साप्ताहिक व्यंग्य कॉलम ‘ शब्द बाण ‘ भाग – 134
3 अप्रैल 2026
शैलेन्द्र ठाकुर । दंतेवाड़ा
जेठ की दुपहरी में सुशासन तिहार
सरकार के सुशासन शिविर के दिन फिर आ गए हैं। शिविर में जन समस्या का निवारण हो या न हो, पर शिविर हर साल ईमानदारी से आयोजित किए जाते हैं, वो भी बैसाख – जेठ की दुपहरी में। एक दो जगह राज्य के मुखिया भी उड़नखटोला से लैंडिंग कर चौपाल लगाते हैं। उनके पीछे सरकारी मशीनरी धूल उड़ाते दौड़ती दिखती है।
यही शिविर अगर अप्रैल माह से पहले आयोजित कर लिए जाते तो शायद इसकी सार्थकता साबित भी हो जाती।
वैसे, अविभाजित मध्यप्रदेश के समय में ‘आपकी सरकार आपके द्वार ‘ के नाम से यह परम्परा शुरू हुई थी, जो सरकारें बदलती रहने और छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद भी जारी है। बस, कभी – कभी सरकार व पार्टी के हिसाब से नाम जरूर बदल जाता है। शिविर आयोजन की टाइमिंग ऐसी होती है कि बड़े साहब लोग तो एसी वाली गाड़ियों में दौरा कर लेते हैं, लेकिन छोटे अफसरों और मैदानी अमले के लिए यह अग्नि परीक्षा से कम नहीं होती है। भीड़ जुटाना, वह भी ऐसे समय में जब आम जनता तपती दुपहरी में पैर जलने के डर से घर से निकलना नहीं चाहती हो और उन्हें मीलों पैदल चलकर शिविर तक जाने को कहा जाए। इस सिचुएशन पर बॉलीवुड की मशहूर पार्श्व गायिका पूर्णिमा सेठ का गाया सुपरहिट गाना याद आता है –
जेठ की दुपहरी में पांव जले हैं सैंया, पांव जले हैं ।
यहाँ वहाँ डगरी में पाँव जले है सैंया,
पाँव जले है।
———
वन विभाग के उड़ गए तोते
संभाग मुख्यालय जगदलपुर में वन विभाग के एक रेंजर की सरे बाजार बांधकर पिटाई की गई। रेंजर का कसूर सिर्फ इतना था कि नवजात तोते बेचने वालों की धरपकड़ के लिए अपनी टीम के साथ पहुंच गए थे और भीड़ तंत्र ने रेंजर के ही तोते उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह मामला मजाक जैसा लगता जरूर है, पर इसने बस्तर में कानून – व्यवस्था की वर्तमान स्थिति की पोल खोलकर रख दी है। जब बीच शहर में लोग कानून को अपने हाथ लेने लगे, तो सरकार की व्यवस्था को अंदरूनी इलाकों में बनाए रखने का साहस कोई कर्मचारी कैसे जुटा पाएगा?
——–
कॉफी हाउस की वापसी कब?
माई दंतेश्वरी की धर्मनगरी दंतेवाड़ा में कई नवाचार होते हैं, जिनकी सराहना भी होती है। लेकिन अफसरों के बदलते ही इन नवाचारों का अंजाम आगे पाठ, पीछे सपाट की तरह होता है। एक मामला दंतेवाड़ा के ट्रांजिट हॉस्टल का है, जहां क्षेत्र के पहले 6 मंजिला भवन को लोग बड़ी सौगात और आश्चर्य के तौर पर देखने लगे थे। यहां लोगों के ठहरने के लिए शुरुआत में आरामदायक सुइट और कमरे उपलब्ध थे। इसकी देखरेख यानी हाउस कीपिंग और कैटरिंग की जिम्मेदारी प्रतिष्ठित ग्रुप इंडियन कॉफी हाऊस को दी गई थी, जिसे काफी सराहा जा रहा था। कॉफी हाउस का रेस्टोरेंट इतना चल निकला कि स्कूली बच्चों को एक्सपोजर देने लंच विथ कलेक्टर जैसा नवाचार भी किया गया। बाद में अफसरों के बदलने के बाद फिर वही ढाक के तीन पात जैसी स्थिति बन गई। नए अफसरों से अनबन के बाद सेवा शर्तों से नाखुश आईसीएच ग्रुप ने यहां से अपना कारोबार समेत लिया, उसके बाद से अब यहां ठहरने के लायक न तो स्तरीय इंतजाम बाकी रह गया है, और न ही कॉफी हाऊस रेस्टोरेंट की व्यवस्था मेंटेन है। उस पर भी कमरों को किरायेदारों की तरह महीनों इस्तेमाल किया जाने लगा है। दूसरी तरफ जिले के बैलाडीला लौह नगरी में इंडियन कॉफी हाउस की सेवाएं वर्षों से जारी है और अब धमतरी जिले में भी इस ग्रुप ने नई शुरुआत की है। इससे लोगों में उम्मीद जागी है कि शायद कभी आईसीएच की फिर से दंतेवाड़ा वापसी हो जाए।
——–
सिंघम बनने की कोशिश में रेंजर
सुकमा वन मंडल में फॉरेस्ट रेंजर की दबंगई को लेकर खूब चर्चा है । सिंघम बनने की कोशिश कर फंसे गोलापल्ली रेंज के फॉरेस्ट रेंजर की शिकायत प्रशासन और विभागीय अफसरों तक पहुंच चुकी है। महिला आयोग सदस्य से भी शिकायत हुई है। फरियादी महिलाओं का आरोप है कि उनके साथ मारपीट करने के साथ ही पंच – सरपंच को भी अफसर ने धमकाया है। इस आरोप में कितनी सच्चाई है, इसका पता तो जांच में लग ही जाएगा, लेकिन नक्सलवाद से दशकों तक जूझ चुके बस्तर में इस तरह के मामले शुभ संकेत नहीं हैं । इसके पहले भी राजस्व, वन और पुलिस कर्मचारियों की दादागिरी से 60 – 70 के दशक में नक्सलवाद की आग को हवा मिली थी। अंदरवाले दादाओं ने इसे बखूबी भुनाया और रॉबिनहुड के तौर पर खुद को स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अब जबकि सरकार इस इलाके को नक्सलमुक्त बनाने का दावा कर रही है, तो उसे ऐसी शिकायतों की गंभीरता से जांच करना चाहिए, ताकि दोबारा असंतोष की आग सुलगाने की कोई गुंजाईश बाकी न रहे।
———
आखिरकार सस्पेंड हुए सीडीपीओ
महिला उत्पीड़न का आरोप झेल रहे सीडीपीओ यानि जिला महिला, बाल विकास कार्यक्रम अधिकारी को आखिरकार सस्पेंड कर ही दिया गया। इसके पहले भी कुछ अन्य मामलों में विवादित रहने के बावजूद उक्त अफसर का बाल भी बांका नहीं हो पाया था। मंत्रालय में इतनी तगड़ी सेटिंग थी कि हर बार ट्रांसफर की सुगबुगाहट होते ही लिस्ट से अपना नाम हटवाने में कामयाब होते रहे। यही वजह है कि लंबी पारी खेलने के बाद भी अंगद के पांव की तरह जमे हुए अफसर को हटाने में विभाग के आला अफसर जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाते थे। इस बार मामला कुछ ज्यादा ही गंभीर होने की वजह से यह सेटिंग भी काम नहीं आई।
अब अफसर के निलंबन के बाद लोगों की उम्मीद जागी है कि साहब की चौकड़ी के लोग ट्रांसफर वाली जगह और मूल पदों के लिए रिलीव होंगे और विभाग की व्यवस्था दुरुस्त हो पाएगी।
——–
पीपली लाइव जैसा नजारा
बस्तर ब्लॉक के गांव जामगुड़ा में पेयजल के लिए घुटनों के बल रेंगकर सड़क पार करती दिव्यांग महिला दुलमां कश्यप की फोटो, वीडियो मीडिया में वायरल होने के बाद पीपली लाइव मूवी जैसा नज़ारा दिखाई पड़ा। इससे पीएचई विभाग अचानक कुंभकर्णी नींद से जाग उठा। आनन – फानन में दिव्यांग महिला दुलमा के घर तक खुदाई कर पाइप लाइन बिछाई गई। स्थानीय विधायक ने हैंडपंप लगाने का ऐलान कर दिया। हैंडपंप लगाने बोरवेल खनन मशीन भी भेजी गई। पर सांसद की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। शायद संसदीय क्षेत्र की सीमा रेखा स्पष्ट नहीं हो सकी है। लेकिन पीएचई विभाग के अफसरों की जितनी तत्परता मीडिया रिपोर्ट्स के बाद दिखी है, वो आगे भी जारी रहती है, या फिर से नल की टोंटियां सूखी रह जाएंगी, यह कहना मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि जब भी बस्तर ब्लॉक में मीडिया में पेयजल संकट की खबर छपती है, नलों में पानी आता है और 6 महीने के लिए कुंभकर्ण की नींद में विभाग चला जाता है। फिर खबर छपती है, फिर नलों में पानी आता है। बाकी समय आम जनता के प्रति संवेदना का स्रोत पानी टंकी के पेयजल स्रोत की तरह सूखा ही रह जाता है।
——
ट्रांसफर लिस्ट का इंतजार
अफसरों की जिस ट्रांसफर लिस्ट का इंतजार डॉन के लिए 12 मुल्कों की पुलिस की तरह हो रहा, वो कभी पड़ोसी राज्य के चुनाव में फंस रही है, तो कभी जनगणना में। अब सीएम के सुशासन अभियान का पेंच आकर फंसता दिख रहा है। इसके बाद मानसून काल में फील्ड में विकास का काम तो होना है ही नहीं, सिर्फ बैठकों से टाइम पास होता रहेगा। इधर, ट्रांसफर होने की संभावना को देखते हुए लंबे समय से जमे अफसरों की काम के प्रति दिलचस्पी भी घट गई है। कुल मिलाकर मामला इस सीजन में भी गड़बड़ ही होने वाला है। सरकार के पास परफॉर्मेंस दिखाने के लिए सिर्फ चुनावी साल ही बाकी रह जाएगा।
———
स्मृतियों में बोरे बासी
मजदूर दिवस 1 मई को इस बार बोरे बासी खाकर सोशल मीडिया पर फोटो – वीडियो अपलोड करने का ट्रेंड गायब था। किसी ने रीलबाजी या सेल्फी खिंचवाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके पहले छत्तीसगढ़िया वाद के नाम से भूपेश सरकार ने बोरे बासी को उत्सव के तौर पर ग्लैमराइज किया था। मुख्यमंत्री व मंत्रिमंडल से लेकर तमाम अफसर, नेता चटखारे लेकर बोरे बासी खाते और इसका प्रचार करते दिखे थे। सरकार बदलने के बाद से धीरे -धीरे यह ट्रेंड बदलता नजर आया। इस बार तो मई दिवस पर पूरी तरह गायब हो गया। सत्ता का सूरज बदलने के साथ ही ‘सूरजमुखी ‘ अफसरों ने भी इससे मुंह फेर लिया, यहां तक कि कांग्रेसियों ने भी इसमें दिलचस्पी नहीं ली।
———–
चलते – चलते..
एमपी के जबलपुर में क्रूज हादसे में पर्यटकों की जल समाधि की मार्मिक घटना के बाद बस्तर के पर्यटन स्थलों पर सबक नहीं लिया गया है। बैंम्बू राफ्टिंग, क्याकिंग के बढ़ते फैशन के बीच सेफ्टी जैकेट, त्वरित बचाव दल जैसे उपायों की समीक्षा नहीं हो रही है। आने वाले समय में ऐसी कोई अनहोनी यहां न हो, इसकी दुआ करने की जरूरत है।
—–
