साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम “शब्द बाण” भाग-126
(8 मार्च 2026)
शैलेन्द्र ठाकुर @BastarUpdate.com
बस्तर में भी ठन-ठन गोपाल
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने ब्लॉक मुख्यालय बस्तर पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने महिलाओं के खाते में महतारी वंदन योजना की 641 करोड़ रूपये की राशि तो खटाखट ट्रांसफर कर दी, लेकिन बस्तर ब्लॉक या जिले के लिए अन्य कोई विकास योजना की खास सौगात नहीं दी, जिससे लोग हैरत में रह गए। बस्तर ब्लॉक के खोरखोसा-चपका समेत कुछ जगहों पर आम जनता की प्यास बुझाने आवर्धन नल-जल योजना का फ़िल्टर प्लांट जैसे कई बहुप्रतीक्षित मांगों पर किसी बड़ी घोषणा की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को बड़ी निराशा हाथ लगी। “जो भी कहेंगे, सच कहेंगे, सच के सिवाय कुछ नहीं कहेंगे” की तर्ज पर सीएम साहब ने सिर्फ और सिर्फ महिलाओं से जुड़ी योजनाओं की उपलब्धियां गिनाई । सौगातों का पिटारा खोलने में उनके हाथ तंग दिखे। हैरानी की बात यह है कि लगातार दो बार सीट गंवाने के बावजूद अगली बार भी बस्तर विस सीट कांग्रेस से छीनने में भाजपा की कोई खास दिलचस्पी नहीं दिख रही है। शायद, महतारी वोटर्स के भरोसे ही भाजपा की नैया पार लगने का भरोसा हो गया है। वैसे, यह पहला मौका नहीं है, जब इस तरह सीएम सौगातों का पिटारा खोले बगैर लौट गए। उनके पिछले दंतेवाड़ा प्रवास पर भी ऐसा ही वाकया हुआ था।
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कौन करेगा उद्घाटन ?
डंकनी नदी पर बालूद-बालपेट के बीच बन रहे पुल की दिलचस्प कहानी है। मई 2013 में विकास यात्रा निकालने दंतेवाड़ा में आए तत्कालीन सीएम डॉ
डॉ रमन सिंह ने हाई स्कूल मैदान में हुई सभा में इस पुल के निर्माण की घोषणा की। अगला चुनाव जीतकर भी इसके लिए बजट में मंजूरी नहीं दिखा सके। 6 साल बाद भूपेश बघेल सरकार ने बजट में इसकी स्वीकृति दिलाई। लेकिन वे भी पुल नहीं बनवा सके। काम विष्णुदेव सरकार के कार्यकाल में शुरू तो हुआ, लेकिन पिलर बनाने से आगे बात नहीं बढ़ सकी है। इस पुल का लोकार्पण इसी सरकार के अगले 3 साल के कार्यकाल में हो भी पायेगा, यह कहना मुश्किल है। इधर कांग्रेसी इस उम्मीद को लेकर खुश हैं, कि अगली सरकार तो कांग्रेस की ही बनेगी, तो पुल का उद्घाटन उनकी ही पार्टी के सीएम ही करेंगे, चाहे सीएम भूपेश कका बनें, या फिर टीएस बाबा। वैसे भी, छिंदनार वाले पुल का निर्माण कार्य डॉ रमन के कार्यकाल में शुरू हुआ और उद्घाटन कर भूपेश कका ने चौका लगा दिया था।
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पीएचई विभाग के कारनामे
दक्षिण बस्तर में सरकार की पेयजल वाली महत्वाकांक्षी योजना अमृत मिशन का बुरा हाल है। योजना को क्रियान्वित करने वाले पीएचई विभाग के अफसरों ने ही योजना का भट्टा बिठाकर रखा हुआ है। लोगों के घरों के सामने कुछ साल पहले ही नल और उसके स्टैंड लगाए जा चुके हैं, लेकिन इन नलों से अमृत वाला जल कब निकलेगा, इसका इंतजार करते ग्रामीण थक चुके हैं। कहीं पेयजल सप्लाई की ओवरहेड टंकी अधूरी पड़ी है, तो कहीं टंकी बनने के कई साल बाद भी जल स्रोत नहीं खोज सके हैं। विभाग के अफसर पूरा ठीकरा ठेकेदारों पर फोड़ रहे हैं, तो वहीं ठेकेदार पिछले काम का भुगतान नहीं होने का रोना रो रहे हैं। पता नहीं, गंगा कब अमृत बनकर ग्रामीणों के नल से बाहर आएगी।
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पीएम सड़कों पर पर्देदारी
राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत दक्षिण बस्तर में जिन सड़कों की मंजूरी बजट में दी है, उन सड़कों की सूची अब तक गुप्त रखी गई है। इसमें आरआरपी यानी रूरल रोड प्रोजेक्ट फेज-4 में कई बहुप्रतीक्षित सड़कों का नाम शामिल होने की उम्मीदें ग्रामीण लगाए बैठे हैं, लेकिन विभाग की ओर से यह सूची अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है, जिससे क्षेत्र के निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के पास भी बताने लायक कुछ नहीं है। दूसरी तरफ विभाग के अफसर पुरानी सड़कों का मेंटेनेन्स तक नहीं कर पा रहे हैं। कई ग्रामीण सड़कों के पुल-पुलिए क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और कई सड़कें भारी भरकम हाईवा चलने से दम तोड़ रही हैं। जिसका असर सरकार की छवि पर पड़ रहा है। पिछली भूपेश सरकार को निपटाने में राज्य भर की खराब सड़कों की बड़ी भूमिका रही थी, इसके बाद भी नई सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही है।
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बजट सिर्फ प्रावधानों का
दंतेवाड़ा जिले में कई बजटीय प्रावधान पीडब्ल्यूडी विभाग के बजट बुक में छपने तक ही सीमित रह जाते हैं। इस बजट को इम्प्लीमेंट कर जमीन पर उतारने की कोई कोशिश ही नहीं होती है। ज्यादा खोज-खबर ली भी गई, तो पीडब्ल्यूडी के अफसर कभी ब्रिज डिवीजन तो कभी एनएच डिवीजन के पाले में गेंद धकेल कर मुक्ति पा लेते हैं। फिर कुछ साल तक बजट में शामिल रहने के बाद इसे विलोपित कर दिया जाता है। घोषणा से भोली-भाली जनता भी खुश हो जाती है और सरकार की अठन्नी भी खर्च नहीं होती। यानी आम के आम, गुठलियों के भी दाम। पिछली बजट में दंतेवाड़ा जिले के हिस्से में 1 फ्लाईओवर व 4 रेल्वे अंडरब्रिज/ओवरब्रिज के लिए किये गए प्रारंभिक प्रावधान का भी यही हश्र हो चुका है। इस बार नए बजट में सरकार ने कुछ सड़कों और पुल- पुलियों का प्रावधान तो किया है, लेकिन ये भी अंजाम तक पहुंच पाएंगे, यह कहना मुश्किल है।
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अस्त -व्यस्त रहा फागुन मेला
मां दंतेश्वरी की छत्र छाया में दंतेवाड़ा में आयोजित होने वाला विख्यात फागुन मेला सम्पन्न होने से पुलिस व प्रशासन ने राहत की सांस ली है, लेकिन यह भी सच है कि मेला इस बार फीका-फीका रहा। मेला स्थल को काफी दूर नई जगह पर शिफ्ट करने से यह नौबत आई। मां दंतेश्वरी की पालकी की रस्म से जुड़ी जगह और मीना बाजार स्थल के बीच अत्यधिक ज्यादा गैप होने से दुकान सजाने वालों को काफ़ी नुकसान उठाना पड़ा। बाईपास मार्ग का पुल टूटने का हवाला देकर मेन रोड पर मेला नहीं लगने दिया गया। इसके बाद चैत्र नवरात्रि पर्व जैसा भीड़ भरा आयोजन भी इसी महीने शुरू होने वाला है। ऐसे में फिर से हैवी ट्रैफिक का प्रबंधन करने की चुनौती आना तय है। इधर नए बायपास-2 मार्ग के पुल के अधूरे निर्माण को लेकर राज्य सरकार उदासीन बनी हुई है। इस पुल की स्लैब ढलाई जितनी जल्दी होगी, उतनी जल्दी इस समस्या से निजात मिलेगी।
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किधर है डीएमएफ ?
सुनते हैं कि दंतेवाड़ा जिला डीएमएफ के पैसे के मामले में दूसरे नंबर पर आता है। यहां 9 से 11 सौ करोड़ रुपए सालाना मिलने का शोर मचा रहता है, लेकिन बीते साल 300 करोड़ रुपए मेडिकल कॉलेज निर्माण के लिए बुक करने के नाम पर जो कृत्रिम आर्थिक संकट दिखाया जा रहा है, उसमें बाकी 6-7 सौ करोड़ की राशि किधर गई, यह सवाल दफन हो चुका है। वहीं, दूसरी तरफ भाजपाई नेता यह कहते हुए असंतुष्ट कार्यकर्ताओं को चुप कराने में लगे रहते हैं कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते। जो हो रहा है, वो ठीक है। अच्छे दिन जल्द ही लौट आएंगे।
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