साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम शब्द बाण भाग-125
01 मार्च 2026
शैलेन्द्र ठाकुर @ BastarUpdate.com
नक्सली खत्म, डीआईजी का पद भी खाली
नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन करीब आने से पहले बस्तर संभाग के बीजापुर, सुकमा व नारायणपुर को छोड़कर अधिकांश जिले नक्सलमुक्त घोषित कर दिए गए हैं। अगर यही रफ्तार जारी रही तो जल्द ही अन्य जिले भी नक्सलमुक्त होने का सर्टिफिकेट पा जाएंगे। लेकिन इसके साथ ही नक्सल प्रभावित जिलों को मिलने वाली विशेष केंद्रीय सहायता और अन्य फंडिंग में भी कटौती होने को लेकर ज्यादातर अफसर शंकित हैं। उनकी चिंता स्वाभाविक ही है, क्योंकि दंतेवाड़ा में वरिष्ठ आईपीएस के 31 दिसंबर को रिटायर होने के बाद से डीआईजी का पद खाली पड़ा हुआ है, जो दंतेवाड़ा, बीजापुर व सुकमा जिले में नक्सल विरोधी आपरेशन का संयोजन करने के लिए सृजित किया गया था। ऐसा माना जाने लगा है कि ज्यादातर नक्सलियों के मारे जाने और सरेंडर के बाद इस पद का महत्व कम हो गया है।
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गालीबाज अफसर
दंतेवाड़ा जिले में एक और गालीबाज अफसर को लेकर विवाद सुर्खियों में है। पहले भी कई बार विवादों में उलझते रहे इस अफसर के लिए यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गया है। जान हथेली पर लेकर पड़ोसी राज्य तेलंगाना में सर्वे करने जा रही टीम का कसूर यह था कि उन्होंने देशी चिकन खिलाने का वादा तोड़कर ब्रायलर परोसने पर आपत्ति जताई थी। फिर क्या था, पहले से झमाझम हो चुके साहब भोजन के लिए बुलाने वाले शिक्षक पर ही बरस पड़े। तमाम असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करते हुए अपनी भड़ास निकालने लगे। पीड़ितों ने इसका वीडियो रिकॉर्ड कर लिया और कलेक्टर तक शिकायत कर दी। शिक्षक संगठनों और आदिवासी समाज ने भी मोर्चा खोल दिया है। वैसे, दक्षिण बस्तर में गाली-गलौज झेलना छोटे कर्मचारियों के लिए कोई नई बात नहीं है, पर उचित शिकायत और साक्ष्य के अभाव में अफसर बच निकलते हैं, और मातहत अफसर-कर्मी अपमान का घूंट पीकर रह जाते हैं।
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पुरानी बोतल में नई शराब
डीपीआई यानी लोक शिक्षण संचालनालय ने पुरानी बोतल में नई शराब वाले मुहावरे की तर्ज पर वही घिसा-पिटा आदेश जारी कर अपनी किरकिरी कर ली है। इसमें गैर शिक्षकीय कार्यों और अन्य विभागों में कार्यरत शिक्षकों को तत्काल अपने मूल स्कूल में लौटने को कहा गया है। इस आदेश की मूल भावना वही है, जो वर्षों से हर साल समय-समय पर जारी कर खाना-पूर्ति की जाती है, सिर्फ तारीख बदली है। आदेश के बाद थोड़ी हलचल होती है, फिर उसी ढर्रे पर कामकाज लौट आता है। जिन्होंने दशकों से चाक और ब्लैक बोर्ड नहीं छुआ, उन्हें वापस स्कूल में लौटने की बात नागवार गुजरना स्वाभाविक ही है। बाबू, कंप्यूटर ऑपरेटर, आश्रम-छात्रावास अधीक्षक, लाइब्रेरियन, सीआरसी, बीआरसी, बीईओ, डीईओ से लेकर तमाम पद जब तक सीधी भर्ती या प्रमोशन से नहीं भरे जाएंगे, तब तक शिक्षकों का अटैचमेंट खत्म करना असंभव है। यह बात डीपीआई तो क्या, पूरे सिस्टम को पता है। इसी वजह से जड़ की जगह पत्तों को सींचना डीपीआई की मजबूरी है। शराब और तम्बाखू उत्पाद के पैकेट पर – “शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है” या “तम्बाखू के सेवन से कर्क रोग हो सकता है।” जैसी वैधानिक चेतावनी छापने की तर्ज पर हर साल अटैचमेंट खत्म करने का शिगूफा विभाग छोड़ देता है।
इसी मासूमियत पर किसी ने क्या खूब कहा है-
मुझको तो होश नहीं, तुमको खबर हो शायद।
लोग तो कहते हैं कि तुमने मुझे बर्बाद किया।।
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बूढ़ी एम्बुलेंस से आपातसेवा !
दक्षिण बस्तर में माँ दंतेश्वरी के आंगन से राज्य सरकार ज्यादातर अभियानों की शुरुआत करती है, लेकिन यहां स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं को हमेशा ताक पर रख दिया जाता है। पिछली रमन सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई आपात सेवा संजीवनी 108 के ज्यादातर एम्बुलेंस बूढ़े हो चुके हैं, या खुद बीमार हैं। एम्बुलेंस के ब्रेक फेल होने, दरवाजे के जाम होने या रस्सी बांधकर काम चलाने जैसे किस्से तो सामने आते ही रहते हैं, हाल ही में एक एम्बुलेंस के साधारण चढ़ाई भी नहीं चढ़ पाने का वीडियो वायरल होने से लोग सकते में हैं। आपात स्थिति में घायल या मरीज तक एम्बुलेंस पहुंच तो जाती है, पर समय पर नजदीकी अस्पताल तक पहुंचा दे, इसकी गारंटी नहीं होती। अच्छा होता कि खटारा एम्बुलेंस की जगह सरकार इस जैविक कृषि जिले में टीप-टॉप कंडीशन वाले भैंसे ही अलॉट कर देती। कम से कम यम वाहन पर सवारी की डायरेक्ट फीलिंग आ जाती। आम जनता ने तो पिछली बार सरकार भी बदल कर देख लिया, पर आपात सेवा के पुराने एम्बुलेंस किसी सरकार ने नहीं बदले।
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ड्राई-डे का रंग
साय सरकार ने यह स्पष्ट करके मदिरा प्रेमियों के रंग में भंग कर दिया कि होली पर हमेशा की तरह इस बार भी ड्राई-डे ही रहेगा, होली के दुकान नहीं खुलेगी। इसके पहले यह खबर खूब वायरल थी कि होली के दिन पहली बार शराब दुकानें खुली रहेगी। मदिरा प्रेमी भी खुश थे कि चलो अब पहले से खरीदकर ‘स्टॉक’ नहीं करना पड़ेगा, जब भी तलब होगी, होली के दिन ही जाकर खरीद लाएंगे। लेकिन दूसरे वर्ग से इकोनॉमी वारियर्स यानी मदिरा प्रेमियों का यह सुख देखा नहीं गया। यह देखते हुए भी कि इन्हीं योद्धाओं ने कोरोना काल जैसी विकट स्थिति के बावजूद जान जोखिम में डालकर सरकार की अर्थव्यवस्था को थामे रखा था। खैर, आलोचनाओं की बौछार देखते हुए सरकार को बैकफुट पर जाना पड़ गया। दरअसल, कुछ दिन पहले गाँधीजी की पुण्य तिथि पर दुकान खुली रखने को लेकर कांग्रेस ने खूब विरोध प्रदर्शन किया था।
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आत्मानंद से विवेकानंद की ओर..
राज्य सरकार के बजट में इस बार कुछ स्कूलों को स्वामी विवेकानंद उत्कृष्ठ स्कूलों में कन्वर्ट करने का प्रावधान किया है, जो पिछली सरकार द्वारा हिंदी मीडियम स्कूलों को स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ठ स्कूलों में बदले जाने से प्रेरित कदम लगता है। हालांकि, इन स्कूलों का सिर्फ नाम ही बदला। यानी शरीर वही था, बस आत्मा खींचकर निकाल दी गई। एक प्यून या शिक्षक तक अलग से नहीं मिला। अंग्रेजी मीडियम स्कूल में लाइब्रेरियन से लेकर स्पोर्ट्स ऑफिसर की भर्ती हुई, लेकिन दूसरी तरफ़ हिंदी मीडियम आत्मानंद स्कूलों में एक भी नया पद नहीं भरा गया। शिक्षक और विद्यार्थी ठगे से रह गए। इसकी आड़ में करोड़ों का बड़ा खेला हो गया। अब नई सरकार स्वामी विवेकानंद का टैग लगाकर क्या नया गुल खिलाने वाली है, यह तो भविष्य ही बताएगा।
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बारसूर मार्ग को हुआ अर्श रोग
बारसूर मार्ग की स्थिति मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती होने वाले मरीजों की तरह हो गई है, जिसे प्रैक्टिकल करने वाले दर्जनों ट्रेनी डॉक्टर रोज आकर पूछताछ कर नब्ज तो पकड़ते हैं, लेकिन इलाज उतनी गंभीरता से नहीं मिलता है। इस बार सरकार ने गीदम-बारसूर-राजनांदगांव सड़क उन्नयन का प्रावधान तो किया है, लेकिन वास्तव में इस पर अमल हो पाएगा, इसे लेकर लोग शंकित हैं। इस अविश्वास की वजह यह है कि गीदम-बारसूर मार्ग को छत्तीसगढ़ राज्य गठन के वक्त बनी जोगी सरकार के समय से लेकर अब तक कई प्रोजेक्ट में शामिल किया जाता रहा है। सबसे पहले कॉरीडोर सड़क योजना के नाम से वाड्रफ़ नगर सरगुजा से जगरगुंडा-मरियागुड़म सड़क में शामिल करने की मंजूरी मिली। इसके बाद स्टेट हाईवे-5 का दर्जा मिला। फिर कभी शक्तिपीठ कनेक्टिंग मार्ग के नाम से तो कभी कुछ और नाम से इसका कागजी विकास हुआ, लेकिन वास्तव में इसकी वास्तविक दशा का अंदाजा गीदम मंडी से उपेट स्थित राम मन्दिर तक सफर करने पर ही लग पाता है। यह सड़क अर्श रोग का शिकार हुई मालूम पड़ती है।
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पाठकों से दो शब्द…
वसंत में फागुनी उमंग लिए हुए रंगों का त्यौहार आ गया है। सामाजिक समरसता का यह त्यौहार आपके जीवन को उल्लास व खुशियों के इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कर दे, हम यही कामना करते हैं।
आप सभी सुधि पाठकों को रंगोत्सव होली की हार्दिक शुभकामनाएं…
–शैलेन्द्र ठाकुर
संपादक
BastarUpdate.com


सुंदर लेखनी और ज्वलंत समस्या पर व्यंग
आपको भी रंगो के पर्व की मुबारकबाद