चांदनी चौक का है, जहां पेड़ के पत्तों में छिपे सिग्नल को देख पाना आसान नहीं होता है। करवा चौथ के चांद की तरह तलाशना पड़ता है। कुल मिलाकर सिर्फ खाना पूर्ति हो रही है।
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