मंत्रियों की भी नहीं सुनते अफसर… (शब्द बाण -124)

मंत्रियों की भी नहीं सुनते अफसर… (शब्द बाण -124)

साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग -124
(22 फरवरी 2026)

शैलेन्द्र ठाकुर @BastarUpdate. com

यह चर्चा आम है कि साय सरकार में अफसर भी मंत्रियों की नहीं सुनते। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। इसके पहले भूपेश कका ने पावर को सेंट्रलाइज कर लगाम सीधे अपने हाथ में कसकर रखा हुआ था। तब भी अफसर मंत्रियों की नहीं, सिर्फ सीएम की सुनते थे। सरकार बदलने के बाद अब स्थितियां थोड़ी बदली हैं। सीधे-सादे मुख्यमंत्री की सहजता का फायदा दूसरे उठा रहे हैं। अफसरों ने अपना-अपना गॉडफादर यानी संरक्षक तय किया हुआ है। अफसर सिर्फ उनकी सुनते हैं, जिसके रहमोकरम पर पोस्टिंग टिकी हुई होती है। इसके अलावा बाकी मंत्रियों की बात अनसुनी कर देते हैं। चाहे वो जनहित का विषय हो, या फिर कोई और काम। इससे आम जनों व पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच मंत्रियों की किरकिरी हो रही है। पार्टी के भीतरखाने से लेकर बाहर तक चर्चा तो यह है कि एक सुपर सीएम के नियंत्रण में राज्य की पूरी ब्यूरोक्रेसी चल रही है। पिछली कांग्रेस सरकार में एक मैडम सुपर सीएम बनी हुई थीं, इस बार मसला थोड़ा अलग है।
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बेलगाम हुए ठेकेदार..
दंतेवाड़ा में बाढ़ में बह गए चितालंका बायपास मार्ग के पुल की वजह से जिला मुख्यालय में यातायात संकट गहरा गया है, भारी भरकम वाहन शहर के बीच से घुसकर सड़कों को रौंद रहे हैं। दूसरी तरफ नए बायपास पुल जल्द शुरू होने से यह समस्या खत्म हो सकती है, लेकिन इस मार्ग पर बालूद-बालपेट के बीच डंकनी नदी पर निर्माणाधीन पुल को लेकर अफसरों में जरा भी गंभीरता नहीं दिख रही है। पुल निर्माण कछुआ रफ्तार से चल रहा है। बेलगाम ठेकेदार अपनी मर्जी से काम करने में मग्न है। पुल बना रहे सेतु संभाग के जगदलपुर में बैठे कार्यपालन अभियंता किसी पत्रकार या अजनबी का फोन ही नहीं उठाते हैं। आम लोगों की चिंता यह है कि बारिश के सीजन से पहले पुल की ढलाई हो पाएगी भी या नहीं। उधर नेता और अफसर “रोम जल रहा था और नीरो बंशी बजा रहा था” वाले किस्से की तरह रीलबाजी में व्यस्त हैं।
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हेलमेट वाला सेंट्रल बैंक
दंतेवाड़ा का सेंट्रल बैंक उधड़ी हुई छत वाले भवन में संचालित हो रहा है, जहां आए दिन छत की प्लास्टर उखड़कर गिरती रहती है। हॉल के कुछ हिस्से में ही प्लास्टर बाकी है। बैंक के कर्मचारी और यहां मौजूद रहने वाले ग्राहक अक्सर छत को देखकर अपनी सलामती की दुआ ऊपर वाले से करते रहते हैं, ताकि लेनदेन पूरा होने से पहले कहीं ऊपर वाले का बुलावा नहीं आ जाए। हालात ऐसे हैं कि कर्मचारियों के अलावा ग्राहकों के लिए भी हेलमेट उपलब्ध करवाने की जरूरत महसूस हो रही है।
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डुबान क्षेत्र की परिभाषा क्या
दंतेवाड़ा में अगस्त महीने में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद नगर के डुबान के डुबान क्षेत्र की परिभाषा बदलने की जरूरत है। वीआईपी ठहरने की जगह वाले सर्किट हाउस के अलावा अपर कलेक्टर बंगला से लेकर नगर पालिका दफ्तर और एसपी ऑफिस तक तेज रफ्तार बाढ़ से जलमग्न हो गए थे। यहाँ तक कि नदी के ठीक किनारे स्थित जिला पंचायत सीईओ बंगला भी बाढ़ से बुरी तरह घिर गया था। आईएएस अफसर को सपरिवार जेसीबी के बकेट में बिठाकर निकालना पड़ा था। इसके बाद भी सर्किट हाउस, सीईओ व 2 अन्य बंगले को भविष्य के खतरे के हिसाब से दूसरी जगह शिफ्ट करने जैसी कोई योजना नहीं बन रही है। आम तौर पर नदी किनारे 100 मीटर के हिस्से को डुबान क्षेत्र में गिना जाता है। लेकिन यहां अफसरों के बंगले और सर्किट हाऊस पर यह नियम लागू नहीं किया गया है। इसी जगह किसी आम आदमी का मकान बना हुआ होता, तो अब तक नोटिस पर नोटिस मिल गया होता।
पर यहां प्रकृति से मिली चेतावनी के बाद भी भविष्य के लिए कोई योजना नहीं बनी है।
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टामन के चेलों से दिक्क़त

पीएससी में पैसे लेकर अफसरों की भर्ती करने के आरोप में भले ही जेल की हवा खा रहे आईएएस टामन सोनवानी की अकड़ ढीली पड़ गई हो, लेकिन टामन फैक्ट्री से पास आउट हुए अफसरों के तेवर बस्तर में जस के तस बने हुए हैं। गनीमत तो यह रही कि लेनदेन कर भर्ती के आरोप की जांच सिर्फ टामन बोर्ड के कुछ बैच विशेष तक ही सीमित रह गई। जांच की चपेट में आने से बचे हुए लोग मजे से अफसरी कर रहे हैं। एवज में कितनी ‘गुरुदक्षिणा’ चुकाई उसका तो पता नहीं, पर
इनमें से कुछ तो खुद को डायरेक्ट आईएएस से कम नहीं समझते हैं। तुर्रा ऐसा कि आम आदमी तो दूर पत्रकारों तक को घंटों इंतजार करवाना, जरुरी मैसेज का जवाब तक नहीं देना, मोबाइल पर कॉल रिसीव नहीं करना जैसे चोंचलेबाजी से लोग खासे परेशान हैं।
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फागुन मेला और ट्रैफिक की चिंता
दंतेवाड़ा में विख्यात फागुन मेला शुरू तो हो गया है, लेकिन यातायात व्यवस्था की चिंता के बीच इसे नई जगह पर शिफ्ट कर दिया गया है। दस दिन तक चलने वाले इस मेला के दौरान भारी वाहनों की आवाजाही के लिए दूसरे रुट तय किए गए हैं, जिनसे शहर के बाद अब ग्रामीण सड़कों का कचूमर निकलने की पूरी आशंका है। निर्माणाधीन बायपास-2 मार्ग का उपयोग होता तो यह नौबत नहीं आती। वहीं, मेला स्थल करीब 2 किमी दूर शिफ्ट किए जाने को लेकर भी बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला जा रहा है। मेला आयोजन स्थल पर ‘महोदय’ ने भारी विरोध के बावजूद काम्प्लेक्स और ज्योति कलश भवन का निर्माण करवा दिया, जिससे पारंपरिक स्थल और मन्दिर की रस्मों वाली जगह की बजाय मेला दूसरी जगह शिफ्ट करने की नौबत आ गई है। दूसरी तरफ सहकारी बैंक से आत्मानंद बालक हायर सेकेंडरी स्कूल तक प्रस्तावित फ्लाई ओवर के निर्माण की योजना पर भी काम नहीं हुआ। यह फ्लाईओवर बन जाने पर मेला शिफ्टिंग की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, लेकिन राज्य के बजट में शामिल होने के बावजूद अब तक इसका सर्वेक्षण और डीपीआर बनाने का काम शुरू नहीं हुआ।
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डीएमएफ की आग नारायणपुर तक
बस्तर में डिस्ट्रिक्ट मिनरल फण्ड डीएमएफ को लेकर सुलग रहे असंतोष की आग अब नारायणपुर जिले तक पहुंच गई है। शुरुआत दंतेवाड़ा जिले में डीएमएफ के फंड से स्थानीय विकास कार्यों पर पैसे खर्च नहीं कर दीगर उपयोग को लेकर हुई थी। अब नारायणपुर जिला वासियों ने भी अपने हक का पैसा कांकेर जिले को देने का आरोप लगाते मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि रावघाट परियोजना में ज्यादातर लौह अयस्क खनन नारायणपुर में हो रहा है। यहां की सड़कें तबाह हो रही है और धूल-मिट्टी फांकने की मजबूरी नारायणपुर के हिस्से में आ रही है, लेकिन डीएमएफ का ज्यादा आबंटन पड़ोसी जिला कांकेर के हिस्से में जा रहा है। इसके विरोध में कामकाज ठप करने का अल्टीमेटम नारायणपुर के जनप्रतिनिधि दे चुके हैं। उनकी यह पीड़ा जायज भी है। लौह अयस्क ढुलाई से नारायणपुर-कोंडागांव मार्ग बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने से इस पर आम वाहनों की आवाजाही लगभग बंद है। लोगों को वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करना पड़ रहा है। सरकार को डीएमएफ का उचित बंटवारा करने का कोई फार्मूला निकालने की जरूरत है।
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✍🏻 शैलेन्द्र ठाकुर की कलम से

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