साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम “शब्द बाण” भाग – 130
5 अप्रैल 2026
शैलेन्द्र ठाकुर @Dantewada
एक प्रभारी तीन पर भारी
दंतेवाड़ा जिले में समाज कल्याण विभाग हमेशा सुर्खियों में रहता है। यह सुर्खी विभाग अपने कल्याणकारी कार्यों से नहीं बल्कि अपने उटपटांग व्यवस्था और हरकतों की वजह से बटोरता आ रहा है। इस बार मामला थोड़ा अलग है। विभाग में चल रही एक बड़ी जांच की वजह से उप संचालक की कुर्सी खाली पड़ी है। इसका प्रभार पंचायत विभाग के डिप्टी डायरेक्टर को दिया गया है, जो कुआकोंडा जनपद के प्रभारी सीईओ भी हैं। आलम यह है कि 3-3 बड़ी जिम्मेदारियों के चलते किसी भी पद पर पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं। अब समाज कल्याण विभाग में दिव्यांग जनों और निः शक्त लोगों के लिए सहायक उपकरण छड़ी, व्हील चेयर का संकट आ गया है। यहां के कर्मचारी जरूरी फाइलें लिए प्रभारी अफसर के दफ्तर की दौड़ लगाने को मजबूर हैं। यानि समाज का कल्याण करने वाला विभाग खुद का कल्याण नहीं कर पा रहा है। वैसे पूर्व में पंचायत और समाज कल्याण विभाग एक ही थे, जिसे सरकार ने कुछ साल पहले एक दूसरे से अलग कर दिया था, लेकिन दंतेवाड़ा में दोनों विभाग अघोषित रूप से मर्ज होते दिख रहे हैं।
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अप्रैल फूल बनाया
अप्रैल फूल बनाने की परम्परा लगभग लुप्त प्राय हो चुकी है, लेकिन किसी सरकारी विभाग द्वारा अप्रैल फूल बनाए जाने का अजब मामला हाल ही में सामने आया है। दरअसल,
बस्तर में 9 वीं और 11 वीं कक्षा के विद्यार्थियों को शिक्षा विभाग ने पहली अप्रैल को अप्रैल फूल बना दिया। इस दिन होने वाली परीक्षा के लिए जब परीक्षार्थी पहुंचे, तो उन्हें बताया गया कि आज का पर्चा तो कैंसिल हो गया है। अब परीक्षा 9 अप्रैल को होगी। यह भी अजीब बात है कि पर्चा कैंसिल होने की जानकारी समय रहते कैसे नहीं दी जा सकी, वह भी सूचना क्रांति के दौर में।
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नासूर बन चुका जख्म
नासूर बन चुके गीदम – बारसूर जर्जर सड़क को लेकर आम जनता इतनी परेशान है कि कोई सुनता ही नहीं।
अंततः कांग्रेसियों को चक्का जाम करना ही पड़ा। भूपेश सरकार के कार्यकाल में पीडब्ल्यूडी ने बारसूर की तरफ से इसका बीटी रिनीवल कार्य शुरू किया था और 4-5 किमी के बाद काम बंद कर दिया। दिनों दिन जर्जर होती जा रही इस सड़क का फोड़ा कब नासूर बन गया, किसी को पता ही नहीं चला। कांग्रेस की सरकार बदल गई और नई सरकार में भी इस सड़क की दुर्दशा ही बढ़ती रही। ऊपर से बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुआ गणेश बहार नाला का पुल भी सोने पे सुहागा साबित हो रहा है। वैसे, राज्य के बजट में तो हमेशा की तरह एक बार फिर बारसूर सड़क के उन्नयन का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह प्रावधान भी बजट बुक से बाहर निकलकर धरातल पर क्रियान्वित होगा, या इस बार भी दिखावटी सब्ज बाग रह जाएगा, यह कहना अभी मुश्किल है। बेहतर सस्पेंशन और काले शीशे वाली गाड़ियों में बैठने वाले वीवीआईपी और बड़े अफसरों को इस सड़क की पीड़ा समझ में आती ही नहीं है। अब देखना यह है कि चक्का जाम के बाद भी सरकार आम जनता की इस गंभीर समस्या को सुलझाती है या सिर्फ कांग्रेसी विरोध मानकर दरकिनार करती है।
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अंदर वालों का स्विस कनेक्शन!!
दक्षिण बस्तर के सीपीआई नेता मनीष कुंजाम ने नक्सलियों पर यह आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है कि उनके डंप में मिले सोने के बिस्कुटों पर स्विट्जरलैंड के बैंक का नाम अंकित है। इसकी जांच होगी तो कई बड़े राज का पर्दाफाश होगा। वैसे, सफेदपोश राजनेताओं और अन्य लोगों कालाधन स्विस बैंक में जमा होने का हल्ला तो दशकों से उड़ता रहा है, लेकिन जंगल के अंदर रहकर लोकतंत्र को चुनौती देने वाले दादाओं पर इस तरह का आरोप पहली बार लगा है। देखना यह है कि सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसियां इसे कितनी गंभीरता से लेती हैं।
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मगरमच्छ जमीन पर ..
आमिर खान की बॉलीवुड फ़िल्म “तारे जमीन पर ..” काफी चर्चित रही। लेकिन अब दक्षिण बस्तर में मगरमच्छ जमीन पर निकल आने की चर्चा ज्यादा है। मगरमच्छ उभयचर जीव है, जो जल के साथ ही थल पर भी रह सकता है। बारसूर के ऐतिहासिक बूढ़ा तालाब से यह उभयचर जीव तालाब के जल से निकलकर सड़क पर आ गया, जिसके बाद से यह चर्चा आम है कि एडवेंचर टूरिज्म के उत्साह में इंसानों ने मगरमच्छों का जीना दूभर कर दिया। जिससे यह मगरमच्छ नक्सलियों की तरह आत्मसमर्पण वाले मोड पर आने को मजबूर हो गया। अच्छा हो कि वन्य जीवों और मगरमच्छों के प्राकृतिक रहवास से छेड़छाड़ किये बगैर ही परस्पर शांतिपूर्ण सहजीविता वाले पर्यटन की संस्कृति विकसित की जाए।
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नियुक्ति पर बवाल
दक्षिण बस्तर में विधायक प्रतिनिधि की नियुक्ति को लेकर विपक्षी दलों के लोग आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। आम तौर पर यह चुने हुए जन प्रतिनिधि का विशेषाधिकार होता है कि वह अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि नामित कर दे। यह कोई संवैधानिक पद तो होता नहीं है कि इसके लिए किसी निर्वाचन प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़े। क्षेत्र में यह पहला मौका है, जब किसी विधायक प्रतिनिधि की नियुक्ति पर विपक्षियों ने सवाल – जवाब किया है। इसके पहले भी कई सांसद – विधायक अपनी पसंद से अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर देते थे, चाहे उसका कोई जनाधार हो या न हो। आम जनता की समस्याओं का प्रतिनिधित्व भले ही न हो, बस काम निर्माण कार्यों की मुंशीगिरी तक ही सीमित था। तब पार्टी के भीतर से ही कोई विरोध के स्वर नहीं उठ पाते थे। इस बार पार्टी के बाहर से विरोध की नई पॉलिटिक्स लोगों को हैरान कर रही है।
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पुलिसिंग की नई चुनौती
दशकों से हावी रहे नक्सलवाद के बैकफुट पर जाने के बाद समूचे बस्तर रेंज में नई और विकट समस्या आ खड़ी हुई है। अब तक सिर्फ और सिर्फ नक्सलवाद से निपटने की मानसिकता बनाकर रखती आ रही पुलिस के लिए अब हत्या, चोरी, डकैती जैसे रूटीन क्राइम की गुत्थियां सुलझाने और लॉ एंड ऑर्डर को बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। पुलिस की स्थिति इंग्लिश मीडियम से अचानक हिंदी मीडियम में या सीजी बोर्ड से अचानक सीबीएसई पाठ्यक्रम में दाखिला लेने वाले विद्यार्थी की तरह हो गई है। संभव है कि जंगल वारफेयर की तरह अब रूटीन पुलिसिंग के लिए विशेष रिफ्रेशर कोर्स करवाने की पहल हो। नक्सल प्रभावित जिलों में साधारण मर्डर की घटनाओं को भी पहले नक्सल एंगल से देखा जाता था और इन्वेस्टिगेशन के नाम पर सीखने को कुछ खास रहता नहीं था। पीएम के लिए शव परिजनों से ही नजदीकी हेडक्वार्टर मंगवा लिए जाते थे। विवेचना अधिकारियों के लिए सीखने सिखाने को कुछ रहता नहीं था। अब नई परिस्थितियों में मौके पर जाकर ही इन्वेस्टिगेशन करना होगा।
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मन की बात
अक्सर विभिन्न मंत्रियों के प्रवास पर आम जनता और सत्ता पक्ष के साधारण कार्यकर्ता उनसे मिलकर अपनी मन की बात कहना तो चाहते हैं, पर घंटों मंत्री के पास जमे ‘ घेरु ‘ नेताओं की वजह से अपने मन की बात संकोचवश कह नहीं पाते हैं। फरियादियों की बात सुनने के लिए पर्सनल स्पेस की व्यवस्था नहीं होने से बिना कहे ही मायूस लौटना पड़ता है। फिर ‘मन की बात ‘ सिर्फ रेडियो पर सुनकर ही संतोष कर लेते हैं। वित्त मंत्री की तरह फरियादियों से ‘ वन टू वन ‘ चर्चा करने का फार्मूला बाकी सभी मंत्री अपना लें, तो शायद यह समस्या न रहे।
