साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग 127
15 मार्च 2026
शैलेन्द्र ठाकुर @BastarUpdate.com
जनगणना का फेर
पूरे डेढ़ दशक बाद फिर से जनगणना शुरू हो रही है। शिक्षकों से लेकर तमाम अन्य कर्मचारी इस कार्य में जुटेंगे।
देश के विकास की योजना बनाने जनगणना अत्यंत जरूरी है, लेकिन जनगणना करने के लिए जो समय चुना गया है, वो काफी अव्यवहारिक व कष्टप्रद साबित हो सकता है। कर्मचारियों को अप्रैल-मई की झुलसा देने वाली गर्मी के वक्त घर-घर जाकर दस्तक देने की चिंता सता रही है। साथ ही शादी – ब्याह के सीजन में छुट्टियां नहीं मिलने का टेंशन अलग।
———
सत्ता की अफीम या अफीम का नशा
दुर्ग जिले में भाजपा नेता को अफीम की खेती करते पकड़े जाने पर मचे बवाल के बाद सीएम साहब ने सभी जिलों में इस तरह के मामलों की पड़ताल करने का निर्देश दिया है। अब सभी जगह पुलिस व प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि उनके जिले में अफीमची या अफीम किसान तो नहीं हैं। वैसे, अपने ही खून-पसीने को सींचकर उगाए धान की बिक्री करने में इस बार जिस तरह की जलालत किसानों को झेलनी पड़ी, छापे पर छापे पड़े, गिरदावरी, रकबा का वेरीफिकेशन और तमाम तरह की जांच से गुजरना पड़ा, उससे नहीं लगता कि कोई आम किसान अफीम उगाकर इससे बड़ी आफत मोल लेने की हिम्मत करेगा। रही बात नेताओं की, तो यहां सत्ता की अफीम सूंघकर ही नेता-कार्यकर्ता खुश हैं, भले ही जनता का कामकाज ठप पड़ा हो। उसे असली अफीम उगाने की भला क्या जरूरत?
——-
दादी के आक्रामक तेवर
पिंजरे में कैद होने पर भी शेर आखिर शेर ही रहता है, यह बात कोंटा विधायक लखमा दादी ने साबित कर दी। आबकारी घोटाले में जेल जाने के बाद से एक तरह का निर्वासन झेल रहे दादी ने विधानसभा में अपने पुराने तेवर दिखाए। धान खरीदी पर जिस तरह सवालों की झड़ी लगा दी, उससे पता चल गया कि उनका होमवर्क कितना तगड़ा रहता है। सवालों का जवाब नहीं दे पाए खाद्य मंत्री पानी के घूंट गटकते रह गए। एक मामले पर उन्होंने यह भी तंज कसा कि जब सत्ता पक्ष के पूर्व मंत्री की ही कोई सुनवाई नहीं हो रही है, तो फिर आम आदमी की कौन सुनेगा?
—–
फिर से जल उठा दीप
सुकमा जिले में बीईओ की कुर्सी पर फिर से उसी व्यक्ति को बिठाए जाने से चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है, जिसने शिक्षकीय कार्य छोड़ दशकों तक इसी कुर्सी पर समय बिताया था। गंभीर आरोपों, विवादों और निलंबन के बावजूद फिर से कुर्सी दौड़ में जीतना भी एक बड़ा टैलेंट है। विपक्ष में रहते भाजपाईयों के जोरदार विरोध प्रदर्शन से बीईओ को हटाया गया था। अब भाजपा के सरकार में आने के बाद फिर से कुर्सी पर बिठाना लोगों को हैरान कर रहा है। वैसे, सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की, आलू की तरह किसी भी सब्जी में फिट होने का हुनर रखने वाले बीईओ साहब अपनी कुर्सी सलामत रखने में हमेशा कामयाब रहते हैं। अब देखना यह है कि बीईओ की कुर्सी पर उनकी फिर से ताजपोशी इस बार क्या गुल खिलाती है।
——–
सिंचाई प्रोजेक्ट बनाम दुधारू गाय
“कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए,
यहां एक चिराग़ भी मयस्सर नहीं शहर भर के लिए…”
स्व. दुष्यंत कुमार जी की ये पंक्तियां सुकमा जिले के गिरदालपारा हाइड्रो पंपिंग इरीगेशन प्रोजेक्ट की स्थिति बयां करने को काफी है। यहां 80 हेक्टेयर में 51 किसानों के खेतों की सिंचाई करने के नाम पर कुछ साल पहले करोड़ों रुपए खर्च किए गए, वह भी ऐसी तकनीक पर, जो प्रयोगशाला से पूरी तरह बाहर नहीं आ सकी थी। इसमें काइनेटिक एनर्जी का उपयोग करते हुए बिना ईंधन-बिजली के पानी खींचा जाना था। भारी भरकम खर्च के बावजूद किसी किसान के खेत को गिलास भर पानी भी नहीं मिल रहा। नवाचार के नाम पर सुकमा के तत्कालीन ‘महोदय’ ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। पानी किसानों के खेत को भले ही न मिला हो, लेकिन प्रोजेक्ट के नाम पर फंड निचोड़ लिया गया। प्रोजेक्ट फेल होने के बावजूद इसे मॉडल के तौर पर अपनाते हुए नीलावरम में भी अपनाने की कोशिश हुई। अब फिर इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश हो रही है। कुल मिलाकर यह प्रोजेक्ट किसी दुधारू गाय की तरह साबित हो रहा है, जिसे आक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगा – लगा कर दुहने की भरपूर कोशिश जारी है।
——-
बीजापुर में गर्भधारण कांड
बीजापुर में छात्रावास अधीक्षकों को बच्चों की फर्जी हाजिरी मामले में थोक में हटाए जाने और निलंबन का मामला शांत हुआ भी नहीं था कि अब एक आवासीय विद्यालय की 3 नाबालिग छात्राओं के गर्भधारण का नया कांड सामने आ गया है। कांकेर जिले के झलियामारी कांड के बाद भी विभाग ने कोई सबक नहीं लिया। दरअसल, दो डीईओ वाले बीजापुर जिले के शिक्षा विभाग में बद इंतजामी चरम पर है। दो डीईओ के झगड़े में सिस्टम चौपट हुआ बैठा है। न तो पुराने डीईओ से काम ले पा रहे है, न ही मूल संस्था में वापस भेज रहे हैं। विभाग में तेज तर्रार मंत्री होने के बावजूद इस मामले का निपटारा नहीं हो पाना बताता है कि मामला कितना गंभीर है। पुराने डीईओ के पास डीडी पावर यथावत है और बाकी काम दूसरे डीईओ के पास। ऐसे में सिस्टम बेलगाम होना स्वाभाविक ही है।
———–
अटैचमेंट खत्म करने की घोषणा कर फंसे मंत्री
शिक्षा विभाग की देखा-देखी में स्वास्थ्य मंत्री ने भी अपने विभाग में अटैचमेंट खत्म करने की घोषणा विधानसभा में कर दी। उनका दावा है कि जल्द ही सारे स्टाफ को वापस मूल संस्था में लाया जाएगा। लेकिन, आशंका है कि मंत्रीजी के इस दावे का हश्र भी कहीं शिक्षा विभाग की तरह न हो जाए, जहां समय- समय पर एक सर्कुलर जारी कर शिक्षकों का अटैचमेंट खत्म करने का शिगूफा छोड़ा जाता है, लेकिन नतीजा भी ढाक के तीन पात वाला ही रहता है। न शिक्षक दोबारा चाक पकड़ पाते हैं , न ही ब्लैकबोर्ड देख पाते हैं। बस अटैचमेंट रिन्यूअल के नाम पर अफसरों का कुछ खर्च-पानी निकल आता है।

