दादी का बुलडोजर पॉलिटिक्स (शब्द बाण – 129)

दादी का बुलडोजर पॉलिटिक्स (शब्द बाण – 129)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘शब्द बाण ‘ भाग – 129
29 मार्च 2026
शैलेन्द्र ठाकुर @ BastarUpdate.com

बुलडोजर पॉलिटिक्स
भाजपा के एक सन्यासी मुख्यमंत्री की बुलडोजर नीति इतनी लोकप्रिय हो गई है कि कांग्रेस के लोग भी जहां-तहां बुलडोजर चलाने की डिमांड करने लगे हैं। ताजा मामला दक्षिण बस्तर का है, जहां कद्दावर कांग्रेसी विधायक और पूर्व मंत्री दादी ने कोंटा में एक होटल पर बुलडोजर चलाकर ध्वस्त करने की मांग सरकार से कर डाली है। दादी का आरोप है कि भाजपा के एक वरिष्ठ नेता का यह होटल जुआं और गांजा का अंतर्राष्ट्रीय अड्डा बन गया है। सनद रहे कि यह वही जगह है, जहां से पत्रकारों के कार की डिक्की में गांजा प्लांट कर केस में फंसाने का आरोप पुलिस पर लगा था। तब बवाल इतना बढ़ा कि मामले में टीआई को सस्पेंड कर जेल भेजा गया था। अब देखना यह है कि दादी की डिमांड पर साय सरकार क्या कदम उठाती है।
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रेल्वे के फिरौतीबाज
रेल्वे के जूनियर इंजीनियर ने दंतेवाड़ा के रेल्वे फाटक पर अवैध वसूली कर ली। आपदा को अवसर बनाने का यह मामला था। दरअसल, भारी भरकम मशीनरी लेकर रेल्वे फाटक पार रहे ट्रेलर का आखिरी हिस्सा हाइट बैरियर में फंसने से भारी मशीन का एक हिस्सा छूट कर बीच सड़क पर गिर गया था। इससे कुछ देर सड़क यातायात बाधित जरूर रहा, पर रेल्वे को रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ, लेकिन आपदा को अवसर में बदलते हुए रेलवे के जूनियर इंजीनियर ने भारी भरकम जुर्माने का डर ट्रेलर ड्राइवर को दिखाया। इसके बाद मोल भाव कर 40 हजार की रकम भी साथी कर्मचारी के खाते में ट्रांसफर करवा ली। खून के आंसू रुलाकर की गई इस अवैध वसूली की शिकायत मीडिया कर्मियों ने रेल्वे मुख्यालय तक पहुंचा दी। नतीजा यह हुआ कि रेल्वे ने जूनियर इंजीनियर, ट्रॉलीमैन समेत 3 कर्मचारियों को तत्काल सस्पेंड कर दिया।
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अति उत्साह का नतीजा
नक्सल मुक्त बस्तर वाली डेडलाइन 31 मार्च की तारीख जैसे – जैसे नजदीक आ रही है, अति उत्साह और हड़बड़ी में कई चूक होने लगे हैं। मसलन, दंतेवाड़ा कटेकल्याण मार्ग पर स्थित जारम कैंप को बंद करने की तस्वीरें किसी ने मीडिया को यह कहकर उपलब्ध करवा दी कि नक्सलियों के पप्पा राव के सरेंडर करते ही फोर्स का यह कैंप बंद करवा दिया गया है। जबकि हकीकत यह है कि 3 साल पहले तत्कालीन एसपी डॉ अभिषेक पल्लव के कार्यकाल में ही यह कैंप बंद कर फोर्स को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया था। उसी समय से यहां समूह की महिलाओं ने मुर्गी पालन का दड़बा बना लिया था। इसी तरह साल भर के भीतर सेंट्रल फोर्स की वापसी शुरू होने के ऐलान से वो लोग सकते में आ गए हैं, जिन्हें विभिन्न कैटेगरी की सुरक्षा प्राप्त है। उनका मानना है कि कोविड भी कई वेरिएंट और नई नई लहर लेकर आ रहा था, लेकिन 4-5 दशक पुराना यह मर्ज इतनी आसानी से बगैर कोई साइड इफेक्ट दिए कैसे जा सकता है? तो इस मामले में इतनी हड़बड़ी क्यों?
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बाढ़ कहीं, राहत कहीं
बीते 26 अगस्त को दंतेवाड़ा में आई विनाशकारी बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित गांवों में बालूद, बालपेट और बिंजाम शामिल थे, लेकिन जब बाढ़ राहत और विकास कार्यों की सूची निकली तो इन गांवों को छोड़कर मटेनार जैसे गांव में कामकाज का ढेर लग गया, जहां बाढ़ आया ही नहीं था। वास्तविक प्रभावित पंचायतों ने इस पर आपत्ति जताई, तब जाकर पता चला कि इतनी बड़ी चूक हो गई। ऐसा ही हाल नगर पालिका दंतेवाड़ा का भी है। बाढ़ आपदा के बाद पहुंचे मुख्यमंत्री साय ने करोड़ों के पैकेज का ऐलान तो किया, लेकिन पालिका को इसके लिए फंड अब तक नहीं मिला है।
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लकड़ी युग की वापसी

रसोई गैस संकट को भले ही सरकार नकार रही हो, लेकिन वास्तव में लोग जलाऊ लकड़ी वाले चूल्हे और मिट्टी तेल वाले स्टोव की तरफ वापस लौटते देख रहे हैं। समस्या यह है कि वन विभाग के पास डिपो में अब पहले जैसे जलाऊ लकड़ी भी उपलब्ध नहीं है और सोसायटियों में मिट्टी तेल नदारद है। रसोई गैस के बढ़ते प्रचलन से लोगों की आदतें बदल चुकी थीं, सो इनके पास स्टॉक रखना ही बंद हो चुका था। अब डेड लाइन करीब आने से अंदरवाले दादाओं का खौफ भी लगभग खत्म हो गया है, तो शायद वन विभाग बिगड़े वनों के सुधार के नाम से जलाऊ लकड़ियां जंगल से डिपो तक आसानी से ला पाएगा।
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गृहमंत्री तक पहुंची शिकायत
दंतेवाड़ा में 4 रेलवे ओवरब्रिज राज्य सरकार के बजट बुक से निकलकर बाहर नहीं आ पा रहे हैं, इस बात की शिकायत उप मुख्यमंत्री व गृह मंत्री विजय शर्मा तक पहुंच चुकी है, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला ही रह गया। दरअसल, जागरूक जिला पंचायत सदस्य तिलेश्वरी नागेश ने सर्किट हाउस से रवाना होते वक्त यह शिकायत करते बताया कि अब तक एक भी ओवरब्रिज का डीपीआर नहीं बना। वर्ष 2025 के बजट में इसे लिया गया था। गृह मंत्री ने शिकायत को गंभीरता से सुना जरूर, लेकिन वहां इस शिकायत को नोट डाउन करने यानि लिखकर दर्ज करने कोई पीए या ओएसडी मौजूद ही नहीं थे। अब किसी वीवीआईपी को इतनी मौखिक शिकायतें और समस्याएं कहां याद रहती हैं।
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कका को मिस कर रहे सिरहा गुनिया
पिछली कांग्रेस सरकार ने गांवों में रहने वाले सिरहा – गुनिया को मानदेय देना शुरू किया था, यह योजना सरकार बदलने के बाद बंद हो गई। अब सिरहा – गुनिया भूपेश कका को मिस कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि महतारी वंदन योजना के चलते नई सरकार ने उन्हें ठिकाने लगा दिया। ऐसा ही कुछ हाल चरवाहों का भी है। करोड़ों फूंक कर बनाए गए गोठान और आवर्ती चराई केंद्र अब जंगली झाड़ियों से पट चुके हैं। मशीनें धूल खा रही हैं। कुल मिलाकर जनता के पैसों की बर्बादी ही हुई है।

✍🏻 शैलेन्द्र ठाकुर की कलम से..

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